Saturday, October 31, 2026
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Tribunal Work: सुप्रीम कोर्ट ने स्थापित नज़ीर की अनदेखी पर APTEL को लगाई फटकार; अधिकरण पूरी तरह बेकाबू हो गया है; जज कोई नाइट-एरैंट नहीं जो मनमर्जी से घूमे

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मामले की पृष्ठभूमि: 2019 के फैसले से 2024 की ‘अवैध समीक्षा’ तक

  1. 2019 का मूल फैसला और भास्कर श्राची नज़ीर:2019 में, APTEL ने सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के प्रसिद्ध भास्कर श्राची अलॉयज (Bhaskar Shrachi Alloys) फैसले पर भरोसा करते हुए DVC के 2009 से 2014 के टैरिफ को बरकरार रखा था, जिसमें बॉन्ड भुगतान के लिए सिंकिंग फंड योगदान की वसूली शामिल थी।
  2. 5 साल बाद समीक्षा याचिका पर फैसला पलटना:मैथन अलॉयज ने 2019 के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के बजाय APTEL में समीक्षा याचिका (Review Petition) दाखिल की। 5 साल बाद APTEL ने अपना फैसला बदलते हुए कहा कि DVC या तो सिंकिंग फंड का दावा कर सकता है या डिप्रेशिएशन (Depreciation) का, दोनों का नहीं। APTEL ने टिप्पणी की थी कि यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की नज़र से छूट गया था।
  3. सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख:शीर्ष अदालत ने ‘डबल बेनिफिट’ के दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि DVC अधिनियम की धारा 40 और CERC विनियम 43 के तहत सिंकिंग फंड और डिप्रेशिएशन दोनों की अनुमति है। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई आपत्ति थी, तो उसे सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करके उठाना चाहिए था, न कि ट्रिब्यूनल से अपना ही फैसला बदलवाकर।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 141 (सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि की भारत के सभी न्यायालयों व अधिकरणों पर बाध्यकारिता), न्यायिक अनुशासन और पदानुक्रम का सिद्धांत (Doctrine of Judicial Discipline & Hierarchy of Precedents), सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 114 व आदेश XLVII नियम 1 (पुनर्विलोकन/रिव्यू क्षेत्राधिकार की विधिक सीमाएं—रिव्यू अपील का विकल्प नहीं हो सकता), दामोदर घाटी निगम अधिनियम, 1948 (DVC Act, 1948) की धारा 40, तथा केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (CERC) टैरिफ विनियम, 2009 के विनियम 43 (सिंकिंग फंड और मूल्यह्रास/डेप्रिसिएशन की एक साथ वसूली की वैधता) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत ऐतिहासिक, कठोर और नज़ीरी फैसला सुनाया है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला (Justice JB Pardiwala) और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (Justice K Vinod Chandran) की खंडपीठ ने विद्युत अपीलीय अधिकरण (APTEL) द्वारा पारित उस रिव्यू आदेश को पूरी तरह खारिज व निरस्त कर दिया, जिसके तहत अधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट की सुस्थापित नज़ीर के आधार पर दिए गए अपने ही 5 साल पुराने फैसले को पलट दिया था।

शीर्ष अदालत ने अधिकरण के इस आचरण पर तीव्र क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि “अधिकरण पूरी तरह बेकाबू (Gone Haywire) हो गया है।” अदालत ने अमेरिकन विधिवेत्ता जस्टिस बेंजामिन कार्डोज़ो (Justice Benjamin Cardozo) के प्रसिद्ध कथन का उद्धरण देते हुए याद दिलाया कि कोई भी न्यायाधीश ऐसा स्वतंत्र योद्धा (Knight-errant) नहीं है जो अपनी मनमर्जी से न्याय के आदर्श तलाशता फिरे।

अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के लिए निजी कंपनी मैथन अलॉयज (Maithan Alloys) पर ₹2,00,000 (दो लाख रुपये) और न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन करने वाले अवैध आदेश का समर्थन करने के लिए महारत्न सार्वजनिक उपक्रम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) पर ₹1,50,000 (डेढ़ लाख रुपये) का भारी जुर्माना लगाया। यह हर्जाना एक माह के भीतर डीवीसी (DVC) को देना होगा, अन्यथा 18 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज देय होगा। इसके साथ ही कोर्ट ने APTEL के 17 मई 2019 के मूल आदेश को पूर्णतः बहाल कर दिया।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘अधिकरण बेकाबू हो गया है; अपनी खीझ व्यक्त करने के लिए हमारे पास कोई अन्य शब्द नहीं’:

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने APTEL द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के फैसले की अनदेखी कर रिव्यू स्वीकार करने पर कड़ी फटकार लगाते हुए अपने निर्णय में दर्ज किया: “हम यह टिप्पणी किए बिना नहीं रह सकते कि अधिकरण पूरी तरह बेकाबू (The Tribunal has gone haywire) हो गया है। हम इस अभिव्यक्ति के प्रयोग के लिए क्षमाप्रार्थी हैं, किंतु रिव्यू की अनुमति देने पर अपने तीव्र रोष और खीझ (Angst) को व्यक्त करने के लिए हमें इससे सटीक कोई अन्य विकल्प नहीं मिला—वह भी तब, जब इसी समान मुद्दे को पूर्ववर्ती वर्षों के लिए इस न्यायालय द्वारा ‘भास्कर शराची अलॉयज’ मामले में पूरी तरह तय कर दिया गया था, जिसके आधार पर अधिकरण ने अपना मूल आदेश पारित किया था।”

2. ‘जस्टिस कार्डोज़ो का सिद्धांत: जज कोई स्वच्छंद भटकने वाला योद्धा नहीं है’:

  • खंडपीठ ने न्यायिक सीमा और अधिकरण के मनमानेपन पर विश्वप्रसिद्ध विधिवेत्ता जस्टिस बेंजामिन कार्डोज़ो को उद्धृत किया:“एक न्यायाधीश ‘कोई स्वच्छंद भटकता हुआ योद्धा (Knight-errant) नहीं है जो सुंदरता या अच्छाई के अपने आदर्श की खोज में स्वेच्छा से विचरण करे’। किंतु यहाँ हमारे सामने एक ऐसा अधिकरण है जो ‘अपनी स्वेच्छा से नित नए प्रयोग (Innovating at pleasure)’ कर रहा है।”

3. ‘अनुच्छेद 141 एक संवैधानिक अधिदेश है; शीर्ष फैसलों का पालन न होने पर अराजकता (Mayhem) फैल जाएगी’:

  • अदालत ने न्यायिक पदानुक्रम और नज़ीरों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा:“अदालतों के पदानुक्रम वाली हमारी न्यायिक प्रणाली अपीलीय, पुनरीक्षण और पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्रों के निर्णयों की पवित्रता और उन्हें दिए जाने वाले उचित महत्व पर टिकी है। जहाँ तक संविधान के अनुच्छेद 141 का संबंध है, यह एक संवैधानिक अधिदेश (Constitutional Imprimatur) है जो यह सुनिश्चित करता है कि देश की सर्वोच्च अदालत के फैसलों का अक्षरशः पालन किया जाए, अन्यथा पूरी व्यवस्था में अराजकता (Mayhem) फैल जाएगी।हम इस आलोचना से भली-भांति अवगत हैं कि ‘सुप्रीम कोर्ट के फैसले इसलिए सर्वोच्च नहीं हैं कि वे अचूक/त्रुटिहीन (Infallible) हैं, बल्कि इसलिए सर्वोच्च हैं क्योंकि यह अंतिम न्यायालय (Final Court) है।’ तथापि, मुकदमों में एक निश्चित अंत और अंतिम निष्कर्ष (Finality and Closure) एक अनिवार्य विधिक आवश्यकता है।”

4. ‘संविधान के अनुच्छेद 141 का खुला उल्लंघन अधिकरण की स्वतंत्रता पर संदेह खड़े करता है’:

  • पीठ ने अधिकरण द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दरकिनार करने पर गंभीर संवैधानिक चिंता जताई:“ऐसा बार-बार नहीं होता, किंतु कभी-कभी हमारे सामने आक्षेपित आदेश जैसे फैसले आते हैं, जो न्यायिक अनुशासन का घोर उल्लंघन और भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 की खुली अवहेलना हैं। यह हमारे मन में अधिकरण की ‘स्वायत्तता बनाम जवाबदेही’ (Independence vis-à-vis Accountability) को लेकर गंभीर संदेह उत्पन्न करता है।”

5. ‘यदि कोई बिंदु सुप्रीम कोर्ट की नजर से छूटा था, तो उचित अपील में आना चाहिए था, रिव्यू में नहीं’:

  • APTEL ने अपने रिव्यू आदेश में कहा था कि “डबल बेनिफिट” का पहलू सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान से छूट गया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि अधिकरण सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कमियां निकालने या उसका रिव्यू करने का अधिकार नहीं रखता। यदि ऐसा कोई प्रश्न था, तो उसे एक विधिवत अपील के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ही उठाया जाना चाहिए था।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2009–2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
अपीलकर्ता पक्षदामोदर वैली कॉर्पोरेशन (DVC) — संसद के विशेष अधिनियम (DVC Act, 1948) द्वारा स्थापित सांविधिक निगम।
प्रतिवादी पक्षमैथन अलॉयज लिमिटेड (Maithan Alloys Ltd) — निजी औद्योगिक उपभोक्ता।
हस्तक्षेपकर्ता (Intervenor)स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) — भारत सरकार का महारत्न सार्वजनिक उपक्रम।
मूल टैरिफ अवधिवर्ष 2009 से 2014 — CERC विनियम, 2009 के तहत दामोदर घाटी निगम द्वारा बिजली टैरिफ में बांड्स के मोचन हेतु बनाए गए सिंकिंग फंड (Sinking Fund for Redemption of Bonds) के अंशदान की वसूली का निर्धारण।
सुप्रीम कोर्ट की मूल नज़ीर (2018)सर्वोच्च न्यायालय ने भास्कर शराची अलॉयज लिमिटेड बनाम DVC [(2018) 8 SCC 281] के ऐतिहासिक फैसले में तय किया था कि DVC Act की धारा 40 और CERC रेगुलेशन 43 के तहत DVC को सिंकिंग फंड और पूंजीगत संपत्तियों पर मूल्यह्रास (Depreciation) दोनों की वसूली टैरिफ के जरिए करने का वैधानिक अधिकार है।
APTEL का 17 मई 2019 का मूल आदेशसर्वोच्च न्यायालय के उक्त फैसले का पालन करते हुए APTEL ने DVC के 2009-14 के टैरिफ निर्धारण को पूरी तरह वैध ठहराया था।
मैथन अलॉयज का विधिक आचरणमैथन अलॉयज ने 2019 के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कोई अपील दायर नहीं की। इसके बजाय उसने अधिकरण में एक रिव्यू याचिका दाखिल की और उसे 5 वर्षों तक लंबित रखा।
APTEL का विवादित रिव्यू आदेश5 वर्ष बाद APTEL ने अपना ही आदेश पलटते हुए कहा कि DVC सिंकिंग फंड या डेप्रिसिएशन में से केवल एक ही ले सकता है, दोनों नहीं; और यह तर्क दिया कि यह पहलू सुप्रीम कोर्ट की नजर से छूट गया था। महारत्न कंपनी SAIL ने भी रिव्यू का समर्थन किया।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णयAPTEL का रिव्यू आदेश पूरी तरह रद्द (Quashed); 17 मई 2019 का मूल आदेश बहाल; मैथन अलॉयज पर ₹2 लाख और SAIL पर ₹1.5 लाख का जुर्माना; 1 महीने में DVC को भुगतान का निर्देश (विफल रहने पर 18% वार्षिक ब्याज)।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘रिव्यू की सीमाएं बनाम अनुच्छेद 141 की सर्वोच्चता’

  • पुनर्विलोकन (Review) के अधिकार क्षेत्र का घोर अतिक्रमण:
    • सीपीसी की धारा 114 और आदेश XLVII नियम 1 के तहत रिव्यू का दायरा अत्यंत संकीर्ण होता है। रिव्यू किसी मुकदमे की दोबारा सुनवाई (Re-hearing of the matter) या ‘प्रच्छन्न रूप से अपील’ (Appeal in Disguise) नहीं हो सकता।
    • जब APTEL ने 2019 में सुप्रीम कोर्ट की नज़ीर लागू करके अंतिम फैसला सुना दिया था, तो 5 साल बाद उसी मुद्दे पर विपरीत निष्कर्ष निकालना अधिकार क्षेत्र का खुला दुरुपयोग था।
  • संविधान का अनुच्छेद 141 और न्यायिक अराजकता पर रोक:
    • भारत के संवैधानिक ढांचे में न्यायिक पदानुक्रम (Hierarchy of Courts) कानून के शासन की रीढ़ है।
    • यदि कोई वैधानिक अधिकरण (जैसे APTEL, NCLAT या ITAT) सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेशों को यह कहकर पलटने लगे कि “सुप्रीम कोर्ट इस बिंदु पर विचार करने से चूक गया था”, तो देश में कोई भी कानूनी विवाद कभी समाप्त नहीं होगा। यह ठीक वही स्थिति है जिसे पीठ ने ‘न्यायिक अराजकता’ (Mayhem) की संज्ञा दी।
  • महारत्न कंपनी SAIL की गैर-जिम्मेदाराना भूमिका पर प्रहार:
    • सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरा क्षोभ जताया कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL), जो देश का एक प्रतिष्ठित सार्वजनिक उपक्रम और ‘महारत्न’ कंपनी है, उसने एक ऐसे रिव्यू का समर्थन किया जो न्यायिक अनुशासन के खिलाफ था।
    • पीठ ने तल्ख टिप्पणी की कि “सार्वजनिक उपक्रम को बहुत गलत विधिक सलाह दी गई थी (The PSU has been ill-advised)”। सार्वजनिक धन से चलने वाले सरकारी उपक्रमों का यह दायित्व है कि वे स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की रक्षा करें, न कि दुर्भावनापूर्ण मुकदमों में निजी कंपनियों के साथ खड़े हों।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: दामोदर वैली कॉर्पोरेशन (DVC) बनाम मैथन अलॉयज लिमिटेड व अन्य [Civil Appeal No. … / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन
  • निर्णय की तिथि: 30 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)
  • कार्यवाही का परिणाम: अपील स्वीकार; APTEL का रिव्यू आदेश पूरी तरह निरस्त; 17 मई 2019 का मूल आदेश बहाल; मैथन अलॉयज पर ₹2 लाख और SAIL पर ₹1.5 लाख का जुर्माना।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • अपीलकर्ता दामोदर वैली कॉर्पोरेशन (DVC) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह (Senior Advocate Vikas Singh) एवं वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी (Senior Advocate Dr. Abhishek Manu Singhvi), जिन्हें SKV Law Offices की टीम (संस्थापक पार्टनर श्री वेंकटेश, पार्टनर आशुतोष के. श्रीवास्तव, एसोसिएट पार्टनर प्रिया धनखड़, काउंसिल निहाल भारद्वाज एवं एसोसिएट आदर्श सिंह) ने ब्रीफ व सहयोग किया।
  • प्रतिवादी मैथन अलॉयज लिमिटेड की ओर से: अधिवक्ता राजीव यादव (Advocate Rajiv Yadav)।
  • हस्तक्षेपकर्ता स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव शकधर (Senior Advocate Rajiv Shakdher)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 141 (सर्वोच्च न्यायालय की विधायी बाध्यकारिता) एवं अनुच्छेद 136 (अपीलीय शक्ति)
    • विद्युत अधिनियम, 2003 (Electricity Act, 2003) — धारा 111 व 125 (APTEL के अपीलीय आदेश एवं सुप्रीम कोर्ट में अपील)
    • दामोदर घाटी निगम अधिनियम, 1948 (DVC Act, 1948) — धारा 40 (सिंकिंग फंड की स्थापना और व्यय की अनुमति)
    • केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (CERC) टैरिफ विनियम, 2009 — विनियम 43 (पूंजीगत परिसंपत्तियों का मूल्यह्रास एवं विशेष फंड्स)
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) — धारा 114 सहपठित आदेश XLVII नियम 1 (रिव्यू की विधिक सीमाएं)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • न्यायिक अनुशासन और अधिकरणों की सीमाओं का विधिक मानक: ‘अधिकरणों को सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित बाध्यकारी निर्णयों को ‘नजरअंदाज’ करने या रिव्यू के माध्यम से पलटने का कोई विधिक अधिकार नहीं है; न्यायाधीश कोई स्वच्छंद भटकते हुए योद्धा (Knight-errant) नहीं हैं जो अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के आधार पर स्थापित नज़ीरों को दरकिनार करें; अनुच्छेद 141 का उल्लंघन न्यायिक पदानुक्रम को नष्ट करता है और व्यवस्था में अराजकता लाता है; प्रक्रिया के दुरुपयोग के तहत 5 साल बाद रिव्यू लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी बनाने के प्रयासों पर वादकारियों और उनका समर्थन करने वाले सार्वजनिक उपक्रमों पर अनुकरणीय दंडात्मक हर्जाना (Exemplary Costs) लगाया जाना न्यायोचित है।’
  • वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: मैथन अलॉयज को ₹2,00,000 और SAIL को ₹1,50,000 का हर्जाना 30 दिनों के भीतर सीधे DVC के खाते में जमा करना होगा; समय पर भुगतान न करने पर 18% वार्षिक दंडात्मक ब्याज लागू होगा; DVC के 2009-2014 के टैरिफ में सिंकिंग फंड और डेप्रिसिएशन दोनों का दावा अंतिम रूप से वैधानिक रूप से सुरक्षित हो गया है।

Tribunal Work:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन
याचिकाकर्तादामोदर वैली कॉर्पोरेशन (Damodar Valley Corporation – DVC) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह व डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी
प्रतिवादी पक्षमैथन अलॉयज (Maithan Alloys) एवं स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL)
मूल विवादDVC द्वारा बॉन्ड परिसंपत्तियों के लिए सिंकिंग फंड (Sinking Fund) की वसूली। APTEL ने 2019 का अपना ही फैसला पलटकर DVC के खिलाफ 5 साल बाद समीक्षा आदेश पारित किया था।
अदालत का अंतिम फैसला1. APTEL का समीक्षा आदेश रद्द: 17 मई 2019 के मूल आदेश को बहाल किया गया।
2. भारी जुर्माना: मैथन अलॉयज पर ₹2 लाख और SAIL पर ₹1.5 लाख का जुर्माना; 1 महीने में DVC को भुगतान न करने पर 18% वार्षिक ब्याज लगेगा।
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