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अदालत में हुई सुनवाई और मुख्य विधिक बहस
1. “झूठी घोषणा करने पर कानूनी सजा का जोखिम”:
- याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) ने तर्क दिया कि लगभग 43 लाख लोगों को “स्थायी रूप से स्थानांतरित” या “अनुपस्थित” बताकर प्रारूप सूची से बाहर कर दिया गया। इनमें से अधिकांश को एन्यूमरेशन फॉर्म मिले ही नहीं क्योंकि वे पुराने पतों पर भेजे गए थे।
- भूषण ने कहा कि पहले से मतदाता रहे नागरिकों से फॉर्म 6 भरवाने का मतलब उनसे यह झूठा हलफनामा लेना है कि उन्होंने आज तक कभी वोट नहीं डाला। ‘लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ की धारा 31 के तहत झूठी घोषणा करने पर 1 साल तक की सजा का प्रावधान है। उन्होंने सुझाव दिया कि जो मतदाता पते बदल चुके हैं, उन्हें फॉर्म 8 (Form 8) भरने की अनुमति दी जानी चाहिए।
2. “वोट देने का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण”:
न्यायपीठ के सदस्य न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) ने ECI के तंत्र में ‘ढांचागत विसंगति’ (Structural Incongruity) रेखांकित करते हुए कहा: “वोट देने का अधिकार एक बेहद महत्वपूर्ण अधिकार है। मान लीजिए कि कोई मतदाता ढीला था और उसने समय पर जवाब नहीं दिया। क्या इसका मतलब यह है कि वह हमेशा के लिए अपना अधिकार खो देगा? उसका नाम प्रारूप सूची से गायब है, वह अपने दस्तावेजों के साथ आता है और आप insistence करते हैं कि वह फॉर्म 6 भरे… जब वह पहले से ही नामांकित था, तो वह फॉर्म 6 कैसे भर सकता है?”
3. ECI का रुख और कोर्ट का सुझाव:
- निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू (D.S. Naidu) ने स्पष्ट किया कि ‘प्रथम बार’ शब्द का उपयोग SIR प्रक्रिया के तहत तैयार हो रही नई स्वच्छ मतदाता सूची (Clean-slate Exercise) के संदर्भ में किया गया है। केवल फॉर्म 6 भरने से किसी के खिलाफ कोई अभियोजन नहीं चलाया जाएगा।
- पीठ ने सुझाव दिया कि चूंकि दिल्ली में तुरंत कोई चुनाव नहीं हैं, ECI को 30 अक्टूबर की कट-ऑफ तिथि के बाद भी अंतिम सूची बनने तक मूल एन्यूमरेशन फॉर्म स्वीकार करने और हटाए गए नामों की आसान हिंदी/स्थानीय भाषाओं में सार्वजनिक सूची जारी करने की व्यवस्था करनी चाहिए।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 324 (स्वतंत्र, निष्पक्ष व पारदर्शी निर्वाचन सुनिश्चित करने का निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व), अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार एवं मतदान का महत्वपूर्ण वैधानिक अधिकार), जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 (मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण / Special Intensive Revision – SIR), तथा निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) के अंतर्गत ‘फॉर्म 6’ (नए/प्रथम-बार मतदाताओं हेतु पंजीकरण) बनाम ‘फॉर्म 8’ (निवास स्थान परिवर्तन, प्रविष्टियों में सुधार व स्थानांतरण) के उचित प्रयोग के विधिक मानकों पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रियात्मक कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने दिल्ली में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान चुनाव अधिकारियों द्वारा जारी नोटिसों और मतदाता सूची के मसौदे (Draft Electoral Roll) से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की।
अदालत ने पाया कि दिल्ली के मसौदा रोल से बाहर किए गए लगभग 43 लाख ऐसे मतदाताओं—जिनके नाम पूर्ववर्ती मतदाता सूचियों में पहले से दर्ज थे—को दोबारा नाम जुड़वाने के लिए ‘फॉर्म 6’ जमा करने के लिए विवश किया जा रहा है, जो कि कानूनन केवल उन लोगों के लिए है जो जीवन में पहली बार मतदाता बनने के लिए आवेदन कर रहे हैं। पीठ ने इसे एक गंभीर “संरचनात्मक विसंगति” (Structural Incongruity) करार देते हुए चुनाव आयोग से पूछा कि जब तक अंतिम मतदाता सूची (Final Roll) प्रकाशित नहीं हो जाती, तब तक छूटे हुए मतदाताओं से विलंबित रूप से मूल गणना प्रपत्र (Enumeration Form) ही स्वीकार क्यों नहीं किए जा सकते? चुनाव आयोग के वरिष्ठ वकील द्वारा समयसीमा बढ़ाने के आश्वासन के बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है।
शीर्ष अदालत की तीखी विधिक टिप्पणियां: ‘फॉर्म 6 और फॉर्म 8 की विधिक विसंगति’
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने चुनाव आयोग द्वारा स्थापित वर्गीकरण और पहले से पंजीकृत मतदाताओं पर पहली बार पंजीकरण कराने की बाध्यता पर कड़े कानूनी तर्क प्रस्तुत किए:
1. ‘फॉर्म 6 नए मतदाताओं के लिए है, शिफ्ट होने वालों के लिए नहीं’: CJI सूर्यकांत
मुख्य न्यायाधीश ने चुनाव आयोग के वकील से सीधा सवाल किया: “फॉर्म 6 उन लोगों के लिए है जो पहली बार (First time) मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं। फॉर्म 8 निवास स्थान परिवर्तन (Shifting of residence) या प्रविष्टियों में सुधार के लिए है। मान लीजिए कि कोई व्यक्ति पहले वसंत कुंज में नामांकित था और अब सरिता विहार चला गया है। वह व्यक्ति अपने पुराने पोलिंग बूथ, मतदाता सूची का विवरण और पुराना वोटर नंबर दर्ज कर नया पता दे सकता है। उस व्यक्ति को फिर से फॉर्म 6 जमा करने के लिए बाध्य क्यों किया जाना चाहिए?“
2. ‘मतदान का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है, प्रक्रियात्मक चूक से हमेशा के लिए नहीं छिन सकता’: जस्टिस बागची
न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने रेखांकित किया कि प्रशासनिक सुस्ती या सूचना के अभाव को नागरिकों के मताधिकार के हनन का आधार नहीं बनाया जा सकता: “वोट डालने का अधिकार एक अत्यंत महत्वपूर्ण (Vital) अधिकार है। आपके (ECI) इस अभ्यास को पूरी सावधानी और तत्परता (Due Diligence) के साथ संचालित किया जाना चाहिए। मान लीजिए कि कोई मतदाता किसी कारणवश सतर्क नहीं रहा और समय पर जवाब नहीं दे पाया। तो क्या इसका अर्थ यह है कि उसका मतदान का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो गया? कोई मतदाता विभिन्न व्यावहारिक कारणों से जवाब देने में असमर्थ रहा हो सकता है। उसका नाम अब ड्राफ्ट रोल से गायब है। वह दस्तावेजों के साथ अधिकारियों के पास जाता है, किंतु आप इस बात पर अड़ जाते हैं कि वह फॉर्म 6 भरे… जब वह पहले से ही नामांकित था तो वह फॉर्म 6 कैसे भर सकता है? यह एक संरचनात्मक विसंगति (Structural Incongruity) है जिसे दूर किया जाना आवश्यक है।”
3. ‘अवशिष्ट श्रेणी’ (Residual Category) बनाने का न्यायिक सुझाव:
- पीठ ने कहा कि बाहर किए गए मतदाताओं को केवल ‘शिफ्टेड’ (स्थानांतरित) या ‘एब्सेंट’ (अनुपस्थित) में वर्गीकृत करना पर्याप्त नहीं है।
- आयोग को एक अवशिष्ट श्रेणी (Residual Category) बनानी चाहिए—जिन लोगों को समय पर फॉर्म नहीं मिला या जो अपरिहार्य कारणों से जवाब नहीं दे सके, उन्हें अपने दस्तावेज प्रस्तुत करने और कारण स्पष्ट करने की अनुमति मिलनी चाहिए। यदि अधिकारी संतुष्ट हैं तो नाम जोड़ा जाए; असंतुष्ट होने पर लिखित कारण दिया जाए ताकि मतदाता उसे विधिक रूप से चुनौती दे सके।
4. ‘अंतिम सूची बनने तक मूल गणना प्रपत्र (Enumeration Form) ही क्यों न स्वीकार किया जाए?’:
- अदालत ने चुनाव आयोग की कट-ऑफ तारीख की कठोरता पर सवाल उठाया:“आपने एक कट-ऑफ तारीख तय कर दी और कहा कि इसके बाद गणना प्रपत्र स्वीकार नहीं होगा क्योंकि ड्राफ्ट प्रकाशित हो चुका है। किंतु जब तक अंतिम सूची (Final Roll) तैयार नहीं हो जाती, तब तक पहले से पंजीकृत मतदाता को फॉर्म 6 भरने को क्यों कहा जाए? वही गणना प्रपत्र देरी से (Belatedly) स्वीकार क्यों नहीं किया जा सकता? केवल समयसीमा बीत जाने से वही फॉर्म अस्वीकार्य क्यों हो जाता है? आप इसे स्वीकार करके पूरी प्रक्रियात्मक बाधा को समाप्त कर सकते हैं।”
याचिकाकर्ता (प्रशांत भूषण) बनाम निर्वाचन आयोग (दामा शेषाद्रि नायडू) के विधिक तर्क
| पक्षकार | प्रस्तुत किए गए मुख्य विधिक व तथ्यात्मक बिंदु |
| याचिकाकर्ता की ओर से (अधिवक्ता प्रशांत भूषण) | 1. 43 लाख मतदाताओं का निष्कासन: लगभग 43 लाख नागरिकों के नाम इस आधार पर मसौदे से बाहर कर दिए गए कि वे अनुपस्थित थे या शिफ्ट हो गए थे, क्योंकि वे गणना प्रपत्र जमा नहीं कर पाए थे। 2. पुराने पतों पर नोटिस: कई नागरिकों को यह पता ही नहीं था कि फॉर्म भरना है; प्रपत्र पुराने या अप्रासंगिक पतों पर भेजे गए थे। 3. झूठे घोषणापत्र की विवशता: निर्वाचक नियमों के अनुसार, फॉर्म 6 में यह घोषणा करनी होती है कि आवेदक पहली बार मतदाता बन रहा है। पहले से वोट दे चुके नागरिकों को फॉर्म 6 भरने के लिए विवश करना उनसे झूठा वैधानिक हलफनामा लेने के समान है। 4. सरल समाधान: जो लोग पहले फॉर्म नहीं दे पाए, उन्हें अब फॉर्म जमा करने की छूट दी जाए; जो शिफ्ट हुए हैं उन्हें फॉर्म 8 के साथ गणना प्रपत्र देने की अनुमति मिले। |
| भारत निर्वाचन आयोग की ओर से (वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू) | 1. कोई स्थायी निष्कासन नहीं: मसौदा सूची से नाम हटने का अर्थ स्थायी निष्कासन नहीं है। अंतिम सूची के प्रकाशन के बाद भी, और संबंधित चुनाव के नामांकन की अंतिम तिथि तक मतदाता नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकते हैं। 2. दो दशक बाद SIR: दिल्ली में दो दशकों से अधिक समय बाद SIR हो रहा है; बिहार और अन्य राज्यों के अनुभवों के आधार पर नियमों को व्यावहारिक बनाया जा रहा है ताकि कोई वास्तविक मतदाता न छूटे। 3. ‘क्लीन-स्लेट’ अभ्यास: ECI के अनुसार ‘प्रथम बार समावेशन’ का अर्थ इस नए SIR रजिस्टर में नए सिरे से नाम दर्ज होना है; फॉर्म 6 के उपयोग के कारण किसी भी नागरिक के खिलाफ कोई दंडात्मक या अभियोजन कार्रवाई नहीं की गई है। 4. समयसीमा विस्तार का वचन: यदि नागरिकों को कठिनाई हो रही है, तो 30 अक्टूबर की समयसीमा को आगे बढ़ाया जाएगा। |
विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: ‘निर्वाचक नियम, 1960 और फॉर्म 6 बनाम फॉर्म 8’
- निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत फॉर्म्स का विधिक वर्गीकरण:
- फॉर्म 6 (Form 6): इसका शीर्षक ही है—“Application for Inclusion of Name in Electoral Roll for First Time Voter” (पहली बार मतदाता सूची में नाम शामिल करने का आवेदन)। इसमें आवेदक को यह प्रमाणित करना होता है कि उसका नाम देश के किसी भी अन्य निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज नहीं है।
- फॉर्म 8 (Form 8): इसका उद्देश्य—“Application for Shifting of Residence / Correction of Entries in Electoral Roll” (निवास परिवर्तन अथवा प्रविष्टियों के सुधार का आवेदन) है।
- जब कोई नागरिक पिछले 10 या 20 वर्षों से मतदान कर रहा है और उसके पास पुराना मतदाता पहचान पत्र (EPIC) मौजूद है, तो चुनाव आयोग की मशीनरी द्वारा उसे ‘फॉर्म 6’ भरने के लिए कहना कानून के विरुद्ध है। यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत अनावश्यक विधिक भ्रम पैदा करता है, जहां गलत घोषणा करने पर सजा का प्रावधान है।
- मतदाता जागरूकता और सरल भाषा में प्रकाशन:
- मुख्य न्यायाधीश ने ECI को कड़ा निर्देश दिया कि वह दिल्ली में चल रहे SIR अभ्यास का सरल और सुगम भाषा में व्यापक प्रचार-प्रसार करे।
- आयोग को बाहर किए गए मतदाताओं की सूचियां सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करनी चाहिए और स्पष्ट बताना चाहिए कि: “आपका नाम पुरानी सूची में था, किंतु अधिकारियों का आपसे संपर्क नहीं हो सका; अतः आप निकटतम चुनाव कार्यालय जाकर अपने दस्तावेज प्रस्तुत करें।”
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक मूल जनहित रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: दिल्ली विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूची निष्कासन वाद [Writ Petition (Civil) No. … / 2026]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
- आदेश की तिथि: 28 अक्टूबर 2026
- आगामी निर्णायक सुनवाई: दो सप्ताह बाद (नवंबर 2026)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता प्रशांत भूषण (Advocate Prashant Bhushan)।
- भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू (Senior Advocate Dama Seshadri Naidu)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 324 (निर्वाचन आयोग के अधीक्षण व संचालन की शक्तियां), अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार), एवं अनुच्छेद 32
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 — धारा 21 (मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण) एवं धारा 31 (झूठी घोषणा करने पर दंड)
- निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960):
- नियम 13(1) एवं फॉर्म 6 — पहली बार निर्वाचक के रूप में पंजीकरण
- नियम 13(3) एवं फॉर्म 8 — निवास परिवर्तन और विवरण सुधार
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- मतदाता सूची पुनरीक्षण और मताधिकार संरक्षण का विधिक मानक: ‘मताधिकार एक महत्वपूर्ण और संवैधानिक दृष्टि से संरक्षित वैधानिक अधिकार है; प्रक्रियात्मक जटिलताओं या समयसीमा के आधार पर पहले से पंजीकृत लाखों वास्तविक नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जा सकता; जो मतदाता पूर्व में नामांकित थे, उनसे नए मतदाताओं हेतु निर्धारित ‘फॉर्म 6′ भरवाना एक संरचनात्मक विसंगति है; निर्वाचन आयोग का यह विधिक दायित्व है कि वह अंतिम प्रकाशन तक वास्तविक मतदाताओं से गणना प्रपत्र स्वीकार करे और उन्हें अपना नाम बहाल कराने का पूर्ण अवसर दे।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन संकेत: ECI के वरिष्ठ वकील ने पीठ को आश्वस्त किया है कि 30 अक्टूबर 2026 की समयसीमा को आवश्यकतानुसार आगे बढ़ाया जाएगा ताकि किसी भी पात्र मतदाता का नाम न छूटे; सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को सरल भाषा में बाहर किए गए मतदाताओं की सूची प्रकाशित करने और प्रक्रियात्मक सुधारों पर विचार करने का निर्देश देते हुए मामले को दो सप्ताह बाद के लिए स्थगित किया है।
Delhi SIR: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| मामला/साइटेशन | अंजलि भारद्वाज व अन्य बनाम भारत निर्वाचन आयोग व अन्य (Anjali Bhardwaj & Anr. v. ECI & Anr.) |
| याचिकाकर्ता पक्ष | अंजलि भारद्वाज एवं अमृता जोहरी | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता प्रशांत भूषण |
| प्रतिवादी पक्ष | भारत निर्वाचन आयोग (ECI) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू |
| मूल विवाद | SIR प्रारूप सूची से बाहर किए गए ~43 लाख मतदाताओं को फॉर्म 6 भरकर खुद के “पहली बार मतदाता होने” का घोषणा पत्र देने की अनिवार्यता। |
| अदालत का फैसला | 1. 30 अक्टूबर की समयसीमा विस्तार: ECI ने आश्वासन दिया कि आवश्यकता पड़ने पर समयसीमा बढ़ाई जाएगी। 2. फॉर्म 8 व विलंबित एन्यूमरेशन स्वीकृत: प्रारूप सूची के पूर्व दर्ज मतदाताओं हेतु फॉर्म 8 स्वीकार करने व देर से जमा एन्यूमरेशन फॉर्म पर ECI विचार करे। 3. अगली सुनवाई 2 सप्ताह बाद। |

