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मामले की पृष्ठभूमि: लाइव स्ट्रीमिंग का दुरुपयोग और सॉलिसिटर जनरल की दलीलें
- अदालत के अंतरिम आदेशों का उल्लंघन:सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही एक अंतरिम आदेश के जरिए पूर्व अनुमति के बिना लाइव स्ट्रीम वीडियो के अनधिकृत प्रसार और व्यावसायिक उपयोग पर रोक लगा रखी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि विभिन्न उच्च न्यायालयों और वकीलों से सुझाव प्राप्त हुए हैं। हालांकि, अंतरिम आदेशों के बावजूद कुछ उल्लंघन (Breaches) देखे गए हैं। उन्होंने जानकारी दी कि मंत्रालय (MeITy) के सचिव से चर्चा हुई है और इस संबंध में एक विस्तृत राष्ट्रीय नीति बनाई जा रही है।
- डिजिटल वॉटरमार्किंग का सुझाव (प्रशांत भूषण):वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुझाव दिया कि फर्जी और तोड़-मरोड़ कर बनाई गई क्लिप्स (Manipulated Clips) से बचने के लिए आधिकारिक वीडियो फीड में ‘डिजिटल वॉटरमार्क’ (Digital Watermarking) और ‘क्रिप्टोग्राफिक सिग्नेचर’ जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि मान्यता प्राप्त पत्रकारों या कानूनी टिप्पणीकारों को अनुमति के जटिल चक्कर के बिना आधिकारिक फीड से अंश उपयोग करने की छूट होनी चाहिए, जैसा कि स्वप्निल त्रिपाठी फैसले (ओपन कोर्ट सिद्धांत) में कहा गया था।
- न्यायमूर्ति बागची का जवाब और ‘मोनिटाइजेशन’ पर रोक:न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि कई उच्च न्यायालयों ने यूट्यूब फीड से सीधे डाउनलोड रोकने के तकनीकी उपाय पहले ही लागू कर दिए हैं। हालांकि, उन्होंने दोहराया कि यदि कोई क्लिप प्रामाणिक भी है, तो भी उसका व्यावसायिक उपयोग या उससे आर्थिक कमाई (Monetisation) नहीं की जा सकती। हर सार्वजनिक क्लिप के निष्कर्षण और उद्देश्य की न्यायिक देखरेख (Court Supervision) अनिवार्य है।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (न्यायिक गरिमा एवं निजता का अधिकार), अनुच्छेद 19(1)(a) (भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता—प्रेस रिपोर्टिंग की सीमाएं), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) सहपठित सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021, न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971), तथा ऐतिहासिक स्वप्निल त्रिपाठी बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया [(2018) 10 SCC 639] नज़ीर के तहत ‘ओपन जस्टिस’ (Open Justice) एवं अदालती लाइव-स्ट्रीमिंग नियमावली (Model Rules for Live Streaming and Recording of Court Proceedings) के विधिक संतुलन पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की लाइव-स्ट्रीमिंग से अदालती क्लिप्स को बिना अनुमति काटने (Clipping), सोशल मीडिया पर मीम्स/शॉर्ट्स बनाकर प्रसारित करने और उनका मुद्रीकरण (Monetisation/Commercial Exploitation) करने पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका (W.P.(C) No. 751/2026) पर सुनवाई की.
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा इस विषय पर तैयार की जा रही प्रस्तावित विनियामक नीति में केवल दिशा-निर्देश ही नहीं, बल्कि न्यायालय के पूर्व आदेशों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़े दंडात्मक उपाय और परिणाम (Penal Consequences & Enforcement Measures) भी अनिवार्य रूप से शामिल होने चाहिए.
शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के उपाय नीति का अनिवार्य हिस्सा होंगे’
न्यायालय ने केंद्र सरकार को नीति निर्माण के दायरे को व्यापक और बाध्यकारी बनाने का निर्देश देते हुए दर्ज किया: “न्यायालय के पूर्व में जारी अंतरिम निर्देशों का अनुपालन करने में विफल रहने वालों के खिलाफ आवश्यक दंडात्मक और प्रवर्तन उपाय (Necessary measures for taking action) भी प्रस्तावित नीतिगत व्यवस्था में अनिवार्य रूप से शामिल किए जाएंगे।”
2. ‘प्रमाणित अदालती फुटेज का भी व्यावसायिक उपयोग/मुद्रीकरण पूरी तरह वर्जित’:
- खंडपीठ ने इस बात पर विशेष बल दिया कि लाइव-स्ट्रीमिंग का उद्देश्य न्याय प्रणाली में पारदर्शिता लाना था, न कि यूट्यूब चैनलों या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के लिए राजस्व उत्पन्न करना:“यहाँ तक कि आधिकारिक रूप से प्रमाणित फुटेज (Authenticated Footage) का भी व्यावसायिक उपयोग या मुद्रीकरण (Monetisation) नहीं किया जा सकता। यही सबसे बड़ी समस्या है… इसीलिए हमने अपने पूर्व अंतरिम आदेश के पैरा 9 में वाणिज्यिक शोषण (Commercial Exploitation) पर स्पष्ट रोक लगाई थी।” — न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची
3. ‘मोबाइल से सेकेंडरी रिकॉर्डिंग अदालत की आपराधिक अवमानना’:
- जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रेखांकित किया कि तकनीकी प्रतिबंधों के बावजूद लोग कोर्टरूम में या स्क्रीन के सामने मोबाइल फोन जैसे सेकेंडरी उपकरणों से रिकॉर्डिंग कर लेते हैं, तो पीठ ने स्पष्ट विधिक चेतावनी दी:“यह सीधे तौर पर अदालत की अवमानना (Contempt of Court) के दायरे में आएगा। मुख्य कठिनाई इसके जमीनी क्रियान्वयन की है, जिसके लिए हम नियमावली के तहत संबंधित सक्षम प्राधिकारियों से तंत्र विकसित करने का अनुरोध कर रहे हैं।” — न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची
4. अदालत की निगरानी की सीमा:
- पीठ ने स्पष्ट किया कि जब भी सार्वजनिक मंचों पर अदालत की कार्यवाही का कोई वीडियो प्रसारित किया जाता है, तो उस पर संस्थागत निगरानी अपरिहार्य है: “अदालत की निगरानी इस सीमा तक अनिवार्य है कि आप फुटेज से कितना हिस्सा निकाल (Extract) रहे हैं और उसका वास्तविक उद्देश्य क्या है।”
केंद्र सरकार और वरिष्ठ वकीलों की प्रस्तुतियां
1. केंद्र सरकार का पक्ष (SG तुषार मेहता):
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को अवगत कराया कि विभिन्न उच्च न्यायालयों, विधि विशेषज्ञों, अधिवक्ताओं और अन्य प्रमुख हितधारकों से व्यापक सुझाव प्राप्त हुए हैं, जिन्हें शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री के समक्ष प्रस्तुत कर दिया गया है।
- उन्होंने स्वीकार किया कि अंतरिम निषेधाज्ञा के बावजूद उल्लंघनों की घटनाएं सामने आई हैं:“अदालती वीडियो के अनधिकृत उपयोग के संबंध में उल्लंघन हुए हैं। मैं इस विवाद को बढ़ाना नहीं चाहता, किंतु उल्लंघन निश्चित रूप से हुए हैं। मैंने इस विषय पर सचिव (MeitY) से चर्चा की है और मंत्रालय द्वारा एक व्यापक नीति तैयार करने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।”
2. प्रशांत भूषण का पक्ष: क्रिप्टोग्राफिक साइनिंग व ओपन जस्टिस:
- वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुझाव दिया कि तकनीकी सुरक्षा के लिए डिजिटल वॉटरमार्किंग (Digital Watermarking) और क्रिप्टोग्राफिक सिग्नेचर (Cryptographic Signing) लागू किए जाने चाहिए:
- प्रत्येक आधिकारिक वीडियो पर एक सत्यापन योग्य डिजिटल मोहर हो, जिससे जनता और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स असली फुटेज और छेड़छाड़ की गई फर्जी/संपादित क्लिप्स के बीच तुरंत अंतर कर सकें।
- उन्होंने दलील दी कि अदालती वेबसाइट पर वॉटरमार्क युक्त आधिकारिक फुटेज उपलब्ध होनी चाहिए ताकि विधिक टिप्पणीकार और पत्रकार इसका उपयोग कर सकें।
- पूर्व अनुमति की अनिवार्यता पर आपत्ति:
- श्री भूषण ने तर्क दिया कि यदि किसी पत्रकार, यूट्यूबर या कानूनी टिप्पणीकार को रिपोर्टिंग के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल से हर बार पूर्व अनुमति (Prior Permission) लेनी पड़ेगी, तो यह स्वप्निल त्रिपाठी मामले में स्थापित ओपन जस्टिस (खुली अदालत) के सिद्धांत के विपरीत होगा।
- इसके उत्तर में पीठ ने स्पष्ट किया कि पत्रकारिता और अनधिकृत सनसनीखेज संपादन के बीच संतुलन बनाने की समस्या की विस्तृत समीक्षा उचित समय पर की जाएगी।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं विधिक पृष्ठभूमि |
| मूल वाद का शीर्षक | हर्षिता ग्रोवर बनाम भारत संघ व अन्य [W.P.(C) No. 751/2026] |
| पीठासीन पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| याचिका का मूल उद्देश्य | डिजिटल प्लेटफॉर्मों (यूट्यूब, इंस्टाग्राम, एक्स आदि) पर अदालती कार्यवाहियों के अनधिकृत संपादन, चुनिंदा क्लिप्स निकालकर सनसनी फैलाने, जजों व वकीलों की छवि धूमिल करने तथा वीडियो के मुद्रीकरण (Monetisation) पर रोक लगाने हेतु दिशा-निर्देश तैयार करना। |
| पूर्व अंतरिम आदेश (24 जुलाई 2026) | शीर्ष अदालत ने बिना सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के अदालती लाइव-स्ट्रीमिंग की ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग के अपलोड, संचलन और सोशल मीडिया पर साझा करने पर पूर्ण रोक लगाई थी। |
| पूर्व स्पष्टीकरण (4 अगस्त 2026) | अदालत ने स्पष्ट किया था कि यह रोक मान्यता प्राप्त समाचार संगठनों द्वारा सामान्य अदालती रिपोर्टिंग पर लागू नहीं होती; किंतु समाचार माध्यम भी बिना अनुमति के वीडियो/ऑडियो क्लिप्स का सीधा प्रसारण या संचलन नहीं कर सकते। |
| उच्च न्यायालयों का तकनीकी मॉडल | न्यायमूर्ति बागची ने बताया कि कई उच्च न्यायालयों ने प्रशासनिक स्तर पर ऐसी व्यवस्था की है जिससे उनके आधिकारिक यूट्यूब चैनल या स्ट्रीमिंग लिंक से सीधे वीडियो को डाउनलोड या ‘एक्सट्रैक्ट’ (Extract) नहीं किया जा सकता। |
| अदालत का वर्तमान आदेश | MeitY द्वारा बनाई जा रही नीति में अदालती आदेशों के उल्लंघनकर्ताओं के विरुद्ध दंडात्मक उपायों को शामिल करने का निर्देश। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘ओपन जस्टिस बनाम अदालती कार्यवाही का सनसनीखेज दुरुपयोग’
- ‘ओपन जस्टिस’ का वास्तविक संवैधानिक अर्थ:
- स्वप्निल त्रिपाठी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि लाइव-स्ट्रीमिंग नागरिकों के सूचना के अधिकार और न्याय तक पहुंच (Access to Justice) को सुदृढ़ करती है।
- किंतु यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है। अदालती कार्यवाही कोई मनोरंजन या व्यावसायिक सामग्री (Commercial Content) नहीं है। जब सोशल मीडिया चैनल संदर्भ से काटकर (Out of context) 30-सेकंड की क्लिप्स बनाते हैं और ‘जज ने वकील को धो दिया’ जैसे सनसनीखेज शीर्षकों के साथ व्यूज और विज्ञापन राजस्व बटोरते हैं, तो यह न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को नष्ट करता है।
- MeitY नीति और मध्यवर्ती दायित्व (Intermediary Liability under IT Rules):
- आईटी नियम, 2021 के नियम 3 के तहत सोशल मीडिया मध्यवर्तियों (यूट्यूब, मेटा आदि) का यह ‘ड्यू डिलिजेंस’ दायित्व है कि वे ऐसी किसी भी सामग्री को होस्ट न करें जो कानूनन निषिद्ध या अदालत की अवमानना करती हो।
- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद MeitY की नीति में ऐसा विधिक प्रावधान शामिल करना अनिवार्य होगा जिससे अनधिकृत अदालती क्लिप्स को ‘टेकडाउन’ करने के लिए 24 से 36 घंटे की सख्त समयसीमा और बार-बार उल्लंघन करने वाले चैनलों के मुद्रीकरण को फ्रीज करने का तंत्र स्थापित हो सके।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक जनहित क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: हर्षिता ग्रोवर बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition (Civil) No. 751/2026]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
- आदेश की तिथि: 30 अक्टूबर 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- केंद्र सरकार की ओर से: भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta)।
- मध्यवर्ती/हितधारकों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण (Senior Advocate Prashant Bhushan)।
- मूल याचिकाकर्ता की ओर से: संबंधित पैरवीकार अधिवक्ता।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (न्यायिक शुचिता व गरिमा), अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), एवं अनुच्छेद 142
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) — धारा 79 (मध्यवर्ती प्लेटफॉर्म्स का विधिक दायित्व) एवं आईटी नियम, 2021
- न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) — धारा 2(c) (न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप व आपराधिक अवमानना)
- अदालती कार्यवाहियों की लाइव-स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग हेतु मॉडल नियम (Model Rules for Live Streaming and Recording of Court Proceedings)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- अदालती लाइव-स्ट्रीमिंग के विधिक नियमन का मानक: ‘न्यायालयों की लाइव-स्ट्रीमिंग न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और जन-जागरूकता के उद्देश्य से की जाती है; किसी भी व्यक्ति, डिजिटल प्लेटफॉर्म अथवा सोशल मीडिया चैनल को अदालती फुटेज को बिना सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के काटने, संदर्भ से बाहर संपादित करने अथवा वित्तीय मुद्रीकरण (Monetisation) के लिए उपयोग करने का कोई विधिक अधिकार नहीं है; MeitY द्वारा बनाई जाने वाली नीति में ऐसे अनधिकृत प्रसार और उल्लंघनों के विरुद्ध स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान होना अनिवार्य है; साथ ही, प्रामाणिक और फर्जी क्लिप्स में भेद करने हेतु डिजिटल वॉटरमार्किंग जैसे तकनीकी सुरक्षा उपाय विकसित किए जाने चाहिए।’
- वर्तमान स्थिति: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार (MeitY) को हितधारकों के सुझावों और अदालती अंतरिम आदेशों के उल्लंघनों पर कार्रवाई की स्पष्ट रूपरेखा तैयार कर अपनी प्रस्तावित नीति में समाहित करने का निर्देश दिया है; मामले की अगली सुनवाई पर नीति के मसौदे की समीक्षा की जाएगी।
Trial Streaming:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| मामला/साइटेशन | हर्षिता ग्रोवर बनाम भारत संघ व अन्य (Harshita Grover v. Union of India & Ors) |
| केंद्र सरकार का पक्ष | सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta) |
| सुझावकर्ता/अधिवक्ता | वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण (Advocate Prashant Bhushan) |
| मूल विवाद | लाइव कोर्ट कार्यवाही की क्लिप्स का मीम्स बनाने, बिना अनुमति यूट्यूब/सोशल मीडिया पर प्रसारित करने और उनसे आर्थिक कमाई (Commercial Exploitation) करने पर रोक। |
| अदालत का रुख | 1. MeITy नीति में पेनाल्टी शामिल होगी: लाइव स्ट्रीम क्लिप्स के गलत इस्तेमाल पर दंडात्मक प्रावधान होंगे। 2. बिना अनुमति वीडियो कमाई पर रोक: प्रामाणिक क्लिप्स का भी व्यावसायिक उपयोग/कमर्शियलाइजेशन नहीं किया जा सकता। 3. वॉटरमार्किंग व सुरक्षा: प्रशासनिक स्तर पर डिजिटल वॉटरमार्किंग और डाउनलोड रोकने के तकनीकी उपायों पर विचार। |

