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मामले की पृष्ठभूमि और पक्षकारों के तर्क
- KAT का जून 2025 का अस्वीकृति आदेश:याचिकाकर्ता सूर्यकांत ने केएटी के समक्ष अपना मूल आवेदन कन्नड़ भाषा में दाखिल करने की अनुमति मांगी थी। ट्रिब्यूनल ने 1986 के नियमों के नियम 3 का हवाला देकर अर्जी खारिज कर दी थी, जिसमें कहा गया था कि ट्रिब्यूनल की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है।
- हाईकोर्ट में चुनौती:सूर्यकांत ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए तर्क दिया कि 1986 के नियमों का नियम 3 और 1990 के प्रैक्टिस नियमों का नियम 9(iii) स्पष्ट रूप से कन्नड़ में दस्तावेज और याचिकाएं जमा करने की अनुमति देता है। राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि न्यायाधिकरण के समक्ष सभी दलीलें अंग्रेजी में ही प्रस्तुत की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष
1. 1990 के नियमों के तहत भाषा का अधिकार:
हाईकोर्ट ने पाया कि 1990 के नियमों के नियम 9(iii) के अनुसार, न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले सभी प्लीडिंग्स, हलफनामे, ज्ञापन और दस्तावेजों की सूची अंग्रेजी या कन्नड़ में टाइप की जा सकती हैं। ट्रिब्यूनल ने इस महत्वपूर्ण प्रावधान को अनदेखा करके गलती की थी।
2. अंतिम आदेश अंग्रेजी में होना अनिवार्य:
अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पक्षकार अपनी याचिकाएं कन्नड़ में दायर कर सकते हैं और पीठ कार्यवाही के दौरान कन्नड़ के उपयोग की अनुमति दे सकती है, लेकिन विधिक रिकॉर्ड और आगे की अपीलों की सुगमता के लिए ट्रिब्यूनल का अंतिम आदेश अंग्रेजी में ही पारित किया जाएगा।
बेंगलुरु: प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 (Administrative Tribunals Act, 1985), कर्नाटक प्रशासनिक अधिकरण (प्रक्रिया) नियम, 1986 (KAT Procedure Rules, 1986) के नियम 3 (अधिकरण की भाषा एवं क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग का विधिक दायरा), कर्नाटक प्रशासनिक अधिकरण प्रैक्टिस नियम, 1990 (KAT Rules of Practice, 1990) के नियम 9(iii) (अभिवचनों, शपथ-पत्रों व दस्तावेजों में अंग्रेजी या कन्नड़ के विकल्प की वैधानिक अनुमति), तथा न्याय तक भाषाई पहुंच के विधिक सिद्धांतों (Linguistic Access to Justice & Regional Language Pleadings) पर कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण, प्रगतिशील और नज़ीरी फैसला सुनाया है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अशोक एस. किनागी (Justice Ashok S. Kinagi) और न्यायमूर्ति सुब्रमण्य रंगाराव (Justice Subramanya Rangarao) की खंडपीठ ने कर्नाटक प्रशासनिक अधिकरण (KAT) द्वारा जून 2025 में पारित उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत याचिकाकर्ता सूर्यकांत (Suryakanth) द्वारा कन्नड़ भाषा में दायर किए गए मूल आवेदन (Original Application) और अंतरिम अर्जी को खारिज कर दिया गया था।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी कि वादकारियों द्वारा KAT के समक्ष कन्नड़ में आवेदन या याचिकाएं दाखिल करने पर कानूनन कोई पूर्ण प्रतिबंध (No Complete Embargo) नहीं है। 1990 के नियमों का नियम 9(iii) स्पष्ट रूप से सभी अभिवचनों (Pleadings) और दस्तावेजों को अंग्रेजी या कन्नड़ दोनों में से किसी भी भाषा में टाइप कराकर प्रस्तुत करने की स्पष्ट वैधानिक अनुमति देता है। अधिकरण का एकमात्र विवेक यह है कि वह कार्यवाहियों के दौरान कन्नड़ के मौखिक प्रयोग की अनुमति दे सकता है, बशर्ते कि अधिकरण का अंतिम निर्णय/आदेश अंग्रेजी भाषा में पारित किया जाए (Final order should be in English)।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘कन्नड़ में आवेदन दाखिल करने पर कोई पूर्ण पाबंदी नहीं; अभिवचनों में आवेदन शामिल हैं’:
न्यायमूर्ति अशोक एस. किनागी और न्यायमूर्ति सुब्रमण्य रंगाराव की खंडपीठ ने 1990 के प्रैक्टिस नियमों के नियम 9(iii) और 1986 के प्रक्रिया नियमों के नियम 3 के सामंजस्यपूर्ण विश्लेषण के उपरांत अपने 7 अक्टूबर के निर्णय में स्पष्ट किया: “वादकारियों की ओर से कन्नड़ भाषा में आवेदन दाखिल करने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध (No complete embargo) नहीं है। पक्षकार 1990 के नियमों के नियम 9(iii) के प्रावधानों के तहत कन्नड़ में अपना आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त 1986 के नियम यह प्रावधान करते हैं कि अधिकरण की पीठ, अपने विवेकाधिकार से, कार्यवाहियों के संचालन के दौरान कन्नड़ के प्रयोग की अनुमति दे सकती है, जो केवल इस शर्त के अधीन होगा कि अधिकरण का अंतिम आदेश अंग्रेजी में होना चाहिए (Final order should be in English)।”
2. ‘अधिकरण ने बुनियादी कानूनी प्रावधान की अनदेखी कर गंभीर त्रुटि की’:
- खंडपीठ ने KAT द्वारा सूर्यकांत के कन्नड़ आवेदन को खारिज किए जाने के दृष्टिकोण की तीखी आलोचना की:*”1990 के नियमों के नियम 9(iii) में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान है कि अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले सभी अभिवचन (Pleadings), हलफनामे, ज्ञापन, दस्तावेजों की सूचियां और दस्तावेज अंग्रेजी या कन्नड़ में टाइप किए हुए होने चाहिए।इस प्रकार, याचिकाकर्ता ने 1990 के नियमों के नियम 9 के खंड (iii) के अनुसार कन्नड़ भाषा में आवेदन दाखिल करके कोई गलती नहीं की थी। अधिकरण ने आक्षेपित आदेश पारित करते समय इस बुनियादी वैधानिक पहलू पर विचार नहीं किया और आवेदन को खारिज करके गंभीर कानूनी त्रुटि की।”*
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2025–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| याचिकाकर्ता पक्ष | सूर्यकांत (Suryakanth) — कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) और राज्य सरकार के विरुद्ध सेवा मामले में अनुतोष चाहने वाला वादकारी। |
| प्रतिवादी पक्ष | कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) एवं कर्नाटक राज्य सरकार। |
| याचिकाकर्ता के अधिवक्ता | अधिवक्ता शंकर कट्टीमनी (Advocate Shankar Kattimani)। |
| विवाद की पृष्ठभूमि (जून 2025) | सूर्यकांत ने कर्नाटक प्रशासनिक अधिकरण (KAT) के समक्ष एक अंतरिम आवेदन दायर कर अपने मूल सेवा वाद (Original Application) को कन्नड़ भाषा में प्रस्तुत करने की औपचारिक अनुमति मांगी थी। |
| KAT का खारिज आदेश (जून 2025) | अधिकरण ने KAT (प्रक्रिया) नियम, 1986 के नियम 3 का संकीर्ण हवाला देते हुए याचिकाकर्ता की अर्जी खारिज कर दी। अधिकरण का मानना था कि चूंकि नियम 3 अधिकरण की भाषा के रूप में ‘अंग्रेजी’ को निर्धारित करता है, इसलिए मूल अभिवचन कन्नड़ में स्वीकार नहीं किए जा सकते। |
| राज्य सरकार का विधिक रुख | उच्च न्यायालय के समक्ष राज्य सरकार ने अधिकरण के आदेश का समर्थन किया और दलील दी कि प्रशासनिक अधिकरण के समक्ष सभी औपचारिक अभिवचन अनिवार्य रूप से अंग्रेजी में ही दिए जाने चाहिए। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | रिट याचिका स्वीकार (Allowed); अधिकरण का जून 2025 का आक्षेपित आदेश रद्द (Quashed); सूर्यकांत का अंतरिम आवेदन (कन्नड़ में अभिवचन दाखिल करने की अनुमति) स्वीकृत; मूल आवेदन को बहाल करते हुए अधिकरण को कानून के अनुसार शीघ्र निस्तारण का निर्देश दिया गया। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘1986 के नियम 3 बनाम 1990 के नियम 9(iii) का सामंजस्य’
- 1990 के नियमों के नियम 9(iii) का व्यापक दायरा:
- कर्नाटक प्रशासनिक अधिकरण प्रैक्टिस नियम, 1990 का नियम 9(iii) अधिकरण के समक्ष दायर होने वाले दस्तावेजों की औपचारिकताएं तय करता है।
- इसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया है: “All pleadings, affidavits, memoranda, lists of documents and documents presented before the Tribunal must be typewritten in English or Kannada.”
- कानून में ‘अभिवचन’ (Pleadings) शब्द के अंतर्गत वादपत्र, मूल आवेदन, प्रत्युत्तर और विविध आवेदन सभी शामिल होते हैं। अतः जब नियम स्वयं वादकारी को ‘अंग्रेजी या कन्नड़’ का वैधानिक विकल्प प्रदान करता है, तो अधिकरण प्रशासनिक आदेश से इस विधायी अधिकार को छीन नहीं सकता।
- 1986 के नियम 3 की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या (Harmonious Construction):
- अधिकरण ने नियम 3 को गलत समझा था। नियम 3 का उद्देश्य अंग्रेजी को संपर्क और अभिलेख की भाषा बनाना है, न कि स्थानीय भाषा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना।
- नियम 3 स्वयं यह उपबंधित करता है कि:
- पक्षकार कन्नड़ में दस्तावेज दाखिल कर सकते हैं।
- अधिकरण की पीठ को यह अधिकार है कि वह कार्यवाहियों के दौरान तर्कों और बयानों में कन्नड़ के प्रयोग की अनुमति दे।
- केवल एक विधिक प्रतिबंध है: अधिकरण द्वारा पारित किया जाने वाला अंतिम आदेश/निर्णय अंग्रेजी भाषा में होना चाहिए, ताकि उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226/227 के तहत न्यायिक समीक्षा के समय कोई भाषाई व्यवधान न आए।
- न्याय तक भाषाई पहुंच (Access to Justice):
- उच्च न्यायालय का यह दृष्टिकोण आम नागरिकों, विशेषकर राज्य के दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले सरकारी कर्मचारियों और अभ्यर्थियों के अधिकारों को सुगम बनाता है।
- यदि किसी राज्य अधिकरण में राज्य की आधिकारिक राजभाषा (कन्नड़) में अपनी पीड़ा व्यक्त करने पर ही रोक लगा दी जाए, तो यह न्याय तक पहुंच के संवैधानिक अधिकार को संकुचित करता है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: कर्नाटक उच्च न्यायालय, मुख्य पीठ बेंगलुरु (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: सूर्यकांत बनाम कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) व अन्य [Suryakanth v. KPSC]
- पीठ: न्यायमूर्ति अशोक एस. किनागी एवं न्यायमूर्ति सुब्रमण्य रंगाराव (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: 7 अक्टूबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: याचिका पूर्णतः स्वीकार; अधिकरण का जून 2025 का आदेश निरस्त; कन्नड़ में मूल आवेदन दाखिल करने की अनुमति मंजूर; KAT को मेरिट पर सुनवाई का आदेश।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (सूर्यकांत) की ओर से: अधिवक्ता शंकर कट्टीमनी (Advocate Shankar Kattimani)।
- प्रतिवादी पक्ष (KPSC व राज्य सरकार) की ओर से: राज्य के संबंधित सरकारी वकील।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- कर्नाटक प्रशासनिक अधिकरण प्रैक्टिस नियम, 1990 (KAT Rules of Practice, 1990) — नियम 9(iii) (अभिवचनों व दस्तावेजों को अंग्रेजी या कन्नड़ में टाइप कराने की छूट)
- कर्नाटक प्रशासनिक अधिकरण (प्रक्रिया) नियम, 1986 (KAT Procedure Rules, 1986) — नियम 3 (अधिकरण की भाषा, कन्नड़ कार्यवाहियों की अनुमति एवं अंग्रेजी में अंतिम आदेश की शर्त)
- प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 (Administrative Tribunals Act, 1985) — अधिकरणों का गठन व प्रक्रियात्मक शक्तियां
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 व 227 (उच्च न्यायालय का अधीक्षण क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- प्रशासनिक अधिकरणों में क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग का विधिक मानक: ‘कर्नाटक प्रशासनिक अधिकरण (KAT) के समक्ष वादकारियों द्वारा कन्नड़ भाषा में आवेदन, याचिकाएं और अभिवचन दाखिल करने पर कोई पूर्ण पाबंदी नहीं है; 1990 के नियमों का नियम 9(iii) अंग्रेजी या कन्नड़ दोनों भाषाओं में अभिवचन दाखिल करने का स्पष्ट अधिकार देता है; अधिकरण कार्यवाहियों में कन्नड़ भाषा के प्रयोग की अनुमति दे सकता है, बशर्ते कि अधिकरण का अंतिम आदेश अनिवार्य रूप से अंग्रेजी में पारित किया जाए; अधिकरणों द्वारा ऐसे बुनियादी भाषाई और प्रक्रियात्मक अधिकारों को यांत्रिक रूप से नकारा नहीं जा सकता।’
- वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: कर्नाटक हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद अब राज्य भर के सभी कर्मचारी, शिक्षक और KPSC अभ्यर्थी बिना किसी हिचक के अपने मूल आवेदन और सहायक दस्तावेज कन्नड़ भाषा में KAT की सभी पीठों (बेंगलुरु, बेलगावी, कलबुर्गी) के समक्ष दाखिल कर सकेंगे; सूर्यकांत के मूल आवेदन को बहाल कर अधिकरण को अब गुण-दोष के आधार पर अंतिम फैसला सुनाने के निर्देश दिए गए हैं।
Kannada Language: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court), बेंगलुरु |
| पीठ | न्यायमूर्ति अशोक एस. किनागी एवं न्यायमूर्ति सुब्रमण्य रंगराव |
| मामला/साइटेशन | सूर्यकांत बनाम केपीएससी (Suryakanth v. KPSC) |
| याचिकाकर्ता | सूर्यकांत | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता शंकर कट्टीमनी |
| मूल विवाद | KAT द्वारा कन्नड़ भाषा में मूल आवेदन (Original Application) दाखिल करने की अनुमति से इनकार करना। |
| संबंधित नियम | KAT (प्रक्रिया) नियम 1986 का नियम 3 एवं KAT प्रैक्टिस नियम 1990 का नियम 9(iii)। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | KAT का आदेश रद्द: कन्नड़ में याचिका दाखिल करने की अनुमति; न्यायाधिकरण को कानून के अनुसार मूल आवेदन का निपटारा करने का निर्देश। |

