Friday, November 6, 2026
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Purchase Tax: 27 साल पुराने 7-जजों के संदर्भ पर ऐतिहासिक फैसला; बिक्री कर पर अधिभार या सेस लगाना राज्य विधानमंडलों की पूर्ण विधायी सक्षमता में; यह आय पर Tax नहीं

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मामले की पृष्ठभूमि और 27 साल पुराना कानूनी विवाद

  1. ओडिशा बिक्री कर अधिनियम, 1947 की धारा 5A को चुनौती:यह विवाद Orissa Sales Tax Act, 1947 की धारा 5A के खिलाफ उत्पन्न हुआ था, जिसके तहत ₹10 लाख से ₹1 करोड़ तक के टर्नओवर वाले व्यापारियों पर 10% और ₹1 करोड़ से अधिक टर्नओवर वालों पर 15% अतिरिक्त बिक्री कर लगाया गया था। व्यापारियों ने तर्क दिया था कि यह वास्तव में आय पर कर (Tax on Income) है, जो संघ सूची (Entry 82, List I) के तहत केवल संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
  2. परस्पर विरोधी अदालती निर्णय और 1999 का संदर्भ:
    • S Kodar (5-न्यायाधीश पीठ): बिक्री कर पर अतिरिक्त अधिभार को वैध ठहराया गया था।
    • Hoechst Pharmaceuticals (3-न्यायाधीश पीठ): सर्चार्ज को बिक्री कर का ही रूप माना गया था।
    • India Cement (7-न्यायाधीश पीठ): इसमें खनन रॉयल्टी पर उपकर (Cess) को अमान्य किया गया था, जिसका हवाला देकर व्यापारियों ने 1999 में 7-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष इस संदर्भ को भिजवाया था।
  3. MADA (9-न्यायाधीश पीठ) का प्रभाव और GST का आगमन:सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रेखांकित किया कि 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद यह विवाद केवल अकादमिक रह गया है। इसके अलावा, हाल ही में 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ‘मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी’ (MADA v. SAIL) मामले में India Cement के फैसले को निरस्त कर दिया था, जिससे S Kodar नजीर की प्रामाणिकता पुनः स्थापित हो गई थी।

सहमति पत्र (Concurring Opinion) और विधिक निष्कर्ष

न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन (Justice KV Viswanathan) ने मामले में सहमति पत्र लिखते हुए व्याख्या की: “S Kodar मामले में बिल्कुल सही माना गया था कि राज्य सरकार द्वारा वार्षिक टर्नओवर सीमा के आधार पर व्यापारियों पर अतिरिक्त बिक्री कर लगाने की विधायी क्षमता राज्य सूची की प्रविष्टि 54 के तहत ही आती है। इसे व्यापारी की आय पर कर मानकर असंवैधानिक या क्षेत्राधिकार से बाहर (Ultra Vires) घोषित नहीं किया जा सकता।”

मुख्य विधिक निष्कर्ष

1. राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता (Fiscal Autonomy):

यह निर्णय दोहराता है कि बिक्री कर की दर तय करना और उस पर अतिरिक्त अधिभार लगाना राज्यों का संवैधानिक अधिकार है, बशर्ते वह कर के मूल स्वरूप (Sale/Purchase of Goods) को न बदले।

2. पुरानी मुकदमेबाजी का अंत:

27 वर्षों से लंबित इस संदर्भ के निपटारे से राज्यों के वैट/बिक्री कर युग के लंबित कर विवादों पर अंतिम विधिक मुहर लग गई है।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 246 सहपठित सातवीं अनुसूची की सूची II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 54 (वस्तुओं के क्रय या विक्रय पर कर लगाने की राज्य की विधायी शक्ति—जीएसटी पूर्व स्वरूप), सूची I (संघ सूची) की प्रविष्टि 82 (कृषि आय से भिन्न आय पर कर लगाने का संसद का अनन्य अधिकार), कराधान न्यायशास्त्र में ‘पिथ एंड सब्सटेंस’ (Doctrine of Pith and Substance) का सिद्धांत, वस्तु एवं सेवा कर (GST) के 2017 में लागू होने के उपरांत पुराने कर विवादों की प्रासंगिकता, तथा पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के विख्यात निर्णय एस. कोदर बनाम केरल राज्य [(1974) 4 SCC 98] की वैधानिक वैधता पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय की 7-न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Seven-Judge Constitution Bench) ने 27 वर्षों से लंबित कानूनी संदर्भ का निर्णायक निपटारा कर दिया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant), न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन (Justice KV Viswanathan), न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी (Justice SVN Bhatti), न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi), न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया (Justice NV Anjaria), न्यायमूर्ति अरुण पल्ली (Justice Arun Palli) और न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana) की सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय सुनाते हुए राज्य विधानमंडलों की उस विधायी शक्ति को बरकरार रखा है जिसके तहत वे मौजूदा बिक्री कर या खरीद कर पर अतिरिक्त कर (Additional Tax), अधिभार (Surcharge) या उपकर (Cess) अधिरोपित कर सकते हैं।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि 2017 में जीएसटी लागू होने और पुराने राज्य बिक्री कर कानूनों के निरस्त/प्रतिस्थापित हो जाने के कारण यह प्रश्न अब काफी हद तक अकादमिक (Academic) और व्यावहारिक महत्व से रहित हो चुका है। इसके बावजूद, संविधान पीठ ने पांच-न्यायाधीशों की पीठ के 50 वर्ष पुराने फैसले एस. कोदर बनाम केरल राज्य (1974) की पूर्ण पुष्टि करते हुए व्यवस्था दी कि बिक्री कर की देयता के प्रतिशत के रूप में वसूला जाने वाला कोई भी अधिभार या अतिरिक्त कर केवल बिक्री कर की दर की वृद्धि (Enhancement of the rate of sales tax) है, और यह राज्य सूची की प्रविष्टि 54 के दायरे में ही आता है; इसे व्यापारी की ‘आय पर कर’ (Tax on Income) नहीं माना जा सकता।

संविधान पीठ के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘बिक्री कर का अधिभार मूलतः बिक्री कर ही है, आय पर कर नहीं; एस. कोदर नज़ीर आज भी प्रभावी’:

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा उच्चारित मुख्य निर्णय में संविधान पीठ ने 1974 के संविधान पीठ के फैसले की पुष्टि करते हुए स्पष्ट दर्ज किया: “हमने यह पूरी तरह स्पष्ट किया है कि एस. कोदर (S Kodar) मामले में यह अकाट्य रूप से तय किया गया था कि देय बिक्री कर के एक निश्चित प्रतिशत के रूप में आकलित किया जाने वाला कोई भी अतिरिक्त कर (Additional Tax) या अधिभार (Surcharge), मूलतः बिक्री कर की दर में वृद्धि (Enhancement of the rate of sales tax) ही है। यह तत्कालीन राज्य सूची (सूची II) की प्रविष्टि 54 के अंतर्गत वस्तुओं के क्रय या विक्रय पर कर के दायरे में आता है। वह निर्णय आज भी पूरी तरह से कानून के रूप में स्थापित और प्रभावी (Continues to hold the field) है। राज्य विधानमंडल की आक्षेपित अधिभार लगाने की विधायी सक्षमता (Legislative Competence) का प्रश्न ‘एस. कोदर’ में घोषित विधि द्वारा ही पूर्णतः शासित रहेगा।”

2. ‘जीएसटी के बाद प्रश्न व्यावहारिक महत्व से परे और अकादमिक’:

  • पीठ ने संदर्भ का उत्तर देते हुए कहा कि जिन राज्य अधिनियमों के तहत ये अधिभार लगाए गए थे, वे सभी कानून अब वैधानिक रूप से प्रतिस्थापित या निरस्त हो चुके हैं:“संदर्भित कानूनी प्रश्न का अब कोई व्यावहारिक महत्व नहीं रह गया है और यह काफी हद तक अकादमिक (Of no practical significance and now academic) हो चुका है। परिणामस्वरूप, यह प्रश्न सात-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा विस्तृत न्यायिक अधिनिर्णय के लिए अब जीवित नहीं बचता है, और इस संदर्भ का उत्तर तदनुसार दिया जाता है।”

3. न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की सहमतिपूर्ण राय (Concurring Opinion):

  • न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने अपने सहमतिपूर्ण फैसले में होचस्ट फार्मास्युटिकल्स और इंडिया सीमेंट के निर्णयों का गहन विश्लेषण करते हुए लिखा:“कोदर मामले में यह बिल्कुल सही ठहराया गया था कि किसी डीलर द्वारा देय बिक्री कर के संदर्भ में अतिरिक्त बिक्री कर लगाने की राज्य सरकार की विधायी सक्षमता—जहाँ डीलर का वार्षिक टर्नओवर एक न्यूनतम सीमा से अधिक हो और जहाँ इसका भार उपभोक्ताओं पर अंतरित न किया जा सके (No pass-through to consumers)—पूर्णतः राज्य सूची की प्रविष्टि 54 में वस्तुओं की बिक्री पर कर के रूप में खोजी जा सकती है।यह किसी भी प्रकार से डीलर की ‘आय पर कर’ (Tax on income) के रूप में अधिकार-विहीन (Ultra vires) नहीं है।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं 27 वर्षीय कानूनी कालक्रम (1947–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक संदर्भ क्षेत्राधिकार)
संविधान पीठ का गठन7-न्यायाधीशों की वृहद संविधान पीठ — मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन, न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची, न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया, न्यायमूर्ति अरुण पल्ली एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
निर्णय की तिथि4 नवंबर 2026
मूल वैधानिक प्रावधानओडिशा बिक्री कर अधिनियम, 1947 (Orissa Sales Tax Act, 1947) की धारा 5A।
• ₹10 लाख से ₹1 करोड़ वार्षिक टर्नओवर वाले डीलरों पर देय बिक्री कर पर 10% अतिरिक्त कर।
• ₹1 करोड़ से अधिक टर्नओवर वाले डीलरों पर देय बिक्री कर पर 15% अतिरिक्त कर।
अपीलकर्ताओं (व्यापारियों) के मुख्य तर्क1. उपभोक्ताओं पर भार न डालना: चूंकि कानून डीलरों को इस अतिरिक्त कर को ग्राहकों से वसूलने (Pass-through) से रोकता है, इसलिए इसका भुगतान डीलर को अपने शुद्ध लाभ/आय से करना पड़ता है।
2. विधायी सक्षमता का अभाव: यह कर वस्तुतः ‘आय पर कर’ (Tax on Income) बन जाता है, जो संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची (सूची I) की प्रविष्टि 82 के तहत केवल संसद के अनन्य अधिकार क्षेत्र में है; राज्य सूची की प्रविष्टि 54 के तहत राज्य इसे नहीं लगा सकते।
3. नज़ीरों का टकराव: व्यापारियों ने तर्क दिया कि होचस्ट फार्मास्युटिकल्स बनाम बिहार राज्य (1983) का फैसला विधायी सक्षमता की रियायत पर आधारित था, और 7-जजों की पीठ के फैसले इंडिया सीमेंट बनाम तमिलनाडु राज्य (1989) के अनुसार उपकर/सेस मूल विषय से अलग हो सकता है।
संदर्भ का उद्भव (वर्ष 1999)एस. कोदर (1974), होचस्ट (1983) और इंडिया सीमेंट (1989) के परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों और तर्कों के समाधान हेतु लगभग 27 वर्ष पूर्व (1999 में) यह प्रश्न सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजा गया था।
केंद्र व राज्यों की ओर से दलीलें (SG तुषार मेहता)• सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 22 सितंबर को दलील दी थी कि 1 जुलाई 2017 से वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के बाद सभी पुराने बिक्री कर अधिनियम समाप्त हो चुके हैं; अतः अब यह विवाद केवल अकादमिक बचा है।
• इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय की 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने हाल ही में मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MADA) बनाम सेल में इंडिया सीमेंट के फैसले को पूरी तरह खारिज/ओवररूल कर दिया है।
संविधान पीठ का अंतिम निर्णयसंदर्भ का निस्तारण; एस. कोदर (1974) का फैसला वैध ठहराया गया; राज्यों द्वारा बिक्री कर पर अधिभार लगाने की विधायी शक्ति की पुष्टि की गई।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘प्रविष्टि 54 (बिक्री कर) बनाम प्रविष्टि 82 (आयकर)’

  • ‘एस. कोदर बनाम केरल राज्य’ [(1974) 4 SCC 98] का विधिक आधार:
    • 1974 में जस्टिस के.के. मैथ्यू की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने केरल सामान्य बिक्री कर अधिनियम के तहत लगाए गए अतिरिक्त बिक्री कर को वैध ठहराया था।
    • अदालत ने माना था कि बिक्री कर लगाने का अधिकार केवल साधारण दर तक सीमित नहीं है। राज्य विधानमंडल प्रगतिशील कराधान (Progressive Taxation) के तहत बड़े व्यापारियों पर उच्च दर लागू करने के लिए अतिरिक्त कर या अधिभार का उपयोग कर सकते हैं।
    • उपभोक्ता पर पास-थ्रू न होना: यह एक नीतिगत निर्णय है। केवल इसलिए कि राज्य कानून किसी डीलर को यह अतिरिक्त बोझ ग्राहक पर डालने से रोकता है, वह कर ‘आय पर कर’ में परिवर्तित नहीं हो जाता। कर योग्य घटना (Taxable Event) अब भी “वस्तु का क्रय या विक्रय” ही है, न कि डीलर का शुद्ध वार्षिक लाभ।
  • ‘कराधान का पैमाना’ (Measure of Tax) और विधायी सक्षमता:
    • न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने रेखांकित किया कि किसी कर की विधायी सक्षमता इस बात से तय होती है कि कर का वास्तविक विषय (Subject Matter of Tax) क्या है, न कि केवल इस बात से कि उसकी गणना कैसे की जाती है।
    • चूंकि अधिभार की गणना देय बिक्री कर के प्रतिशत के रूप में की जाती है, इसलिए यह अनिवार्य रूप से बिक्री कर का ही संवर्धन (Enhancement of Sales Tax) है। इसे संघ सूची की प्रविष्टि 82 के तहत आयकर के रूप में देखना संविधान के संघीय वित्तीय संतुलन को बिगाड़ना होगा।
  • ‘इंडिया सीमेंट’ का निरसन और ‘MADA’ नज़ीर का प्रभाव:
    • इंडिया सीमेंट बनाम तमिलनाडु राज्य [(1990) 1 SCC 12] में सात जजों की पीठ ने कहा था कि रॉयल्टी पर सेस लगाना रॉयल्टी पर ही कर है।
    • किंतु हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MADA) बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) में यह स्पष्ट व्यवस्था दी कि इंडिया सीमेंट का यह निष्कर्ष कानूनी रूप से गलत था कि “रॉयल्टी एक कर है”। इसके साथ ही इंडिया सीमेंट का आधार समाप्त हो गया था, जिससे एस. कोदर और होचस्ट फार्मास्युटिकल्स के सिद्धांत पूरी तरह से निष्कंटक हो गए।

विधिक विवरण एवं उपस्थित पक्षकार

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (7-न्यायाधीशों की संविधान पीठ)
  • केस संदर्भ: ओडिशा सेल्स टैक्स एक्ट संदर्भ / दीवानी अपील समूह [Civil Appeal No. … of 1999 / 2026]
  • संविधान पीठ के सदस्य:
    1. मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant) — मुख्य निर्णय के लेखक
    2. न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन (Justice KV Viswanathan) — सहमतिपूर्ण निर्णय के लेखक
    3. न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी (Justice SVN Bhatti)
    4. न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi)
    5. न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया (Justice NV Anjaria)
    6. न्यायमूर्ति अरुण पल्ली (Justice Arun Palli)
    7. न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana)
  • निर्णय की तिथि: 4 नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: सात-न्यायाधीशों की पीठ को भेजा गया संदर्भ निस्तारित; पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ का निर्णय एस. कोदर (1974) पूर्णतः बरकरार; राज्यों की अतिरिक्त कर लगाने की विधायी सक्षमता संपुष्ट।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • भारत संघ व संबंधित राज्यों की ओर से: भारत के सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta), राज्यों के महाधिवक्ता एवं वरिष्ठ विधि अधिकारी।
  • अपीलकर्ताओं (व्यापारियों व औद्योगिक संघों) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्तागण एवं वाणिज्यिक कर विशेषज्ञ।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारत का संविधान — सातवीं अनुसूची:
      • सूची II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 54 (वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर कर — पूर्व-जीएसटी)
      • सूची I (संघ सूची) की प्रविष्टि 82 (आय पर कर)
      • अनुच्छेद 246 (संसद और राज्यों के विधानमंडलों द्वारा बनाई गई विधियों की विषय-वस्तु)
    • ओडिशा बिक्री कर अधिनियम, 1947 (Orissa Sales Tax Act, 1947) — धारा 5A (अतिरिक्त कर का अधिरोपण)
    • केरल सामान्य बिक्री कर अधिनियम, 1963 एवं बिहार वित्त अधिनियम, 1981
    • संविधान (101वां संशोधन) अधिनियम, 2016 — वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था का समावेश
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • अतिरिक्त कराधान और राज्य विधायी सक्षमता का विधिक मानक: ‘राज्य विधानमंडल द्वारा मौजूदा बिक्री या खरीद कर पर लगाया जाने वाला कोई भी अतिरिक्त कर (Additional Tax), अधिभार (Surcharge) या उपकर (Cess) केवल बिक्री कर की दर की वृद्धि है और इसका मूल चरित्र संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 54 के तहत वस्तुओं की बिक्री पर कर का ही रहता है; यह तथ्य कि राज्य विधि बड़े टर्नओवर वाले डीलरों को इस कर का भार ग्राहकों पर डालने (Pass-through) से प्रतिबंधित करती है, इस कर को संघ सूची की प्रविष्टि 82 के तहत ‘आय पर कर’ में परिवर्तित नहीं करता; कर की गणना का पैमाना (Measure of Tax) कर की मौलिक प्रकृति (Nature of Tax) को नहीं बदल सकता; तथा एस. कोदर बनाम केरल राज्य [(1974) 4 SCC 98] में पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा घोषित विधि पूरी तरह सटीक है और आज भी प्रभावी कानून के रूप में लागू रहेगी।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: संविधान पीठ के इस फैसले के साथ ही 1999 से लंबित 27 साल पुराना यह ऐतिहासिक संवैधानिक गतिरोध हमेशा के लिए समाप्त हो गया है; यद्यपि जीएसटी व्यवस्था के तहत अब अधिकांश अप्रत्यक्ष कर समाहित हो चुके हैं, किंतु यह निर्णय जीएसटी-पूर्व लंबित करोड़ों रुपये के पुराने राज्य बिक्री कर विवादों, वैट अधिभारों और राज्यों की वित्तीय संप्रभुता के ऐतिहासिक अधिकारों को अंतिम विधिक सुरक्षा प्रदान करता है।

Purchase Tax: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठ (7-Judges Constitution Bench)CJI सूर्या कांत, न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन, न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची, न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया, न्यायमूर्ति अरुण पल्ली एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
फैसले की तिथि04 नवंबर 2026
मूल संदर्भ का इतिहास1999 में 7-न्यायाधीशों की पीठ को भेजा गया 27 साल पुराना विवाद (Orissa Sales Tax Act, 1947)
संवैधानिक प्रावधानराज्य सूची की प्रविष्टि 54 (Entry 54, List II – Sales/Purchase Tax) बनाम संघ सूची की प्रविष्टि 82 (Entry 82, List I – Income Tax)
पुष्टि की गई नजीरS Kodar v. State of Kerala (5-Judge Bench) एवं Hoechst Pharmaceuticals v. State of Bihar (3-Judge Bench)
अदालत का अंतिम निर्णयराज्यों के पक्ष में फैसला: राज्य विधानमंडलों के पास बिक्री कर पर अतिरिक्त अधिभार/सर्चार्ज लगाने की पूर्ण विधायी क्षमता है; इसे आय कर नहीं माना जा सकता।
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