FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp
मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी बहस
- सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट और मस्जिद का इतिहास:कृषि भवन परिसर में स्थित ‘कदीमी मस्जिद’ 100 साल से अधिक पुरानी है और यह भवन निर्माण से भी पहले की बताई जाती है। दिल्ली वक्फ बोर्ड ने 1970 में इसे वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित किया था। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत कृषि भवन के नए निर्माण और ध्वस्तीकरण की योजना के चलते मस्जिद समिति ने हाईकोर्ट का रुख किया था।
- याचिकाकर्ता की मांग (अनुच्छेद 25):वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद (Salman Khurshid) ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को रोकने की मांग नहीं कर रहे हैं। उनकी केवल इतनी मांग है कि संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत नवनिर्मित परिसरों में कर्मचारियों और नागरिकों के लिए एक उचित और समीपवर्ती प्रार्थना स्थल (Prayer Facility) की वैकल्पिक व्यवस्था की जाए।
- केंद्र सरकार का जवाब:केंद्र सरकार ने हलफनामे में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक प्रशासनिक क्षेत्र की किसी भी जमीन को किसी स्थायी धार्मिक उपयोग के लिए आरक्षित नहीं किया जा सकता। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर इंडिया गेट मस्जिद मौजूद है, इसलिए अलग से जगह देने की कोई आवश्यकता नहीं है।
मुख्य विधिक व प्रशासनिक बिंदु
1. सरकारी संपत्ति की तटस्थता:
केंद्र सरकार का तर्क है कि राज्य (State) की सार्वजनिक संपत्तियां पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष हैं और उन पर किसी भी समुदाय का स्थायी धार्मिक ढांचा बरकरार रखना या नया निर्माण करना प्रशासनिक तटस्थता के खिलाफ है।
2. 23 नवंबर की सुनवाई पर नजर:
अदालत ने केंद्र से पूछा है कि क्या सरकारी कार्यालयों में ऐसी किसी सुविधा को प्रतिबंधित करने का स्पष्ट वैधानिक नियम मौजूद है। इस पर 23 नवंबर को आगे विचार किया जाएगा।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 (अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता—इसकी विधिक सीमाएं), संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘पंथनिरपेक्षता’ (Secular Character of the State), अनुच्छेद 226 (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार), वक्फ अधिनियम, 1995 (Waqf Act, 1995) के तहत 1970 की वैधानिक वक्फ अधिसूचना, तथा सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना (Central Vista Redevelopment Project) के अंतर्गत सार्वजनिक भूमि के प्रशासनिक उपयोग के विधिक मानकों पर केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सैद्धांतिक हलफनामा दाखिल किया है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनीश दयाल (Justice Anish Dayal) की एकल पीठ के समक्ष केंद्र सरकार के आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) ने एक विस्तृत जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit) दाखिल कर स्पष्ट किया कि लुटियंस दिल्ली स्थित कृषि भवन परिसर में मौजूद सदी पुरानी ‘क़दीमी मस्जिद’ (Qadeemi Masjid) को ध्वस्त/हटाया (Demolished / Removed) जाएगा।
केंद्र सरकार ने विधिक रुख अपनाया कि केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र और सचिवालय परिसर विशुद्ध रूप से प्रशासनिक और सार्वजनिक सेवा कार्यों के लिए समर्पित पंथनिरपेक्ष परिसर हैं। किसी भी सरकारी कार्यालय परिसर के भीतर स्थायी धार्मिक संरचना का बने रहना अथवा नए भवन में धार्मिक स्थल की मांग करना “सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के साथ असंगत और कानूनन अस्वीकार्य (Impermissible and incompatible with the secular character of government property)” है। सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने केंद्र से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या ऐसा कोई लिखित नियम या नीति है जो सरकारी परिसर में किसी भी समुदाय के लिए प्रार्थना स्थल रखने पर पूर्ण रोक लगाती हो।
केंद्र सरकार के हलफनामे के मुख्य कानूनी आधार एवं रुख
1. ‘सरकारी कार्यालय परिसर में स्थायी धार्मिक ढांचा धर्मनिरपेक्ष चरित्र के विपरीत’:
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में संविधान के पंथनिरपेक्ष चरित्र और प्रशासनिक भूमि की विधिक स्थिति को रेखांकित करते हुए कहा: “कृषि भवन और केंद्रीय सचिवालय परिसर विशुद्ध रूप से पंथनिरपेक्ष परिसर (Secular Premises) हैं, जो अनन्य रूप से केवल सरकारी, प्रशासनिक और सार्वजनिक सेवा के कार्यों के लिए समर्पित हैं। किसी केंद्रीय सरकारी कार्यालय परिसर की सीमाओं के भीतर किसी स्थायी धार्मिक संरचना (Permanent Religious Structure) की स्थापना करना, उसे बनाए रखना, अथवा ऐसे किसी ढांचे की मांग करना—पूरी तरह से अस्वीकार्य (Impermissible) और सरकारी संपत्ति के पंथनिरपेक्ष चरित्र के असंगत (Incompatible with secular character) है। केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र के भीतर स्थित सार्वजनिक भूमि को किसी भी स्थायी धार्मिक आरक्षण (Permanent Religious Reservation) से भारित/बाधित नहीं किया जा सकता।”
2. ‘दो किलोमीटर के दायरे में इंडिया गेट मस्जिद उपलब्ध है’:
- केंद्र सरकार ने नमाजियों और कर्मचारियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था का उल्लेख करते हुए हलफनामे में दर्ज किया:“कृषि भवन से दो किलोमीटर के दायरे में इंडिया गेट (C-Hexagon) पर एक पूर्णतः क्रियाशील मस्जिद स्थित है, जो निकटवर्ती प्रार्थना सुविधा की आवश्यकता रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए पूरी तरह सुलभ और पर्याप्त है।”
3. उच्च न्यायालय का विधिक प्रश्न:
- न्यायमूर्ति अनीश दयाल ने केंद्र सरकार के पैनल वकील निशांत गौतम को निर्देश दिया कि वे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) से यह स्पष्ट निर्देश लेकर आएं:“क्या कोई ऐसा नियम, परिपत्र या विधिक प्रावधान है जो यह कहता हो कि किसी सरकारी क्षेत्र या कार्यालय परिसर के भीतर किसी भी समुदाय के लिए प्रार्थना हेतु कोई स्थान नहीं दिया जा सकता?”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (1970–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अनीश दयाल (Justice Anish Dayal) (एकल पीठ) |
| सुनवाई की तिथि | 2 नवंबर 2026 (अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को नियत) |
| केस संदर्भ | क़दीमी मस्जिद प्रबंध समिति बनाम भारत संघ व अन्य [W.P.(C) No. … / 2026] |
| याचिकाकर्ता पक्ष | क़दीमी मस्जिद की प्रबंध एवं देखरेख समिति (Caretaking Committee, Qadeemi Masjid) |
| प्रतिवादी पक्ष | भारत संघ (आवास एवं शहरी मामलों का मंत्रालय / MoHUA व भूमि एवं विकास कार्यालय – L&DO) |
| संरचना का इतिहास | क़दीमी मस्जिद (Qadeemi Masjid) कृषि भवन परिसर के भीतर स्थित 100 वर्ष से अधिक पुरानी मस्जिद है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के अनुसार, यह संरचना लुटियंस दिल्ली में कृषि भवन और सचिवालय परिसरों के निर्माण से भी पहले की है। दशकों से यह कृषि भवन और आसपास के मंत्रालयों में कार्यरत मुस्लिम कर्मचारियों के लिए नमाज स्थल के रूप में उपयोग में लाई जाती रही है। |
| वक्फ स्थिति (1970) | दिल्ली वक्फ बोर्ड (Delhi Waqf Board) ने वर्ष 1970 में आधिकारिक राजपत्र में इसे वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित किया था। |
| याचिकाकर्ताओं की मुख्य विधिक प्रार्थना | वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद (Senior Advocate Salman Khurshid) ने 17 सितंबर को सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया था कि: 1. वे सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के निर्माण या कार्य में कोई बाधा नहीं डालना चाहते। 2. संविधान के अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) के आलोक में, यदि पुराना ढांचा हटाया भी जाता है, तो नए बनने वाले केंद्रीय सचिवालय भवनों के भीतर कर्मचारियों के लिए एक उचित, गरिमापूर्ण और निकटवर्ती प्रार्थना स्थल (Prayer Facility) की वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। |
| केंद्र सरकार का जवाब | किसी भी प्रकार की धार्मिक संरचना बनाए रखने या नए भवन में स्थायी धार्मिक प्रार्थना स्थल आवंटित करने से स्पष्ट इनकार; सार्वजनिक भूमि पर स्थायी धार्मिक आरक्षण को पंथनिरपेक्षता के विरुद्ध बताया गया। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘पंथनिरपेक्षता का सिद्धांत बनाम अनुच्छेद 25 की सीमाएं’
- ‘डॉ. एम. इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ’ [(1994) 6 SCC 360] की नज़ीर:
- सर्वोच्च न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक रूप से यह स्थापित किया था कि:“मस्जिद में नमाज अदा करना इस्लाम धर्म का कोई ऐसा अनिवार्य और अभिन्न अंग (Essential and Integral Religious Practice) नहीं है जिसके बिना नमाज नहीं पढ़ी जा सकती; नमाज कहीं भी, खुले मैदान में भी पढ़ी जा सकती है। अतः राज्य सार्वजनिक प्रयोजन (Public Purpose) के लिए किसी भी धार्मिक स्थल—चाहे वह मस्जिद हो, मंदिर हो या चर्च—की भूमि का अधिग्रहण या पुनर्ग्रहण करने की पूर्ण संप्रभु शक्ति रखता है।”
- केंद्र सरकार का यह तर्क कि 2 किमी के दायरे में इंडिया गेट मस्जिद उपलब्ध है, इसी संवैधानिक सिद्धांत से बल प्राप्त करता है।
- संविधान का पंथनिरपेक्ष चरित्र और ‘पब्लिक लैंड’:
- संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘पंथनिरपेक्षता’ (Secularism) राज्य को यह निर्देश देती है कि वह सभी धर्मों से समान दूरी बनाए रखे (Equidistance / Positive Secularism)।
- केंद्र का तर्क है कि यदि नए केंद्रीय सचिवालय भवनों के भीतर किसी एक समुदाय के लिए स्थायी पूजा या प्रार्थना स्थल आरक्षित किया जाता है, तो अन्य सभी धर्मों (हिंदू, सिख, ईसाई आदि) की ओर से भी वैसी ही मांगें उठेंगी, जिससे सरकारी भवनों की प्रशासनिक कार्यप्रणाली और पंथनिरपेक्ष स्वरूप खंडित होगा।
- वक्फ संपत्ति की स्थिति बनाम संप्रभु अधिग्रहण:
- यद्यपि यह संपत्ति 1970 में वक्फ के रूप में अधिसूचित है, किंतु विधिक सिद्धांत यह है कि वक्फ की स्थिति राज्य की ‘एमिनेंट डोमेन’ (Eminent Domain) की शक्ति—यानी सार्वजनिक हित में भूमि उपयोग बदलने के संप्रभु अधिकार—को समाप्त नहीं कर सकती।
- सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना को सर्वोच्च न्यायालय ने राजीव सूरी बनाम भारत संघ में राष्ट्रीय महत्व की एक वैध और आवश्यक प्रशासनिक परियोजना माना है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: क़दीमी मस्जिद प्रबंध समिति बनाम भारत संघ व अन्य [W.P.(C) No. … / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति अनीश दयाल (Justice Anish Dayal) (एकल पीठ)
- सुनवाई की तिथि: 2 नवंबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 23 नवंबर 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (मस्जिद प्रबंध समिति) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद (Senior Advocate Salman Khurshid)।
- भारत संघ (केंद्र सरकार) की ओर से: केंद्र सरकार के पैनल वकील निशांत गौतम (Advocate Nishant Gautam) एवं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंध की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 226 (रिट क्षेत्राधिकार) एवं प्रस्तावना (पंथनिरपेक्ष राज्य)
- वक्फ अधिनियम, 1995 (Waqf Act, 1995) — वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण एवं विधिक स्थिति
- सार्वजनिक परिसर (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 (Public Premises Eviction Act, 1971)
- सेंट्रल विस्टा मास्टर प्लान विनियम एवं लुटियंस बंगला जोन (LBZ) दिशानिर्देश
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सरकारी परिसरों के धर्मनिरपेक्ष चरित्र और धार्मिक संरचनाओं का विधिक मानक: ‘राज्य के प्रशासनिक एवं सचिवालय परिसर अनन्य रूप से सार्वजनिक शासन और सेवाओं के लिए समर्पित पंथनिरपेक्ष क्षेत्र होते हैं; किसी सरकारी कार्यालय परिसर के भीतर स्थायी धार्मिक संरचनाओं को बनाए रखना या किसी विशिष्ट धार्मिक आरक्षण की मांग करना राज्य के पंथनिरपेक्ष चरित्र के असंगत है; सार्वजनिक हित और प्रशासनिक पुनर्विकास (सेंट्रल विस्टा) के उद्देश्य से राज्य को किसी भी भूमि पर स्थित संरचना को हटाने का संप्रभु अधिकार प्राप्त है, बशर्ते निकटवर्ती क्षेत्र में वैकल्पिक इबादत/प्रार्थना की सुविधाएं उपलब्ध हों; अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, किंतु यह किसी विशिष्ट सरकारी भवन के भीतर धार्मिक स्थल के अधिकार को समाहित नहीं करता।’
- वर्तमान स्थिति व आगामी प्रक्रिया: मामले को 23 नवंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध किया गया है; तब तक केंद्र सरकार और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को अदालत के उस विशिष्ट प्रश्न का उत्तर देना होगा कि क्या किसी सरकारी नियम के तहत सरकारी परिसरों में प्रार्थना स्थल रखने पर स्पष्ट वैधानिक प्रतिबंध है; इसके पश्चात दिल्ली हाईकोर्ट क़दीमी मस्जिद को हटाने और वैकल्पिक व्यवस्था संबंधी अंतरिम याचिका पर अपना निर्णय सुनाएगा।
Qadeemi Mosque:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court), नई दिल्ली |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अनीश दयाल (Justice Anish Dayal) |
| याचिकाकर्ता | कदीमी मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति (Caretaking Committee of Qadeemi Masjid) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद |
| प्रतिवादी पक्ष | केंद्र सरकार (भारत संघ) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता निशांत गौतम / ASG |
| मूल विषय/विवाद | सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना (Central Vista Redevelopment Project) के तहत कृषि भवन परिसर में स्थित 100 वर्ष पुरानी ‘कदीमी मस्जिद’ को गिराए जाने की आशंका के खिलाफ याचिका। |
| संवैधानिक तर्क | याचिकाकर्ता: संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के तहत नए भवनों में वैकल्पिक प्रार्थना स्थल की मांग। केंद्र सरकार: सरकारी परिसरों का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप; 2 किमी के दायरे में इंडिया गेट मस्जिद का विकल्प उपलब्ध। |
| अदालत का निर्देश | केंद्र से स्पष्ट नियम/नीति पेश करने को कहा; अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को तय। |

