Saturday, November 7, 2026
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Criminal Writ: 3-जजों की पूर्ण पीठ ने पूर्व कार्यवाहक सीजे का फैसला पलटा; ‘क्रिमिनल रिट’ का अलग पंजीकरण बंद, केवल ‘Writ Petition’ के रूप में दर्ज करे

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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी बिंदु

  1. जुलाई 2026 का खंडपीठ का निर्णय:जुलाई 2026 में तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति मनीष शर्मा की खंडपीठ ने निर्णय दिया था कि भारत का संविधान “क्रिमिनल रिट पेटिशन” नाम की किसी अलग श्रेणी को मान्यता नहीं देता है। इसलिए रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया था कि वह इस नाम से केस दर्ज करना बंद करे और उन्हें केवल साधारण ‘रिट पेटिशन’ के रूप में ही पंजीकृत करे।
  2. नियम 315(1)(h) की अनदेखी (Per Incuriam):न्यायमूर्ति आनंद शर्मा द्वारा भेजे गए संदर्भ पर विचार करते हुए पूर्ण पीठ ने पाया कि जुलाई 2026 का खंडपीठ का फैसला राजस्थान हाईकोर्ट रूल्स के वैधानिक नियम 315(1)(h) की अनदेखी करके दिया गया था। चूंकि वह फैसला संबंधित वैधानिक प्रावधान के ज्ञान के बिना जारी हुआ था, इसलिए उसे कानून की भाषा में Per Incuriam माना गया।
  3. प्रक्रियात्मक स्पष्टता और 2 सप्ताह का अल्टीमेटम:पूर्ण पीठ ने रजिस्ट्री को आदेश दिया है कि 2 नवंबर 2026 तक जो भी आपराधिक रिट याचिकाएं किसी अन्य नाम से लंबित/पंजीकृत हैं, उन्हें अगले दो हफ्तों के भीतर ‘क्रिमिनल रिट याचिका’ के रूप में री-रजिस्टर किया जाए और रोस्टर के अनुसार संबंधित आपराधिक पीठ (Criminal Bench) के समक्ष पेश किया जाए।

मुख्य विधिक निष्कर्ष

1. अनुच्छेद 226 और प्रक्रियात्मक वर्गीकरण:

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार एक ही है, लेकिन अदालती प्रबंधन और मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए उच्च न्यायालय के नियमों के तहत प्रक्रियात्मक वर्गीकरण आवश्यक और पूरी तरह वैध है।

2. पूर्व के आदेशों पर प्रभाव नहीं:

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था 2 नवंबर 2026 से प्रभावी होगी। इस तिथि से पहले अलग नाम से पंजीकृत याचिकाओं पर दिए गए अंतिम निर्णयों या आदेशों पर केवल इस वर्गीकरण के आधार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

जोधपुर/जयपुर: भारत का संविधान के अनुच्छेद 226 (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार की एकीकृत प्रकृति बनाम प्रक्रियात्मक वर्गीकरण), राजस्थान उच्च न्यायालय नियम, 1952 (Rajasthan High Court Rules, 1952) के नियम 315(1)(h) (आपराधिक मामलों से उद्भूत रिट याचिकाओं के विशिष्ट वर्गीकरण व पंजीकरण का वैधानिक दायित्व), न्यायिक नज़ीरों में ‘पर इन्क्यूरियम’ (Per Incuriam) का सिद्धांत (प्रासंगिक वैधानिक नियमों की अज्ञानता में दिए गए फैसलों की वैधता), तथा रोस्टर प्रबंधन व प्रक्रियात्मक न्यायशास्त्र के विधिक सिद्धांतों पर राजस्थान उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ (Full Bench) ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नज़ीरी फैसला सुनाया है।

राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) संजय के. अग्रवाल (Justice Sanjay K. Agrawal), न्यायमूर्ति समीर जैन (Justice Sameer Jain) और न्यायमूर्ति अनुरूप सिंघी (Justice Anuroop Singhi) की तीन-न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ ने एकल पीठ द्वारा भेजे गए संदर्भ (Reference) का निस्तारण करते हुए पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के जुलाई 2026 के फैसले को उलट (Overruled) दिया।

पूर्ण पीठ ने स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी कि आपराधिक मामलों से उद्भूत होने वाली रिट याचिकाओं को राजस्थान उच्च न्यायालय नियमों के नियम 315(1)(h) के तहत ‘आपराधिक रिट याचिका’ (Criminal Writ Petition) के रूप में अलग से पंजीकृत किया जाना अनिवार्य है। अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वर्तमान में लंबित उन सभी याचिकाओं को, जिन्हें पूर्व खंडपीठ के फैसले के बाद सामान्य ‘रिट याचिका’ के रूप में पंजीकृत कर दिया गया था, दो सप्ताह के भीतर पुनः वर्गीकृत (Re-classify / Re-register) कर उचित आपराधिक रोस्टर वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।

पूर्ण पीठ के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘नियम 315(1)(h) की अनदेखी के कारण पूर्व फैसला पर इन्क्यूरियम (Per Incuriam) था’:

मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल की अध्यक्षता वाली पूर्ण पीठ ने जुलाई 2026 के खंडपीठ के फैसले का विश्लेषण करते हुए अपने 2 नवंबर के निर्णय में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “जिया (Jiya) मामले में दिया गया पूर्व निर्णय राजस्थान उच्च न्यायालय नियमों के नियम 315(1)(h) में निहित वैधानिक अधिदेश (Statutory Mandate) पर विचार करने या उसे प्रभावी बनाने में पूरी तरह विफल रहा। उस निर्णय का अनुपात (Ratio), जहाँ तक वह ऐसी रिट याचिकाओं के आपराधिक-पक्षीय पंजीकरण (Criminal-side registration) को रोकता है, ‘पर इन्क्यूरियम’ (Per Incuriam) घोषित किया जाता है, क्योंकि यह एक सुसंगत वैधानिक प्रावधान की अज्ञानता में अथवा उस पर उचित विचार किए बिना सुनाया गया था।”

2. ‘संवैधानिक क्षेत्राधिकार बनाम प्रक्रियात्मक वर्गीकरण का संतुलन’:

  • पूर्ण पीठ ने यह सैद्धांतिक भेद स्पष्ट किया कि अलग नामकरण से कोई नया संवैधानिक क्षेत्राधिकार पैदा नहीं होता, बल्कि यह उचित रोस्टर आवंटन का प्रक्रियात्मक साधन है:“किसी याचिका को ‘आपराधिक रिट याचिका’ के रूप में वर्गीकृत करने से कोई स्वतंत्र संवैधानिक क्षेत्राधिकार सृजित नहीं होता है; बल्कि यह किसी आपराधिक मामले से उद्भूत रिट कार्यवाही के प्रक्रियात्मक चरित्र (Procedural Character) की पहचान करता है।इसे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत संवैधानिक क्षेत्राधिकार और लागू उच्च न्यायालय नियमों के साथ जोड़कर समझा जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ऐसी याचिकाएं उपयुक्त रोस्टर वाली पीठ के समक्ष ही प्रस्तुत की जाएं।”

3. दो सप्ताह में री-रजिस्ट्रेशन और 2 नवंबर 2026 से प्रभावी होने की कट-ऑफ:

  • अदालत ने रजिस्ट्री को प्रशासनिक निर्देश जारी करते हुए कहा:“इस निर्णय की तिथि तक लंबित उन सभी आपराधिक रिट याचिकाओं को, जो किसी भिन्न नामकरण (Nomenclature) के तहत पंजीकृत हैं, रजिस्ट्री ‘आपराधिक रिट याचिका’ के रूप में पुनः पंजीकृत करेगी और उन्हें संबंधित रोस्टर वाली उपयुक्त पीठ के समक्ष रखेगी। यह कार्य आज से दो सप्ताह की अवधि के भीतर त्वरित रूप से किया जाएगा ताकि सुनवाई प्रभावित न हो।यह निर्णय 2 नवंबर 2026 से प्रभावी होगा। इस तिथि से पूर्व पारित किसी भी निर्णय या अंतिम आदेश पर केवल नामकरण के आधार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और उन्हें केवल इस आधार पर पुनः नहीं खोला जा सकेगा।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (जुलाई 2026 – नवंबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयराजस्थान उच्च न्यायालय, मुख्य पीठ जोधपुर / जयपुर (पूर्ण पीठ संदर्भ क्षेत्राधिकार)
पूर्ण पीठ (Full Bench)मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल, न्यायमूर्ति समीर जैन एवं न्यायमूर्ति अनुरूप सिंघी
केस संदर्भरवि कुमार बनाम राजस्थान राज्य व अन्य [Ravi Kumar v. State of Rajasthan & Ors.]
निर्णय की तिथि2 नवंबर 2026
संदर्भकर्ता न्यायाधीशन्यायमूर्ति आनंद शर्मा (Justice Anand Sharma) — जिन्होंने एकल पीठ में सुनवाई के दौरान पूर्व खंडपीठ के फैसले की विधिक वैधता पर प्रश्न उठाते हुए मुख्य न्यायाधीश को संदर्भ भेजा था।
पूर्व खंडपीठ का फैसला (जुलाई 2026)तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति मनीष शर्मा की खंडपीठ ने व्यवस्था दी थी कि भारत का संविधान ‘आपराधिक रिट’ और ‘सिविल रिट’ में कोई अंतर नहीं करता; संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत केवल ‘रिट’ होती है। अतः रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया था कि वह ‘क्रिमिनल रिट’ का अलग पंजीकरण तुरंत बंद करे और सभी को केवल ‘Writ Petition’ के रूप में दर्ज करे।
उद्भूत हुई विधिक समस्याखंडपीठ के आदेश के कारण राजस्थान उच्च न्यायालय नियमों के नियम 315(1)(h) का सीधा उल्लंघन हो रहा था, जो आपराधिक प्रकृति के मामलों (जैसे एफआईआर रद्द करना, पुलिस उत्पीड़न, हिरासत आदि) से जुड़ी रिट याचिकाओं के लिए स्पष्ट रूप से अलग वर्गीकरण और प्रक्रिया निर्धारित करता है। इसके चलते मुकदमों के रोस्टर निर्धारण और कोर्ट फीस/प्रक्रिया में भारी असमंजस पैदा हो गया था।
पूर्ण पीठ का अंतिम निर्णयसंदर्भ का उत्तर देते हुए पूर्व खंडपीठ का फैसला अधिकार-विहीन एवं पर इन्क्यूरियम मानकर निरस्त किया गया; आपराधिक रिट याचिकाओं का पृथक पंजीकरण बहाल (Restored) किया गया।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 226 की प्रकृति बनाम उच्च न्यायालय नियम 315(1)(h)’

  • ‘पर इन्क्यूरियम’ (Per Incuriam) का न्यायिक सिद्धांत:
    • लैटिन शब्द Per Incuriam का अर्थ होता है “सावधानी या ध्यान के अभाव में” (Through lack of care / In ignorance of law)।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने ए.आर. अंतुले बनाम आर.एस. नायक [(1988) 2 SCC 602] और पंजाब लैंड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन बनाम लेबर कोर्ट [(1990) 3 SCC 682] में यह स्थापित किया है कि यदि कोई न्यायिक निर्णय किसी प्रासंगिक वैधानिक उपबंध, अधिनियम या सांविधिक नियम पर विचार किए बिना पारित किया जाता है, तो वह निर्णय बाद की पीठों पर बाध्यकारी नहीं रहता।
    • चूंकि जुलाई 2026 की खंडपीठ ने राजस्थान उच्च न्यायालय नियम के नियम 315(1)(h) की अनदेखी की थी, अतः पूर्ण पीठ ने उसे विधि सम्मत नहीं माना।
  • संविधान का अनुच्छेद 226 बनाम उच्च न्यायालय की नियम-निर्माण शक्ति (अनुच्छेद 225):
    • संविधान का अनुच्छेद 225 उच्च न्यायालयों को अपने कामकाज के संचालन और मुकदमों के नियमन हेतु नियम बनाने की पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करता है।
    • यद्यपि अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार मूलतः एक ही है, किंतु प्रशासनिक सुविधा, त्वरित न्याय और विषय-विशेष के जजों (सिविल रोस्टर बनाम आपराधिक रोस्टर) के समक्ष सही मामले पहुंचाने के लिए ‘सिविल रिट’ और ‘आपराधिक रिट’ का प्रक्रियात्मक विभाजन पूरी तरह तर्कसंगत और वैधानिक है।
  • भूतलक्षी प्रभाव से संरक्षण (Doctrine of Prospective Overruling):
    • पूर्ण पीठ ने यह भी सुनिश्चित किया कि इस प्रक्रियात्मक बदलाव से वादियों को कोई नुकसान न हो।
    • अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था 2 नवंबर 2026 से प्रभावी होगी, और जुलाई 2026 से 2 नवंबर 2026 के बीच जो मामले सामान्य रिट के रूप में सुने और तय किए जा चुके हैं, उन्हें केवल गलत नामकरण के आधार पर दोबारा नहीं खोला जा सकेगा।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: राजस्थान उच्च न्यायालय (पूर्ण पीठ क्षेत्राधिकार — जोधपुर/जयपुर)
  • केस संदर्भ: रवि कुमार बनाम राजस्थान राज्य व अन्य [D.B. Civil/Criminal Reference No. … / 2026]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल, न्यायमूर्ति समीर जैन एवं न्यायमूर्ति अनुरूप सिंघी (पूर्ण पीठ)
  • निर्णय की तिथि: 2 नवंबर 2026
  • प्रभावी तिथि: 2 नवंबर 2026 से आगे (Prospective Application)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • राजस्थान उच्च न्यायालय नियम, 1952 (Rajasthan High Court Rules, 1952) — नियम 315(1)(h) (आपराधिक मामलों से संबंधित रिट याचिकाओं का विशिष्ट वर्गीकरण व प्रक्रिया)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार) एवं अनुच्छेद 225 (उच्च न्यायालय के नियम बनाने की शक्तियां)
    • न्यायिक नज़ीर सिद्धांत — ‘पर इन्क्यूरियम’ (Per Incuriam) का सिद्धांत
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • आपराधिक रिट याचिकाओं के वर्गीकरण और पंजीकरण का विधिक मानक: ‘राजस्थान उच्च न्यायालय नियमों का नियम 315(1)(h) एक वैधानिक अधिदेश है जो आपराधिक मामलों से उद्भूत रिट याचिकाओं के पृथक पंजीकरण का आदेश देता है; इस वैधानिक नियम की अनदेखी कर दिया गया कोई भी न्यायिक फैसला ‘पर इन्क्यूरियम’ माना जाएगा; रिट याचिकाओं को ‘आपराधिक रिट’ के रूप में वर्गीकृत करना कोई नया संवैधानिक क्षेत्राधिकार नहीं बनाता, बल्कि यह अनुच्छेद 226 के तहत कार्यवाही के प्रक्रियात्मक चरित्र की पहचान करता है ताकि मामले को उचित आपराधिक रोस्टर वाली पीठ के समक्ष रखा जा सके; अतः आपराधिक मामलों से जुड़ी याचिकाओं को अलग से ‘Criminal Writ Petition’ के रूप में ही दर्ज किया जाना विधिक रूप से अनिवार्य है।’
  • वर्तमान स्थिति व प्रशासनिक प्रभाव: राजस्थान उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री ने आदेश के अनुपालन में तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी है; जुलाई 2026 के बाद सामान्य रिट के रूप में दर्ज की गई सभी आपराधिक प्रकृति की याचिकाओं को अगले 14 दिनों के भीतर छांटकर ‘क्रिमिनल रिट पिटिशन’ (D.B./S.B. Criminal Writ Petition) के रूप में री-नंबर किया जा रहा है और उन्हें आपराधिक रोस्टर वाले न्यायाधीशों के समक्ष सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया जा रहा है।

Criminal Writ: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतराजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court), पूर्ण पीठ (Full Bench)
पीठमुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल, न्यायमूर्ति समीर जैन एवं न्यायमूर्ति अनुरूप सिंघी
मामला/साइटेशनरवि कुमार बनाम राजस्थान राज्य व अन्य (Ravi Kumar v. State of Rajasthan & Ors.)
मूल विवादक्या आपराधिक मुकदमों से जुड़ी रिट याचिकाओं को अलग से ‘क्रिमिनल रिट याचिका’ के रूप में पंजीकृत किया जाना चाहिए या केवल साधारण ‘रिट याचिका’ के रूप में?
संदर्भ (Reference)न्यायमूर्ति आनंद शर्मा द्वारा पूर्ववर्ती फैसले पर सवाल उठाते हुए भेजा गया संदर्भ।
संबंधित नियमराजस्थान हाईकोर्ट रूल्स का नियम 315(1)(h) (Rule 315(1)(h))
अदालत का अंतिम निर्णयपूर्व फैसला रद्द: 2 नवंबर 2026 से सभी आपराधिक रिट याचिकाओं का अलग से पंजीकरण बहाल; रजिस्ट्री को 2 सप्ताह में लंबित याचिकाओं को पुनः वर्गीकृत (Re-classify) करने का आदेश।
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