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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क
- प्रेडिकेट अपराध की समाप्ति और भर्ती घोटाला:मामला मालूर भूमि अनुदान समिति के अध्यक्ष के रूप में नंजे गौड़ा द्वारा 38 लोगों को अवैध रूप से 80 एकड़ जमीन आवंटित करने के आरोपों से शुरू हुआ था। ट्रायल कोर्ट द्वारा वैधानिक अभियोजन स्वीकृति (Government Sanction) न होने के कारण यह प्रेडिकेट केस खारिज कर दिया गया और पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। हालांकि, ईडी ने कोलार-चिकबल्लारपुर दूध संघ (KOMUL) भर्ती से जुड़ी कथित सामग्री मिलने का दावा कर संपत्तियां जब्त रखीं और विशेष कोर्ट में निजी शिकायत दर्ज कराई।
- ईडी का तर्क बनाम वैधानिक दायरा:अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने तर्क दिया कि एजेंसी के पास मिली नई सामग्रियों के आधार पर PMLA के तहत निजी शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि PMLA की धारा 66(2) स्पष्ट करती है कि यदि ईडी को अनुसूचित अपराध से जुड़ी सामग्री मिलती है, तो वह उसे संबंधित राज्य पुलिस या जांच एजेंसी को सौंपने के लिए बाध्य है।
- शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत (Checks and Balances):न्यायालय ने रेखांकित किया कि यदि ईडी को स्वतः संज्ञान लेकर निजी शिकायत (Private Complaint) दर्ज करने और उसके आधार पर PMLA जांच चलाने की अनुमति दी गई, तो वह बिना किसी प्रेडिकेट अपराध के किसी भी नागरिक के खिलाफ स्वतंत्र रूप से जांच शुरू कर देगी, जो PMLA के मूल वैधानिक दर्शन और संविधान के संघीय ढांचे के खिलाफ है।
मुख्य विधिक व PMLA न्यायशास्त्र निष्कर्ष
1. विजय मदनलाल चौधरी फैसले का सुदृढ़ीकरण (Vijay Madanlal Choudhary Principle):
सर्वोच्च न्यायालय के Vijay Madanlal Choudhary v. Union of India फैसले का पालन करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने दोहराया कि जब तक PMLA से जुड़ा मूल अपराध (Scheduled Offence) अदालत में जीवित है, केवल तभी तक ईडी की कार्रवाई वैध है। प्रेडिकेट अपराध के डिस्चार्ज, क्वैश या क्लोजर होने पर PMLA केस स्वतः समाप्त हो जाता है।
2. राज्य बनाम केंद्र का अधिकार क्षेत्र (Federal Limits of Enforcement Agencies):
अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत के संविधान के तहत कानून व्यवस्था राज्य सूची का विषय है। केंद्रीय एजेंसी (ED) राज्य पुलिस की भूमिका नहीं छीन सकती और न ही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 200 / BNSS धारा 223 के तहत आम शिकायतकर्ता की तरह निजी शिकायत दर्ज करा सकती है।
बेंगलुरु: धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA, 2002) की धारा 3 व 4 (मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध एवं दंड), धारा 48 (अधिनियम के तहत प्राधिकारियों की सांविधिक सीमाएं), धारा 66(2) (अनुसूचित अपराध की जानकारी मिलने पर सक्षम राज्य/केंद्रीय जांच एजेंसी को सूचना साझा करने का अनिवार्य वैधानिक दायित्व), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 223 (मजिस्ट्रेट के समक्ष निजी परिवाद—पूर्ववर्ती CrPC धारा 200), संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-II प्रविष्टि 1 व 2 (राज्य सूची: लोक व्यवस्था और पुलिस का अनन्य राज्य अधिकार-क्षेत्र), तथा सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों की पीठ के ऐतिहासिक निर्णय विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ [(2022) SCC OnLine SC 929] और पवित्रा प्रदीप कुमार बनाम भारत संघ [(2023)] के स्थापित विधिक सिद्धांतों के तहत कर्नाटक उच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकार-क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए एक अत्यंत युगांतकारी निर्णय दिया है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.आई. अरुण (Justice MI Arun) की एकल पीठ ने कांग्रेस विधायक के.वाई. नानजे गौड़ा (KY Nanje Gowda), वाई.बी. अश्वथनारायण (YB Ashwathanarayan) व अन्य के विरुद्ध प्रवर्तन निदेशालय द्वारा शुरू की गई मनी लॉन्ड्रिंग जांच, ईसीआईआर (ECIR), संपत्तियों की जब्ती और विशेष एमपी/एमएलए अदालत में दायर निजी परिवाद को पूरी तरह रद्द (Quashed) कर दिया।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट व्यवस्था दी कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) कोई “सुपर कॉप” (Super Cop) नहीं है कि वह अपनी जानकारी में आने वाले हर अपराध की जांच करने लगे। अदालत ने रेखांकित किया कि PMLA के तहत ईडी की शक्तियां “व्युत्पन्न” (Derivative) हैं, न कि “मूल” (Original); अर्थात जब तक कोई अनुसूचित अपराध (Predicate Offence) कानूनी रूप से जीवित है, तभी तक ईडी जांच चला सकती है। जब मूल प्रेडिकेट अपराध विचारण अदालत द्वारा सांविधिक मंजूरी (Sanction) के अभाव में खारिज कर दिया गया हो या पुलिस द्वारा क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी गई हो, तो ईडी स्वयं BNSS की धारा 223 के तहत निजी शिकायत दायर करके अपने लिए क्षेत्राधिकार नहीं बना सकती।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘ईडी की शक्ति व्युत्पन्न है, मूल नहीं; बिना प्रेडिकेट अपराध PMLA की कार्यवाही असंभव’:
न्यायमूर्ति एम.आई. अरुण ने PMLA न्यायशास्त्र के मूल ढांचे का विश्लेषण करते हुए निर्णय में दर्ज किया: “प्रवर्तन निदेशालय (ED) की शक्ति व्युत्पन्न (Derivative) है, मूल (Original) नहीं। यह मनी लॉन्ड्रिंग के किसी स्वतंत्र संदेह के आधार पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) से जांच शुरू नहीं कर सकती। यदि किसी मूल अनुसूचित अपराध (Predicate Offence) का कोई अस्तित्व नहीं है, तो उस स्थिति में PMLA के तहत कार्यवाहियों का अस्तित्व नहीं हो सकता; जिसका अर्थ यह है कि जब प्रेडिकेट अपराध संबंधित आरोपी के पक्ष में समाप्त (Terminated in favour of the accused) हो जाता है, तो PMLA के तहत कार्यवाहियां आगे जारी नहीं रह सकतीं।”
2. ‘ईडी कोई सुपर कॉप नहीं; शक्तियों के पृथक्करण और PMLA की धारा 66(2) का सम्मान जरूरी’:
- अदालत ने सांविधिक सीमाओं का स्मरण कराते हुए कड़े शब्दों में कहा:“कानून नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances) की आवश्यकता को मान्यता देता है। ईडी कोई ‘सुपर कॉप’ नहीं है कि वह अपनी नजर में आने वाली किसी भी और हर चीज की जांच करने लगे।PMLA की धारा 48 अधिनियम के तहत प्राधिकारियों की परिकल्पना करती है। एक बार अधिनियम के तहत नियुक्त होने के बाद, वे उन पर PMLA द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से बंधे होते हैं। PMLA की धारा 66(2) यह प्रावधान करती है कि यदि ईडी की राय में उसके पास ऐसी कोई सामग्री है जो किसी अनुसूचित अपराध का गठन करती है, तो उसे संबंधित सामग्री संबंधित राज्य/केंद्रीय जांच एजेंसी को अग्रसारित (Forwarded) करनी चाहिए। यह अधिनियम स्पष्ट रूप से ईडी या PMLA के अधिकारियों को किसी अनुसूचित अपराध के संबंध में निजी परिवाद (Private Complaint) दाखिल करने और उसके दम पर PMLA के तहत जांच शुरू करने का कोई अधिकार नहीं देता।”
3. ‘कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है; ईडी BNSS धारा 223 में आम नागरिक की तरह परिवाद नहीं कर सकती’:
- जब ईडी ने भूमि घोटाले का केस खारिज होने के बाद कोमुल (KOMUL) भर्ती घोटाले की नई निजी शिकायत विशेष एमपी/एमएलए कोर्ट में दाखिल कर लोकायुक्त जांच की मांग की, तो पीठ ने व्यवस्था दी:“वास्तव में, कानून और व्यवस्था बनाए रखना राज्य (State) की जिम्मेदारी है, न कि केंद्र (Centre) की। यह संबंधित राज्य एजेंसी का कर्तव्य है कि वह सामग्री का परीक्षण करे और यह निर्णय ले कि मामले को आगे अभियोजित किया जाए या नहीं।ईडी कोई भी सामान्य नागरिक नहीं है जो BNSS की धारा 223 (पूर्ववर्ती CrPC धारा 200) के तहत निजी परिवाद दाखिल कर दे। उसे केवल उन्हीं शक्तियों का प्रयोग करना होगा जो PMLA द्वारा उस पर स्पष्ट रूप से प्रदत्त की गई हैं।”
4. ‘निजी परिवाद की अनुमति देने से ईडी असीमित शक्ति वाली संस्था बन जाएगी’:
- अदालत ने चेतावनी दी कि यदि ईडी को निजी परिवाद दायर करने की छूट दी गई, तो यह कानून के मूल दर्शन के विरुद्ध होगा:“यदि ईडी को निजी शिकायत दर्ज करने की अनुमति दी जाती है, जबकि अन्य सरकारी प्राधिकारी किसी के विरुद्ध कोई कार्यवाही शुरू करना अनुचित समझते हैं, तो यह ईडी को एक ‘सुपर कॉप’ के रूप में कार्य करने की अनुमति देने के समान होगा। यदि ऐसी छूट मिली, तो ईडी किसी भी व्यक्ति के खिलाफ खुद निजी परिवाद दायर करेगी और फिर उसी के दम पर PMLA जांच खोल लेगी।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | कर्नाटक उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ बेंगलुरु (आपराधिक व रिट क्षेत्राधिकार — धारा 528 BNSS / अनुच्छेद 226) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति एम.आई. अरुण (Justice MI Arun) (एकल पीठ) |
| निर्णय की तिथि | नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | वाई.बी. अश्वथनारायण व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition / Criminal Petition / 2026] |
| याचिकाकर्ता पक्ष | 1. के.वाई. नानजे गौड़ा (KY Nanje Gowda) — कांग्रेस विधायक (मालूर विधानसभा क्षेत्र)। 2. वाई.बी. अश्वथनारायण (YB Ashwathanarayan)। 3. के.एन. गोपाल मूर्ति एवं नागेश एन.। |
| याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता | वरिष्ठ अधिवक्ता किरण एस. जावली (Senior Advocate Kiran S Javali)। सहयोगी अधिवक्तागण: महेंद्र गौड़ा, मयंक जैन, मधुर जैन, अर्पित गोयल एवं महेंद्र गौड़ा। |
| प्रतिवादी पक्ष | 1. प्रवर्तन निदेशालय (ED) 2. भारत संघ (वित्त मंत्रालय) 3. कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस। |
| प्रवर्तन निदेशालय (ED) के विधि अधिकारी | भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू (SV Raju) एवं अधिवक्ता अनुपर्णा बोरदोलोई। |
| लोकायुक्त एवं अन्य अधिवक्ता | कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस की ओर से अधिवक्ता बी.एस. प्रसाद; डॉ. राजू कृष्णा की ओर से अधिवक्ता थम्मैया एच.एन.। |
| मूल प्रेडिकेट अपराध का इतिहास | नानजे गौड़ा जब मालूर लैंड ग्रांट कमेटी के अध्यक्ष थे, तब उन पर अपने पद का दुरुपयोग कर 38 व्यक्तियों को 80 एकड़ सरकारी जमीन अवैध रूप से आवंटित करने का आरोप लगा था। स्थानीय पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की थी, जिसके आधार पर ईडी ने ईसीआईआर (ECIR) दर्ज कर मनी लॉन्ड्रिंग जांच शुरू की थी। |
| प्रेडिकेट अपराध का विधिक पतन | विचारण अदालत (Trial Court) ने पाया कि लोक सेवक के विरुद्ध आवश्यक सरकारी अभियोजन स्वीकृति (Sanction under Section 197 CrPC / 218 BNSS) नहीं ली गई थी, जिसके चलते ट्रायल कोर्ट ने मूल भूमि घोटाला आपराधिक मामला पूरी तरह खारिज कर दिया और क्षेत्राधिकार पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट लगा दी। |
| ईडी की समानांतर कार्रवाई (KOMUL भर्ती) | इस बीच, नानजे गौड़ा कोलार एवं चिक्काबल्लापुर मिल्क यूनियन लिमिटेड (KOMUL) के अध्यक्ष बने। ईडी ने छापे के दौरान कोमुल में कर्मचारियों की भर्ती में अनियमितताओं से जुड़े दस्तावेज मिलने का दावा किया और अश्वथनारायण व अन्य को समन जारी कर उनकी संपत्तियां कुर्क कर लीं। |
| ईडी की प्रक्रियात्मक हेराफेरी | जब मूल भूमि घोटाला अदालत से खारिज हो गया, तो ईडी ने संपत्तियां छोड़ने के बजाय बेंगलुरु की विशेष एमपी/एमएलए अदालत में स्वयं एक निजी परिवाद (Private Complaint under Section 200 CrPC / 223 BNSS) दाखिल किया, ताकि अदालत लोकायुक्त पुलिस को कोमुल मामले में नई प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दे और ईडी का PMLA क्षेत्राधिकार कृत्रिम रूप से जीवित रह सके। |
| उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय | याचिकाएं स्वीकृत (Allowed); ईडी द्वारा शुरू की गई संपूर्ण PMLA जांच, जारी किए गए समन, कुर्क की गई संपत्तियां और विशेष अदालत में दायर निजी परिवाद पूर्णतः निरस्त/रद्द (Quashed)। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘विजय मदनलाल चौधरी नज़ीर, धारा 66(2) PMLA और संघीय ढांचा’
- ‘विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ’ [(2022) SCC OnLine SC 929] का बाध्यकारी सिद्धांत (पैरा 467(v)):
- सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि PMLA की धारा 3 के तहत अपराध किसी स्वतंत्र शून्य में कार्य नहीं करता। यह आवश्यक रूप से एक ‘अनुसूचित अपराध’ (Scheduled/Predicate Offence) से उत्पन्न आपराधिक गतिविधि के परिणामस्वरूप अर्जित ‘अपराध की आय’ (Proceeds of Crime) से जुड़ा होता है।
- यदि सक्षम अदालत द्वारा अनुसूचित अपराध में अभियुक्त को बरी (Acquitted) कर दिया जाता है, आरोपमुक्त (Discharged) कर दिया जाता है, या तकनीकी/सांविधिक आधारों पर कार्यवाही रद्द (Quashed) कर दी जाती है, तो उस क्षण से आगे PMLA का कोई अपराध अस्तित्व में नहीं रह सकता।
- PMLA की धारा 66(2) का विधिक अधिदेश और प्रवर्तन निदेशालय की सीमाएं:
- संसद ने PMLA की धारा 66(2) में स्पष्ट विधिक व्यवस्था की है कि यदि PMLA जांच के दौरान ईडी के हाथ कोई ऐसी सामग्री लगती है जो किसी अन्य कानून या अनुसूचित अपराध के उल्लंघन को दर्शाती है, तो ईडी का एकमात्र दायित्व यह है कि वह उस सामग्री को सक्षम जांच एजेंसी (जैसे राज्य पुलिस, सीबीआई या लोकायुक्त) के साथ साझा (Shall share) करे।
- कानून ने ईडी को यह अधिकार कभी नहीं दिया कि यदि राज्य पुलिस या लोकायुक्त स्वतः संज्ञान लेकर प्राथमिकी दर्ज न करे, तो ईडी स्वयं मजिस्ट्रेट के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (अब BNSS) के तहत एक आम ‘परिवादी’ (Complainant) बनकर खड़ी हो जाए।
- संविधान का संघीय ढांचा और ‘सुपर कॉप’ सिंड्रोम का निषेध:
- भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत लोक व्यवस्था (प्रविष्टि 1) और पुलिस (प्रविष्टि 2) पूर्णतः राज्य सूची के विषय हैं। संसद ने भी ईडी को एक सीमित कार्यक्षेत्र के साथ वित्तीय अपराधों (मनी लॉन्ड्रिंग) की जांच के लिए गठित किया है।
- यदि किसी केंद्रीय एजेंसी को यह छूट दे दी जाए कि वह अपनी मर्जी से किसी भी प्रशासनिक भर्ती या स्थानीय अनियमितता की सूचना मिलने पर खुद अदालत में परिवाद दाखिल कर अपनी जांच का मार्ग प्रशस्त कर ले, तो इससे देश का संघीय ढांचा और शक्तियों का पृथक्करण पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा। कर्नाटक उच्च न्यायालय का यह निर्णय केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर एक अत्यंत आवश्यक संवैधानिक अंकुश है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: कर्नाटक उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ बेंगलुरु (आपराधिक व रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: वाई.बी. अश्वथनारायण व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition No. … / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति एम.आई. अरुण (Justice MI Arun) (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: याचिकाएं स्वीकृत; कांग्रेस विधायक के.वाई. नानजे गौड़ा व अन्य के विरुद्ध प्रवर्तन निदेशालय (ED) की संपूर्ण PMLA जांच, ECIR, कुर्की कार्यवाहियां और विशेष अदालत में दायर निजी परिवाद पूरी तरह निरस्त/रद्द (Quashed)।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से:
- वरिष्ठ अधिवक्ता किरण एस. जावली (Senior Advocate Kiran S Javali)।
- अधिवक्तागण: महेंद्र गौड़ा, मयंक जैन, मधुर जैन, अर्पित गोयल एवं महेंद्र गौड़ा।
- प्रतिवादी प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से:
- भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (Additional Solicitor General – ASG) एस.वी. राजू (SV Raju)।
- अधिवक्ता: अनुपर्णा बोरदोलोई (Advocate Anuparna Bordoloi)।
- कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस की ओर से: अधिवक्ता बी.एस. प्रसाद (Advocate BS Prasad)।
- अन्य प्रतिवादियों की ओर से: अधिवक्ता थम्मैया एच.एन.।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA, 2002):
- धारा 3 व 4 — मनी लॉन्ड्रिंग की परिभाषा एवं दंड
- धारा 48 — PMLA प्राधिकारियों का क्षेत्राधिकार
- धारा 66(2) — अनुसूचित अपराध संबंधी जानकारी अन्य सक्षम एजेंसियों को साझा करने का दायित्व
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- धारा 223 — मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद (पूर्ववर्ती CrPC धारा 200)
- धारा 218 — लोक सेवकों के अभियोजन हेतु पूर्व सरकारी मंजूरी की अनिवार्यता (पूर्ववर्ती CrPC धारा 197)
- भारत का संविधान:
- सातवीं अनुसूची, सूची-II (राज्य सूची) — प्रविष्टि 1 (लोक व्यवस्था) व प्रविष्टि 2 (पुलिस)
- अनुच्छेद 21 — विधि सम्मत प्रक्रिया के बिना संपत्ति व स्वतंत्रता के हनन पर रोक
- अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की संवैधानिक रिट अधिकारिता
- धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA, 2002):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- PMLA का व्युत्पन्न स्वरूप, प्रेडिकेट अपराध की अनिवार्यता और ED के क्षेत्राधिकार का विधिक मानक: ‘प्रवर्तन निदेशालय (ED) की शक्ति मूल नहीं बल्कि पूर्णतः व्युत्पन्न (Derivative) है; किसी भी PMLA कार्यवाही को शुरू करने या बनाए रखने हेतु एक वैध और सक्रिय अनुसूचित/प्रेडिकेट अपराध (Predicate Offence) का अस्तित्व एक अपरिहार्य पूर्वापेक्षा (Sine qua non) है; जब मूल अनुसूचित अपराध सक्षम न्यायालय द्वारा सांविधिक मंजूरी के अभाव में खारिज कर दिया जाता है, तो मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही स्वतः ही शून्य और निष्प्रभावी हो जाती है; PMLA की धारा 66(2) केवल सूचना साझा करने का अधिदेश देती है, न कि ईडी को खुद किसी अनुसूचित अपराध का परिवादी बनने का अधिकार; ईडी कोई ‘सुपर कॉप’ नहीं है जो राज्य के कानून-व्यवस्था क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण करते हुए सामान्य नागरिक की तरह BNSS की धारा 223 के तहत निजी शिकायत दर्ज कराकर अपने लिए कृत्रिम क्षेत्राधिकार उत्पन्न कर सके; तथा जहाँ प्रेडिकेट अपराध समाप्त हो चुका हो, वहाँ संपत्तियों की कुर्की बनाए रखना अथवा PMLA समन जारी रखना कानून के शासन और अदालत की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: कर्नाटक उच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद कांग्रेस विधायक के.वाई. नानजे गौड़ा और वाई.बी. अश्वथनारायण के विरुद्ध ईडी द्वारा की जा रही मनी लॉन्ड्रिंग जांच हमेशा के लिए बंद हो गई है; ईडी को जब्त और कुर्क की गई संपत्तियों को अविलंब विमुक्त करना होगा; साथ ही यह निर्णय देश भर के उन मामलों में एक प्रमुख कानूनी मिसाल बन गया है जहाँ प्रेडिकेट अपराध बंद होने के बावजूद ईडी समानांतर या स्वतंत्र रास्ते तलाश कर जांच खींचने का प्रयास करती है।
Congress MLA: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति एम.आई. अरुण (Justice MI Arun) |
| केस / पक्षकार | वाई.बी. अश्वत्थनारायण बनाम भारत संघ व अन्य (YB Ashwathanarayan v. Union of India & Ors.) |
| प्रतिनिधित्व | याचिकाकर्ता पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता किरण एस. जावली आदि | ईडी पक्ष: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू | लोकायुक्त पक्ष: अधिवक्ता बी.एस. प्रसाद |
| संबंधित कानून/प्रावधान | PMLA 2002 की धारा 48, 66(2) एवं BNSS धारा 223 / CrPC धारा 200 |
| मूल विवाद | 80 एकड़ भूमि आवंटन घोटाले (प्रेडिकेट केस) के खारिज होने के बावजूद ईडी द्वारा KOMUL भर्ती घोटाले में संपत्तियां जब्त रखना और विशेष अदालत में निजी शिकायत दर्ज कराना। |
| अदालत का अंतिम आदेश | PMLA कार्यवाही रद्द (Quashed): प्रेडिकेट अपराध खत्म होने पर ईडी की जांच स्वतः समाप्त; ईडी को CrPC/BNSS के तहत निजी शिकायतकर्ता बनने का अधिकार नहीं। |

