Saturday, November 7, 2026
HomeConsumer NewsCustoms Order: अस्तित्वहीन व AI-जनरेटेड सुप्रीम कोर्ट निर्णयों पर आधारित आदेश स्वतंत्र...

Customs Order: अस्तित्वहीन व AI-जनरेटेड सुप्रीम कोर्ट निर्णयों पर आधारित आदेश स्वतंत्र न्यायिक विवेक का अभाव; कृत्रिम बुद्धिमत्ता के असत्यापित नजीरों पर जीरो-टॉलरेंस

FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp

मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी घटनाक्रम

  1. AI Hallucinations और गैर-मौजूद नज़ीरें:क्वांटम लॉजिस्टिक्स ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि कस्टम्स कमिश्नर ने कानूनी तर्कों को आंकने के बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल द्वारा तैयार किए गए निष्कर्षों को बिना किसी मानवीय सत्यापन के अपने आदेश में शामिल कर लिया। जब याचिकाकर्ता ने उद्धृत फैसलों की प्रतियां मांगी, तो विभाग असहाय साबित हुआ क्योंकि वे फैसले कभी सुनाए ही नहीं गए थे।
  2. विभाग का रुख और सहमति:याचिकाकर्ता द्वारा सुप्रीम कोर्ट के Vijay Ghanshyam Gadiya (2026) फैसले के तहत एआई के अनियंत्रित उपयोग पर तय मानकों का हवाला दिए जाने के बाद, सीमा शुल्क विभाग ने अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि विवादित आदेश को वापस लिया जा सकता है और मामले पर नए सिरे से विचार किया जाएगा।
  3. न्यायालय का आदेश:दोनों पक्षों की सहमति के बाद, हाईकोर्ट की पीठ ने 11 अगस्त 2026 के आदेश को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को नए सिरे से गुण-दोष के आधार पर सुनवाई के लिए सीमा शुल्क प्राधिकरण के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया।

मुख्य विधिक व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) न्यायशास्त्र निष्कर्ष

1. न्यायनिर्णयन में एआई का गैर-सत्यापित उपयोग (Use of AI in Adjudication):

यह फैसला भारत की न्यायप्रणाली और प्रशासनिक न्यायाधिकरणों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते अनियंत्रित इस्तेमाल पर एक सख्त चेतावनी है। यह स्पष्ट करता है कि अर्ध-न्यायिक (Quasi-Judicial) और न्यायिक अधिकारियों को अपने विवेक का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल करना होगा; एआई-जनरेटेड सामग्री को बिना प्रामाणिकता जांचे फैसलों का आधार नहीं बनाया जा सकता।

2. साक्ष्य और निष्पक्ष सुनवाई का सिद्धांत (Natural Justice & Duty to Verify):

किसी भी आदेश में उद्धृत कानूनी मिसालों की प्रामाणिकता और उनकी प्रतियां पक्षों को उपलब्ध कराना नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) का हिस्सा है। गैर-मौजूद न्यायिक फैसलों का सहारा लेना संपूर्ण आदेश को दूषित (Vitiated) कर देता है।

मुंबई: भारत का संविधान के अनुच्छेद 226 (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार), सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 (Customs Act, 1962) की धारा 28 व धारा 122 (अधिनिर्णयन और स्वतंत्र न्यायिक विवेक का प्रयोग / Independent Application of Mind), प्रशासनिक न्यायशास्त्र में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Principles of Natural Justice), तथा सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय विजय घनश्याम गाडिया बनाम भारत संघ [(2026)] (अदालतों व अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकारियों द्वारा असत्यापित AI-जनरेटेड विधिक नज़ीरों के उपयोग के विरुद्ध ‘जीरो-टॉलरेंस’ की नीति) के तहत बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कानूनी अधिनिर्णयन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के अनैतिक व भ्रामक उपयोग पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।

बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.एस. कार्णिक (Justice MS Karnik) और न्यायमूर्ति संदेश डी. पाटिल (Justice Sandesh D Patil) की खंडपीठ ने क्वांटा लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड (Quanta Logistics Pvt Ltd) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सीमा शुल्क आयुक्त (आयात-I) द्वारा 11 अगस्त 2026 को पारित दंडात्मक आदेश को पूरी तरह रद्द (Quashed / Set Aside) कर दिया।

उच्च न्यायालय ने पाया कि सीमा शुल्क विभाग के अधिनिर्णायक प्राधिकारी (Adjudicating Authority) ने स्वतंत्र विवेक का प्रयोग किए बिना जेनेरेटिव एआई (Generative AI) टूल्स का सहारा लिया था। विभाग के आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे दो तथाकथित निर्णयों का हवाला दिया गया था जिनका किसी भी आधिकारिक विधिक डेटाबेस में कोई अस्तित्व ही नहीं था (संभावित AI Hallucinations)। याचिकाकर्ता द्वारा उन निर्णयों की प्रतियां मांगने पर विभाग उन्हें प्रस्तुत करने में पूरी तरह विफल रहा। उच्च न्यायालय के कड़े रुख और सर्वोच्च न्यायालय के 2026 के ‘जीरो-टॉलरेंस’ आदेश के मद्देनजर, कस्टम्स विभाग ने स्वयं अपनी गलती स्वीकार करते हुए विवादित आदेश वापस लेने पर सहमति जताई, जिसके बाद अदालत ने सहमति से आदेश रद्द कर मामले की नए सिरे से सुनवाई करने का निर्देश दिया।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘अस्तित्वहीन सुप्रीम कोर्ट फैसलों का हवाला: AI मतिभ्रम (Hallucination) का गंभीर मामला’:

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वेंकटेश धोंड ने तकनीकी और विधिक साक्ष्यों के माध्यम से अदालत को दिखाया कि कस्टम्स कमिश्नर के 11 अगस्त 2026 के आदेश में जिन दो सुप्रीम कोर्ट निर्णयों को आधार बनाकर कंपनी के खिलाफ आदेश पारित किया गया था, वे वास्तव में कभी अस्तित्व में थे ही नहीं। यह जेनेरेटिव एआई का एक क्लासिक “मतिभ्रम” (AI Hallucination) था, जहाँ सॉफ्टवेयर ने फर्जी केस कानून और साइटेशन खुद गढ़ लिए थे।

2. ‘स्वतंत्र न्यायिक विवेक का पूर्ण अभाव और प्राकृतिक न्याय का हनन’:

  • अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकारी (Quasi-Judicial Authority) का यह बुनियादी दायित्व है कि वह अपने स्वतंत्र न्यायिक विवेक (Independent Application of Mind) का प्रयोग करे।
  • जब कंपनी ने विभाग से उन उद्धृत निर्णयों की आधिकारिक प्रतियां मांगीं ताकि वह अपना विधिक बचाव रख सके, तो विभाग उन्हें उपलब्ध नहीं करा सका। यह सीधे तौर पर निष्पक्ष सुनवाई और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन था।

3. सहमति से आदेश निरस्त (Quashed by Consent):

  • मामले के खुलासे और सर्वोच्च न्यायालय की नज़ीर के सामने आने पर सीमा शुल्क विभाग के अधिवक्ताओं ने सहमति व्यक्त की कि आक्षेपित आदेश को निरस्त कर दिया जाए और विभाग मामले पर नए सिरे से विधिवत विचार करेगा।
  • खंडपीठ ने इस सहमति को रिकॉर्ड पर लेते हुए आदेश रद्द किया और कंपनी को नए सिरे से परीक्षण हेतु सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया।

Also Read; E-Commerce: क्या केवल ऑनलाइन विज्ञापन या डिलीवरी से दिल्ली में क्षेत्राधिकार बनेगा?; फुल बेंच अपीलीय अदालत नहीं है, एकल पीठ के फैसले को अपील में चुनौती दें

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयबॉम्बे उच्च न्यायालय, मूल दीवानी क्षेत्राधिकार (संवैधानिक रिट — अनुच्छेद 226)
पीठन्यायमूर्ति एम.एस. कार्णिक (Justice MS Karnik) एवं न्यायमूर्ति संदेश डी. पाटिल (Justice Sandesh D Patil)
निर्णय की तिथिनवंबर 2026
केस संदर्भक्वांटा लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम सीमा शुल्क आयुक्त (आयात-I) [Writ Petition / 2026]
याचिकाकर्ता पक्षक्वांटा लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड (Quanta Logistics Pvt Ltd)।
याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्तावरिष्ठ अधिवक्ता वेंकटेश धोंड (Senior Advocate Venkatesh Dhond)।
सहयोगी अधिवक्तागण: बिमल राजशेखर एवं सुनंद सुब्रमण्यम।
प्रतिवादी पक्षसीमा शुल्क आयुक्त (आयात-I) (Commissioner of Customs, Import-I), मुंबई।
कस्टम्स विभाग के अधिवक्तागणअधिवक्ता जितेंद्र बी. मिश्रा (Jitendra B Mishra) एवं संगीता यादव (Sangeeta Yadav)।
आक्षेपित प्रशासनिक आदेशसीमा शुल्क आयुक्त द्वारा 11 अगस्त 2026 को पारित अधिनिर्णयन आदेश (Adjudication Order)।
विवाद का मूल विधिक आधारआदेश में दो ऐसे तथाकथित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला दिया गया था जो कानूनी रूप से अस्तित्वहीन (Non-existent AI Hallucinations) थे; प्राधिकारी ने बिना केस लॉ का सत्यापन किए एआई द्वारा सुझाए गए भ्रामक तर्कों को अपने आदेश में सीधे कॉपी-पेस्ट कर दिया था।
याचिकाकर्ता का मुख्य कानूनी आधारसर्वोच्च न्यायालय का वर्ष 2026 का ऐतिहासिक निर्णय — विजय घनश्याम गाडिया बनाम भारत संघ (Vijay Ghanshyam Gadiya v. Union of India) — जिसमें शीर्ष अदालत ने कानूनी कार्यवाहियों में असत्यापित एआई-जनरेटेड नज़ीरों के प्रयोग पर ‘जीरो-टॉलरेंस’ (Zero-Tolerance Approach) अपनाने का सख्त निर्देश दिया था।
कस्टम्स विभाग का विधिक रुखविभाग ने स्वीकार किया कि आदेश में प्रक्रियात्मक और तथ्यात्मक खामी है और वह 11 अगस्त 2026 के आदेश को वापस लेने तथा मामले पर नए सिरे से विचार करने को तैयार है।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णयरिट याचिका सहमति से स्वीकृत (Quashed by consent); 11 अगस्त 2026 का कस्टम्स आदेश पूरी तरह निरस्त; याचिकाकर्ता को नए सिरे से सुनवाई हेतु प्राधिकारी के समक्ष पेश होने का निर्देश।

विधिक एवं तकनीकी विश्लेषण: ‘AI मतिभ्रम (Hallucinations), प्रशासनिक अधिनिर्णयन और न्यायिक शुचिता’

  • ‘विजय घनश्याम गाडिया बनाम भारत संघ’ (Supreme Court, 2026) का बाध्यकारी अधिदेश:
    • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2026 में विधिक अनुसंधान और निर्णय-प्रक्रिया में एआई के अंधाधुंध उपयोग पर सख्त दिशानिर्देश तय किए थे।
    • शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी थी कि किसी भी वकील, न्यायाधीश या अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकारी द्वारा किसी भी न्यायिक आदेश में उद्धृत प्रत्येक नज़ीर का प्राथमिक स्रोतों (एससीआर, एससीसी, एआईआर आदि) से भौतिक सत्यापन (Physical/Primary Verification) करना अनिवार्य है। बिना सत्यापन के अस्तित्वहीन निर्णय प्रस्तुत करना न्याय प्रशासन को गुमराह करने और न्यायिक प्रक्रिया को दूषित करने के समान है।
  • लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLM) और ‘एआई मतिभ्रम’ (AI Hallucinations):
    • विधिक शोध में उपयोग किए जाने वाले ओपन एआई टूल्स अक्सर तथ्यात्मक रूप से सही होने के बजाय तार्किक रूप से प्रवाहपूर्ण दिखने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
    • जब कोई अधिकारी किसी विशिष्ट विधिक स्थिति पर केस लॉ ढूंढता है, तो एआई कई बार न्यायाधीशों के नाम, वर्षों और केस नंबरों को मिलाकर एक ऐसा “काल्पनिक सुप्रीम कोर्ट फैसला” तैयार कर देता है जो सुनने में पूरी तरह वास्तविक लगता है, किंतु कानूनी रूप से कभी हुआ ही नहीं होता।
  • अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकारियों पर वैधानिक प्रतिबंध:
    • सीमा शुल्क आयुक्त जैसे प्राधिकारी न्यायिक शक्ति का प्रयोग करते हैं। उनके आदेश नागरिकों और कंपनियों के मौलिक संपत्ति अधिकारों और व्यापार की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(g)) को प्रभावित करते हैं।
    • यदि कोई अधिनिर्णायक अधिकारी मशीनरी आउटपुट को बिना जांचे अपने आदेश का आधार बनाता है, तो वह अपने सांविधिक कर्तव्य का परित्याग (Abdication of Statutory Duty) करता है, जो आदेश को आरंभतः शून्य (Void ab initio) बना देता है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: बॉम्बे उच्च न्यायालय, मूल दीवानी क्षेत्राधिकार (संवैधानिक रिट — अनुच्छेद 226)
  • केस संदर्भ: क्वांटा लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम सीमा शुल्क आयुक्त (आयात-I) [Writ Petition No. … / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति एम.एस. कार्णिक (Justice MS Karnik) एवं न्यायमूर्ति संदेश डी. पाटिल (Justice Sandesh D Patil)
  • निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: सहमति से रिट याचिका स्वीकृत; 11 अगस्त 2026 का कस्टम्स अधिनिर्णयन आदेश रद्द/निरस्त; प्राधिकारी को बिना किसी फर्जी एआई संदर्भ के मामले का नए सिरे से परीक्षण करने का निर्देश।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (क्वांटा लॉजिस्टिक्स) की ओर से:
    • वरिष्ठ अधिवक्ता वेंकटेश धोंड (Senior Advocate Venkatesh Dhond)
    • अधिवक्ता: बिमल राजशेखर एवं सुनंद सुब्रमण्यम।
  • प्रतिवादी (सीमा शुल्क विभाग) की ओर से:
    • अधिवक्ता: जितेंद्र बी. मिश्रा (Advocate Jitendra B Mishra) एवं संगीता यादव (Advocate Sangeeta Yadav)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार) एवं अनुच्छेद 14 (मनमानेपन के विरुद्ध संरक्षण)
    • सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 (Customs Act, 1962) — अधिनिर्णयन, मांग और शास्ति संबंधी धाराएं
    • प्रशासनिक विधि:
      • स्वतंत्र न्यायिक विवेक के प्रयोग का सिद्धांत (Doctrine of Independent Application of Mind)
      • प्राकृतिक न्याय और प्रासंगिक साक्ष्य का प्रकटीकरण (Disclosure of Relevant Material)
    • सर्वोच्च न्यायालय नज़ीर: विजय घनश्याम गाडिया बनाम भारत संघ (2026) — विधिक कार्यवाहियों में AI के उपयोग पर दिशानिर्देश
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • अर्द्ध-न्यायिक अधिनिर्णयन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और न्यायिक शुचिता का विधिक मानक: ‘सीमा शुल्क और अन्य राजस्व मामलों में अधिनिर्णयन करने वाले अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकारियों पर यह वैधानिक दायित्व है कि वे अपने व्यक्तिगत और स्वतंत्र न्यायिक विवेक का प्रयोग करें; कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) टूल्स द्वारा उत्पन्न सामग्री पर आंख मूंदकर भरोसा करना और अस्तित्वहीन, काल्पनिक सुप्रीम कोर्ट निर्णयों (AI Hallucinations) को आदेश का आधार बनाना न्यायिक प्रक्रिया का घोर अवमूल्यन और प्राकृतिक न्याय का खुला उल्लंघन है; सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार विधिक कार्यवाहियों में असत्यापित एआई नज़ीरों के उपयोग के प्रति शून्य-सहिष्णुता (Zero-Tolerance) बरती जानी अनिवार्य है; जिस पक्षकार के विरुद्ध आदेश पारित किया जा रहा है, उसे उन सभी नज़ीरों और सामग्रियों तक पहुंच प्राप्त करने का विधिक अधिकार है जिन पर प्राधिकारी निर्भर करता है; तथा जहाँ किसी आदेश की नींव ही काल्पनिक न्यायिक उद्धरणों पर टिकी हो, वहाँ वह आदेश कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं होता और उसे नए सिरे से परीक्षण हेतु निरस्त किया जाना ही न्यायसंगत विधिक मार्ग है।’
  • वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: बॉम्बे उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद सीमा शुल्क विभाग को कंपनी के खिलाफ पारित 11 अगस्त 2026 का दंडात्मक आदेश वापस लेना पड़ा है; अब कस्टम्स कमिश्नर को याचिकाकर्ता कंपनी को नए सिरे से व्यक्तिगत सुनवाई (Personal Hearing) का अवसर देना होगा और वास्तविक सांविधिक प्रावधानों व आधिकारिक रूप से सत्यापित केस कानूनों के आधार पर ही नया सकारण आदेश (Reasoned Order) पारित करना होगा। यह निर्णय देश भर के ट्रिब्यूनलों और सरकारी विभागों के लिए एक कड़ी चेतावनी है कि एआई का अंधानुकरण प्रशासनिक आदेशों को सीधे उच्च न्यायालयों में निरस्त करा सकता है।

Customs Order: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court)
पीठन्यायमूर्ति एम.एस. कर्णिक एवं न्यायमूर्ति संदेश डी. पाटिल
केस / पक्षकारक्वांटा लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम कस्टम्स कमिश्नर (इम्पोर्ट-I)
प्रतिनिधित्वयाचिकाकर्ता पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता वेंकटेश धोंड, अधिवक्ता विमल राजशेखर, सुनांद सुब्रमण्यम | कस्टम्स विभाग पक्ष: अधिवक्ता जितेन्द्र बी. मिश्रा एवं संगीता यादव
संबंधित नज़ीरसर्वोच्च न्यायालय का 2026 का निर्णय: Vijay Ghanshyam Gadiya v. Union of India (एआई हैलुसिनेशन पर Zero-Tolerance)
मूल विवाद11 अगस्त 2026 के कस्टम्स आदेश में सर्वोच्च न्यायालय की दो गैर-मौजूद/काल्पनिक नज़ीरों (Non-existent Judgments) का उल्लेख।
अदालत का अंतिम आदेशसहमति से आदेश रद्द (Quashed by Consent): कस्टम्स आदेश निरस्त; विभाग को नए सिरे से निष्पक्ष सुनवाई करने का निर्देश।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
clear sky
24.4 ° C
24.4 °
24.4 °
52 %
2kmh
0 %
Sat
25 °
Sun
29 °
Mon
30 °
Tue
30 °
Wed
30 °

Recent Comments