Saturday, November 7, 2026
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Judicial Review: शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रदीप पूर्णेकर हत्याकांड…जांच एजेंसी को यह निर्देश नहीं दिया जा सकता कि जांच कैसे की जाए; नियमित पीठ के समक्ष जाने की छूट

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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क

  1. याचिकाकर्ता के आरोप:मृतक के परिजनों और शिकायतकर्ता मंदार घोडके ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर मामले की जांच विशेष जांच दल (SIT) से हटाकर किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने की मांग की थी। उनका तर्क था कि वर्तमान एसआईटी मुख्य राजनीतिक साजिशकर्ताओं को बचा रही है और उनके द्वारा सौंपे गए महत्वपूर्ण सबूतों की अनदेखी कर रही है।
  2. राज्य सरकार और SIT की दलीलें:विशेष लोक अभियोजक राजीव चव्हाण ने एसआईटी की जांच प्रगति का बचाव करते हुए अदालत को सूचित किया कि 29 सितंबर 2026 की हत्या के महज 10 दिनों के भीतर 5 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दिए गए साक्ष्यों को फोरेंसिक प्रयोगशाला (FSL) जांच के लिए भेजा गया है।
  3. अदालत का रुख:पीठ ने माना कि घटना के 37 दिनों के भीतर जांच एजेंसी द्वारा तेजी से कार्रवाई की गई है और वैधानिक 90 दिनों की अवधि के तहत चार्जशीट दाखिल करने के लिए अभी 45 से अधिक दिन बाकी हैं। ऐसे में जांच के बीच में अदालत द्वारा हस्तक्षेप करना उचित नहीं है।

मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष

1. जांच प्रक्रिया में गैर-हस्तक्षेप का सिद्धांत (Non-Interference in Investigation):

यह निर्णय पुनः स्थापित करता है कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC/BNSS) के तहत किसी अपराध की जांच का विशेष अधिकार पुलिस/जांच एजेंसियों का है। अदालतें तब तक जांच एजेंसी के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं या दिशा-निर्देश नहीं दे सकतीं, जब तक कि जांच में घोर द्वेष या असंवैधानिकता साबित न हो।

2. अवकाशकालीन पीठ की सीमित भूमिका:

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल तात्कालिक आपात स्थिति में ही अवकाशकालीन पीठ (Vacation Bench) असाधारण कदम उठाती है। चल रही आपराधिक जांच को स्थानांतरित करने जैसे नीतिगत/प्रक्रियात्मक फैसलों पर नियमित पीठ ही विचार करेगी।

मुंबई: भारत का संविधान के अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का असाधारण रिट क्षेत्राधिकार बनाम आपराधिक जांच में न्यायिक अहस्तक्षेप का सिद्धांत), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 193(3) (गिरफ्तारी के 60/90 दिनों के भीतर आरोप पत्र दाखिल करने की सांविधिक समय-सीमा—पूर्ववर्ती CrPC धारा 167), आपराधिक न्यायशास्त्र में जांच के स्थानांतरण (Transfer of Investigation to CBI/Independent Agency) के असाधारण विधिक मानक, तथा सर्वोच्च न्यायालय के सुस्थापित सिद्धांतों—कि संवैधानिक अदालतें जांच एजेंसी को यह निर्देश नहीं दे सकतीं कि जांच किस दिशा में या किस रीति से संचालित की जाए—के तहत बॉम्बे उच्च न्यायालय ने ठाणे के सनसनीखेज राजनीतिक हत्याकांड में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।

बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना (Justice Advait Sethna) और न्यायमूर्ति रणजीतसिंह भोंसले (Justice Ranjitsinha Bhonsale) की अवकाशकालीन खंडपीठ (Vacation Division Bench) ने शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता प्रदीप पूर्णेकर (Pradeep Purnekar) की नृशंस हत्या की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी (जैसे सीबीआई या स्वतंत्र एसआईटी) को तुरंत स्थानांतरित करने की मांग वाली याचिका पर कोई भी अंतरिम राहत देने से साफ इनकार (Declined urgent relief) कर दिया।

खंडपीठ ने अवकाश के दौरान मामले की अति-तात्कालिकता (Urgency) पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया कि घटना को हुए अभी केवल 37 दिन बीते हैं और आरोप पत्र दाखिल करने के लिए कानूनन 45 दिन से अधिक का समय शेष है। अदालत ने सुस्थापित विधिक नज़ीरों का स्मरण कराते हुए दो-टूक कहा कि अदालत यह तय नहीं कर सकती कि जांच एजेंसी को अपनी जांच किस पद्धति से करनी चाहिए। राज्य सरकार द्वारा 10 दिनों के भीतर 5 त्वरित गिरफ्तारियां किए जाने और फोरेंसिक जांच जारी रहने की दलील को दर्ज करते हुए खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं को अवकाश समाप्त होने के बाद नियमित अदालत (Regular Bench) के समक्ष अपनी अर्जी रखने की छूट प्रदान की।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘जांच किस तरह की जाए, यह निर्देश अदालत नहीं दे सकती; नज़ीरें इसके विपरीत हैं’:

न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना और न्यायमूर्ति रणजीतसिंह भोंसले की अवकाशकालीन पीठ ने जांच के तौर-तरीकों में न्यायिक हस्तक्षेप की विधिक सीमाओं को रेखांकित करते हुए कहा: “यह कानून का अत्यंत सुस्थापित सिद्धांत (More than settled law) है कि यह अदालत यह निर्देश नहीं दे सकती कि जांच किस रीति से आगे बढ़नी चाहिए (Court cannot direct the manner in which the investigation has to go on)। अदालतों के ऐसे कई आदेश हैं जो इस प्रकार के न्यायिक हस्तक्षेप की स्पष्ट निंदा करते हैं। हो सकता है कि आपके पास एक अत्यंत पुख्ता मामला (Foolproof case) हो, हम उस पर कोई संदेह नहीं कर रहे हैं। किंतु इस स्तर पर, अवकाशकालीन अदालत (Vacation Court) के लिए कोई भी ऐसा आदेश पारित करना कतई संभव नहीं है।”

2. ‘जांच में अभी 45 दिन से अधिक बाकी हैं; अवकाश में ट्रांसफर की हड़बड़ी क्यों?’:

  • जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मौजूदा एसआईटी राजनीतिक संरक्षकों को बचा रही है और जांच तुरंत किसी अन्य एजेंसी को ट्रांसफर होनी चाहिए, तो पीठ ने तीखी टिप्पणी की:“यह क्या है? क्या आप चाहते हैं कि छुट्टियों (Vacation) के दौरान जांच ट्रांसफर कर दी जाए? आरोप पत्र दाखिल करने और जांच पूरी होने में अभी 45 दिनों से अधिक का समय शेष है।”
  • अदालत ने नोट किया कि 29 सितंबर की घटना के बाद से अभी केवल 37 दिन व्यतीत हुए हैं; अतः इतनी प्रारंभिक अवस्था में एसआईटी को अक्षम या पक्षपातपूर्ण मानकर जांच स्थानांतरित नहीं की जा सकती।

3. नियमित पीठ के समक्ष मेंशन करने की छूट:

  • अवकाशकालीन पीठ ने अंतरिम स्तर पर कोई आदेश देने से मना करते हुए याचिकाकर्ताओं को विधिक स्वतंत्रता दी कि वे अदालत खुलने के पहले ही दिन नियमित रोस्टर वाली खंडपीठ के समक्ष मामले को तत्काल सुनवाई हेतु मेंशन (Liberty to mention before regular bench) कर सकते हैं।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (सितंबर – नवंबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयबॉम्बे उच्च न्यायालय, अपीलीय मूल क्षेत्राधिकार (अवकाशकालीन खंडपीठ)
पीठन्यायमूर्ति अद्वैत सेठना (Justice Advait Sethna) एवं न्यायमूर्ति रणजीतसिंह भोंसले (Justice Ranjitsinha Bhonsale)
आदेश की तिथि6 नवंबर 2026 (शुक्रवार)
केस संदर्भमंदार घोडके बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य [Writ Petition (Criminal) / 2026]
याचिकाकर्ता पक्षमंदार घोडके (Mandar Ghodke) — मामले के मूल शिकायतकर्ता एवं मृतक प्रदीप पूर्णेकर के पारिवारिक सदस्य।
प्रतिवादी पक्ष1. महाराष्ट्र राज्य (गृह विभाग)
2. ठाणे पुलिस आयुक्त व विशेष जांच दल (SIT)।
अभियोजन / राज्य के विशेष लोक अभियोजकविशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor – SPP) राजीव चव्हाण (Rajeev Chavan)।
घटना का संदर्भ व स्थान29 सितंबर 2026, ठाणे (महाराष्ट्र) — शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के प्रमुख स्थानीय नेता प्रदीप पूर्णेकर की गोली मारकर/हथियारों से नृशंस हत्या।
याचिकाकर्ताओं के मुख्य आरोप1. मुख्य षड्यंत्रकारियों को संरक्षण: वर्तमान में ठाणे पुलिस की एसआईटी केवल जमीनी हमलावरों (शूटरों) तक सीमित है और वास्तविक राजनीतिक साजिशकर्ताओं (Political Masterminds) को बचा रही है।
2. महत्वपूर्ण साक्ष्यों की उपेक्षा: याचिकाकर्ताओं द्वारा एसआईटी को ऐसे पुख्ता डिजिटल व दस्तावेजी साक्ष्य सौंपे गए थे जो गिरफ्तार आरोपियों और मुख्य साजिशकर्ता के सीधे संपर्कों को सिद्ध करते हैं, किंतु एसआईटी ने उन्हें अनदेखा किया।
3. जांच का स्थानांतरण: मांग की गई कि निष्पक्ष न्याय के हित में जांच को राज्य पुलिस की एसआईटी से छीनकर किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी या उच्च न्यायालय की निगरानी वाली नई टीम को सौंपा जाए।
राज्य सरकार (SPP) का विधिक बचावहत्या के 10 दिनों के भीतर पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 5 मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया; याचिकाकर्ताओं द्वारा दी गई सामग्री व सीडीआर को राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) में तकनीकी जांच हेतु भेजा गया है; जांच बिना किसी दबाव के निष्पक्ष चल रही है।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णयअवकाश के दौरान जांच ट्रांसफर करने की तत्काल अंतरिम राहत अस्वीकार/खारिज; याचिकाकर्ताओं को नियमित अदालत खुलने पर मामले को मेंशन करने की छूट (Liberty granted)।

विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: ‘जांच में न्यायिक अहस्तक्षेप और जांच अंतरण की सीमाएं’

  • आपराधिक जांच में न्यायालयों के अहस्तक्षेप का सिद्धांत (Separation of Investigation and Adjudication):
    • प्रिवी काउंसिल के ऐतिहासिक निर्णय किंग-एम्पेरर बनाम ख्वाजा नजीर अहमद [AIR 1945 PC 18] से लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के स्टेट ऑफ बिहार बनाम जे.ए.सी. सल्दाना [(1980) 1 SCC 554] तक यह विधि सुस्थापित है कि संज्ञेय अपराध की जांच करना कार्यपालिका और वैधानिक जांच एजेंसी का अनन्य क्षेत्र है।
    • अदालतें यह निगरानी कर सकती हैं कि जांच विधि सम्मत हो रही है या नहीं, किंतु वे जांच अधिकारी (IO) के जूते में पैर रखकर यह डिक्टेट नहीं कर सकतीं कि वह किसे पहले गिरफ्तार करे, किस धारा में जांच मोड़े या किस साक्ष्य को किस समय रिकॉर्ड पर ले।
  • जांच के स्थानांतरण (Transfer of Probe) हेतु कड़ा विधिक पैमाना:
    • सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने पश्चिम बंगाल राज्य बनाम धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मंच (कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स) [(2010) 3 SCC 571] में स्पष्ट किया था कि उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत जांच को किसी अन्य एजेंसी (जैसे CBI) को स्थानांतरित करने की असाधारण शक्ति प्राप्त है।
    • किंतु इस शक्ति का प्रयोग “अत्यंत संयम, मितव्ययिता और केवल दुर्लभतम एवं असाधारण परिस्थितियों” (Very sparingly, cautiously and in exceptional situations) में ही किया जाना चाहिए—जैसे कि जब राज्य का शीर्ष नेतृत्व ही जांच को दबाने में सीधे संलिप्त पाया जाए या स्थानीय पुलिस का पूर्वाग्रह प्रथम दृष्टया शीशे की तरह साफ हो।
  • जांच की समय-सीमा और अवकाशकालीन पीठ की मर्यादा:
    • हत्या जैसे जघन्य अपराधों में कानून (BNSS धारा 193 / पूर्ववर्ती CrPC धारा 167(2)) जांच एजेंसी को संपूर्ण अन्वेषण कर आरोप पत्र दाखिल करने हेतु 90 दिनों का सांविधिक समय प्रदान करता है।
    • घटना के मात्र 37 दिनों के भीतर, जबकि पुलिस ने 5 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया हो और वैज्ञानिक साक्ष्य फोरेंसिक लैब में प्रतीक्षारत हों, यह निष्कर्ष निकालना कि जांच विफल हो चुकी है, विधिक रूप से अपरिपक्व (Premature) कदम होता। अवकाशकालीन पीठ ने सही विधिक दृष्टिकोण अपनाते हुए नियमित अदालत को ही इस पर अंतिम विचार करने का दायित्व सौंपा।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: बॉम्बे उच्च न्यायालय, मूल क्षेत्राधिकार (अवकाशकालीन खंडपीठ)
  • केस संदर्भ: मंदार घोडके बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य [Writ Petition (Criminal) / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना (Justice Advait Sethna) एवं न्यायमूर्ति रणजीतसिंह भोंसले (Justice Ranjitsinha Bhonsale)
  • आदेश की तिथि: 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार)
  • कार्यवाही का परिणाम: अवकाश के दौरान जांच स्थानांतरित करने की अंतरिम प्रार्थना नामंजूर; याचिकाकर्ताओं को नियमित अदालत (Regular Bench) के पुनः खुलने पर मामले को तत्काल मेंशन करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ताओं (मृतक पूर्णेकर के परिजनों) की ओर से: याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्तागण।
  • प्रतिवादी (महाराष्ट्र राज्य व एसआईटी) की ओर से:
    • विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor – SPP) राजीव चव्हाण (Rajeev Chavan)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार) एवं अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष व त्वरित अन्वेषण का अधिकार)
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
      • धारा 175 — संज्ञेय मामलों में अन्वेषण की पुलिस की सामान्य शक्तियां
      • धारा 193(3) — अन्वेषण पूरा करने और आरोप पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया (पूर्ववर्ती CrPC धारा 173)
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
      • धारा 103(1) — हत्या का अपराध (पूर्ववर्ती IPC धारा 302)
      • धारा 61 — आपराधिक षड्यंत्र (पूर्ववर्ती IPC धारा 120B)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • आपराधिक अन्वेषण की स्वायत्तता, जांच के स्थानांतरण और अंतरिम राहत का विधिक मानक: ‘आपराधिक मामलों में संज्ञेय अपराध की निष्पक्ष और गहन जांच करना पुलिस और वैधानिक जांच एजेंसी का अनन्य विधिक क्षेत्राधिकार है; संवैधानिक अदालतें अनुच्छेद 226 के तहत जांच की प्रगति की निगरानी तो कर सकती हैं, किंतु वे जांच एजेंसी को यह निर्देश नहीं दे सकतीं कि जांच किस विशेष रीति, पद्धति या कोण से संचालित की जानी चाहिए; राज्य पुलिस से जांच छीनकर किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी को सौंपने की असाधारण शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब पत्रावली पर यह अचूक रूप से सिद्ध हो जाए कि जांच पूरी तरह दूषित, पक्षपातपूर्ण या राजनीतिक दबाव में निष्प्रभावी हो चुकी है; जब जांच की सांविधिक समय-सीमा (90 दिन) का बड़ा हिस्सा शेष हो और पुलिस ने महत्वपूर्ण गिरफ्तारियां कर साक्ष्य वैज्ञानिक परीक्षण हेतु भेजे हों, तो अवकाशकालीन अदालत द्वारा जांच का स्थानांतरण करना न्यायसंगत नहीं है; तथा ऐसे मामलों में गुण-दोष का अंतिम परीक्षण नियमित रोस्टर पीठ द्वारा ही किया जाना विधिक परिपाटी के अनुकूल है।’
  • वर्तमान स्थिति व भावी प्रक्रिया: बॉम्बे उच्च न्यायालय की अवकाशकालीन पीठ के इस आदेश के बाद ठाणे पुलिस की एसआईटी प्रदीप पूर्णेकर हत्याकांड में अपनी वर्तमान जांच और चार्जशीट तैयार करने की प्रक्रिया निर्बाध रूप से जारी रखेगी; वहीं दीवाली/अवकाश समाप्त होते ही याचिकाकर्ता नियमित आपराधिक खंडपीठ के समक्ष इस याचिका को सूचीबद्ध कराकर एसआईटी की अब तक की केस डायरी तलब करने और मुख्य राजनीतिक साजिशकर्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई की मांग को आगे बढ़ाएंगे।

Judicial Review: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court)
पीठन्यायमूर्ति अद्वैत सेठना एवं न्यायमूर्ति रंजीतसिंह भोसले (Vacation Bench)
केस / पक्षकारमंदार घोडके बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य (Mandar Ghodke v. State of Maharashtra & Ors.)
प्रतिनिधित्वराज्य/SIT पक्ष: विशेष लोक अभियोजक राजीव चव्हाण (Special Public Prosecutor Rajeev Chavan)
घटनाक्रम29 सितंबर 2026 को ठाणे में शिवसेना (UBT) नेता प्रदीप पुरणेकर की हत्या; परिजनों द्वारा असली राजनीतिक साजिशकर्ताओं को बचाने का आरोप।
अदालत का अंतरिम आदेशतत्काल स्थानांतरण की मांग खारिज: अवकाशकालीन पीठ का हस्तक्षेप से इनकार; याचिकाकर्ताओं को नियमित अदालत खुलने के पहले दिन अर्जी देने की छूट।

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