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मामले की पृष्ठभूमि और विधिक तर्क
- शुरुआती आरोप और बाद का बयान:शिकायतकर्ता महिला ने प्रारंभ में प्राथमिकी (FIR) में आरोप लगाया था कि जब वह एक वित्तीय विवाद को सुलझाने याचिकाकर्ता के घर गई, तो उसने पैसे और अन्य लाभ के बदले यौन अनुग्रह की मांग की तथा शारीरिक नुकसान पहुँचाने की धमकी दी। हालांकि, जांच के दौरान पुलिस के समक्ष दर्ज कराए गए अपने उत्तरवर्ती बयान (Subsequent Statement) में महिला अपने शुरुआती आरोपों से मुकर गई और कहा कि याचिकाकर्ता ने केवल उसे अनुचित/गलत तरीके से देखा था।
- चार्जशीट और कानून का अनुप्रयोग:शिकायतकर्ता द्वारा मुख्य आरोपों को नकार देने के बावजूद, पुलिस ने BNS की धारा 75(1)(ii) और धारा 351(2) के तहत न्यायालय में चार्जशीट दाखिल कर दी। आरोपी ने इस चार्जशीट को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
- न्यायालय का विधिक दृष्टिकोण:अदालत ने माना कि केवल मूल शिकायत और बाद के बयान में विसंगतियां होना ही हमेशा केस रद्द करने का आधार नहीं होता, लेकिन जब शिकायतकर्ता स्वयं अपराध के मुख्य वैधानिक घटकों (Essential Ingredients) को खारिज कर दे और केवल “अनुचित तरीके से देखने” का दावा बचे, तो BNS की धारा 75(1)(ii) के तहत आपराधिक मुकदमा जारी रखना निष्फल और निरर्थक होगा।
मुख्य विधिक व यौन उत्पीड़न कानून संबंधी निष्कर्ष
1. BNS की धारा 75(1)(ii) के कड़े घटक (Strict Interpretation of Mens Rea & Actus Reus):
यह निर्णय रेखांकित करता है कि “यौन अनुग्रह की मांग या अनुरोध” के अपराध को साबित करने के लिए आरोपी की ओर से स्पष्ट, प्रत्यक्ष मांग या प्रस्ताव का होना आवश्यक है। केवल अनुचित दृष्टि या अनुचित व्यवहार को, जब तक कि वह धारा 75 के अन्य विशिष्ट प्रावधानों के मापदंडों को पूरा न करे, यौन पक्ष की वैधानिक मांग नहीं माना जा सकता।
2. जांच के दौरान दर्ज बयानों का महत्व (Quashing of Retaliatory Probes):
शीर्ष अदालत के सिद्धांतों के अनुसार, यदि जांच के दौरान स्वयं पीड़ित पक्ष उन तथ्यों का खंडन कर दे जो अपराध का मुख्य आधार हैं और अन्य कोई साक्ष्य मौजूद न हो, तो अदालतों को निष्फल मुकदमों को चलाकर समय और संसाधनों की बर्बादी रोकने हेतु हस्तक्षेप करना चाहिए।
बेंगलुरु: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 (आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करने की उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति—पूर्ववर्ती CrPC धारा 482), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 75(1)(ii) (यौन अनुग्रह की मांग या अनुरोध करना / Demand or request for sexual favours—पूर्ववर्ती IPC धारा 354A(1)(ii)), धारा 351(2) (आपराधिक अभित्रास / Criminal Intimidation), तथा यौन उत्पीड़न के अपराधों में ‘आपराधिक घटक’ (Essential Ingredients of Offence) और जांच के दौरान शिकायतकर्ता द्वारा पूर्व बयानों को नकारने (Disowning of Initial Allegations) के विधिक प्रभाव के तहत कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैधानिक व्यवस्था दी है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज (Justice Suraj Govindaraj) की एकल पीठ ने अभियुक्त हफीज कासिम (Hafeez Khasim) द्वारा दायर याचिका को स्वीकार (Allowed) करते हुए उनके विरुद्ध यौन उत्पीड़न और आपराधिक धमकी के तहत दर्ज आरोप पत्र (Chargesheet) और संपूर्ण आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द (Quashed) कर दिया।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि किसी महिला की ओर केवल “अनुचित तरीके से देखना” (Looking inappropriately at a woman), अपने आप में, BNS की धारा 75(1)(ii) के अंतर्गत यौन अनुग्रह की स्पष्ट मांग या अनुरोध के अपराध का गठन करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता महिला ने जांच के दौरान पुलिस को दिए गए अपने बाद के बयान में प्रारंभिक गंभीर आरोपों—पैसे के बदले शारीरिक संबंध की मांग और जान से मारने की धमकी—को पूरी तरह खारिज/अस्वीकार (Disowned) कर दिया था और केवल इतना आरोप शेष रखा था कि अभियुक्त ने उसे गलत नजर से देखा था। अदालत ने माना कि जब बुनियादी विधिक घटक ही नदारद हों, तो विचारण जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का निरर्थक दुरुपयोग होगा।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘अनुचित नजर से देखना BNS की धारा 75(1)(ii) के तहत यौन संबंध की मांग नहीं’:
न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज ने BNS की धारा 75 के विधिक घटकों का विश्लेषण करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट किया: “याचिकाकर्ता द्वारा प्रतिवादी संख्या 2 (शिकायतकर्ता) को अनुचित तरीके से देखे जाने का आरोप, अपने आप में, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 75(1)(ii) के अर्थ के भीतर यौन अनुग्रह की मांग या अनुरोध (Demand or request for sexual favours) के रूप में नहीं माना जा सकता है।”
2. ‘शिकायतकर्ता का बाद का बयान आरोप पत्र के मूल विधिक आधार को ही शून्य कर देता है’:
- अदालत ने प्राथमिकी और जांच के दौरान दर्ज बयानों के अंतर्विरोध पर टिप्पणी करते हुए कहा:“यद्यपि मूल शिकायत में एक ऐसा आरोप शामिल था, जिसे यदि साबित कर दिया जाता तो वह संबंधित विधिक प्रावधान को आकर्षित करता; किंतु जांच के दौरान स्वयं शिकायतकर्ता का दर्ज किया गया बाद का बयान (Subsequent statement recorded during investigation), विशेष रूप से उस अपराध के अनिवार्य घटक को ही नकार देता है जिसके लिए पुलिस द्वारा आरोप पत्र (Charge-sheet) दाखिल किया गया है।”
3. असंगतता बनाम आधारहीन मुकदमा चलाने का विधिक विभेद:
- पीठ ने माना कि सामान्य विसंगतियों (Mere Inconsistencies) से हर आपराधिक मामला रद्द नहीं होता, किंतु यहाँ स्थिति भिन्न थी:“जांच के दौरान कथित तौर पर यौन अनुग्रह की मांग या कथित आपराधिक धमकी को साबित करने के लिए किसी भी अन्य सामग्री के अभाव में, इस न्यायालय का यह सुविचारित मत है कि BNS की धारा 75(1)(ii) और 351(2) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए कार्यवाहियों को जारी रखने से कोई सार्थक उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | कर्नाटक उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ बेंगलुरु (आपराधिक अंतर्निहित क्षेत्राधिकार — धारा 528 BNSS / 482 CrPC) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज (Justice Suraj Govindaraj) (एकल पीठ) |
| निर्णय की तिथि | 2 नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | हफीज कासिम बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य [Criminal Petition / 2026] |
| याचिकाकर्ता (अभियुक्त) | हफीज कासिम (Hafeez Khasim)। |
| याचिकाकर्ता के अधिवक्तागण | अधिवक्ता ए.एस. कुलकर्णी (Advocate AS Kulkarni) एवं रक्षण एम.के. (Advocate Rakshan MK)। |
| अभियोजन पक्ष (राज्य) | उच्च न्यायालय सरकारी अधिवक्ता (HCGP) रंजीत कुमार एन. (Ranjith Kumar N)। |
| शिकायतकर्ता पक्ष (प्रतिवादी संख्या 2) | पीड़ित महिला (अधिवक्ता मोहम्मद उम्मर फारूक (Advocate Mohmmed Ummar Farooq) के माध्यम से उपस्थित)। |
| मूल विवाद का उद्भव | शिकायतकर्ता महिला और याचिकाकर्ता के बीच पहले से एक वित्तीय विवाद (Financial Dispute) चल रहा था। महिला उस विवाद को सुलझाने के उद्देश्य से अभियुक्त के निजी आवास पर गई थी। |
| प्राथमिकी (FIR) के प्रारंभिक आरोप | प्राथमिकी में महिला ने आरोप लगाया था कि जब वह उसके घर गई, तो अभियुक्त ने उससे यौन अनुग्रह (Sexual Favours) की मांग की और इसके बदले में उसे वित्तीय लाभ/रुपये देने का वादा किया; साथ ही पैसे न लौटाने पर शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकी दी। • दर्ज धाराएं: BNS की धारा 75(1)(ii), 75(1)(iv), 351(2) और 352। |
| जांच में नाटकीय मोड़ (मुकर जाना) | जब जांच अधिकारी ने महिला का विस्तृत बयान दर्ज किया, तो महिला अपने पहले के सभी गंभीर आरोपों से मुकर गई। उसने स्वीकार किया कि अभियुक्त ने न तो कोई यौन अनुग्रह मांगा था, न पैसे की पेशकश की थी और न ही कोई शारीरिक धमकी दी थी; उसने केवल यह कहा कि अभियुक्त ने उसे “अनुचित तरीके से देखा (Looked inappropriately)” था। |
| पुलिस की लापरवाही | महिला द्वारा प्राथमिक आरोपों को खारिज किए जाने के बावजूद, जांच एजेंसी ने यांत्रिक रूप से BNS की धारा 75(1)(ii) और धारा 351(2) के तहत विचारण अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया। |
| उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय | आपराधिक याचिका स्वीकृत (Allowed); हफीज कासिम के विरुद्ध आरोप पत्र और विचारण न्यायालय की संपूर्ण कार्यवाहियां पूरी तरह रद्द/निरस्त (Quashed)। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘BNS धारा 75(1)(ii) की बनावट और ताक-झांक (Voyeurism) से विभेद’
- BNS की धारा 75(1)(ii) (पूर्ववर्ती IPC 354A(1)(ii)) के अनिवार्य विधिक तत्व:
- कानूनन यौन उत्पीड़न की इस विशिष्ट उपधारा के तहत अपराध सिद्ध करने हेतु दो बुनियादी तत्वों का अभियोजन द्वारा साबित किया जाना अनिवार्य है:
- अभियुक्त द्वारा यौन प्रकृति के किसी अनुग्रह/शारीरिक संबंध की स्पष्ट मांग (Demand) की गई हो, अथवा
- इस संबंध में कोई प्रत्यक्ष अनुरोध (Request) किया गया हो।
- कानून में ‘मांग’ या ‘अनुरोध’ एक सकारात्मक, प्रत्यक्ष और संचारी कृत्य (Overt Communicative Act) है—चाहे वह शब्दों द्वारा हो, इशारों से हो या लिखित रूप में। केवल किसी की ओर घूरना या “अनुचित दृष्टि से देखना”, चाहे वह कितना भी अनैतिक या अनुचित क्यों न लगे, जब तक कि उसके साथ यौन अनुग्रह की कोई प्रत्यक्ष मांग न जुड़ी हो, वह धारा 75(1)(ii) की परिधि में नहीं आ सकता।
- कानूनन यौन उत्पीड़न की इस विशिष्ट उपधारा के तहत अपराध सिद्ध करने हेतु दो बुनियादी तत्वों का अभियोजन द्वारा साबित किया जाना अनिवार्य है:
- ताक-झांक (BNS 77 / IPC 354C) या शील भंग (BNS 79 / IPC 509) से भिन्नता:
- यदि कोई व्यक्ति किसी महिला की निजता का उल्लंघन करता है या उसे ताकता है, तो कानून में ताक-झांक (Voyeurism – BNS धारा 77) या महिला की लज्जा का अनादर करने वाले कृत्य (BNS धारा 79) के विशिष्ट प्रावधान हैं।
- किंतु पुलिस ने इन धाराओं के बजाय सीधे धारा 75(1)(ii) (यौन अनुग्रह की मांग) लगाई थी। जब महिला ने स्वयं कह दिया कि कोई मांग नहीं की गई थी, तो पुलिस द्वारा उस धारा को चार्जशीट में बनाए रखना कानूनी रूप से असंवैधानिक और त्रुटिपूर्ण था।
- BNS की धारा 351(2) (आपराधिक धमकी) का लोप:
- आपराधिक अभित्रास का अपराध तभी बनता है जब आरोपी ने जान-माल, शरीर या प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाने की वास्तविक धमकी दी हो जिससे पीड़ित के मन में वास्तविक भय पैदा हुआ हो।
- चूँकि महिला ने अपने बाद के बयान में धमकी के आरोप को भी पूरी तरह नकार दिया था, अतः धारा 351(2) के तहत भी कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता था।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: कर्नाटक उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ बेंगलुरु (आपराधिक अंतर्निहित क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: हफीज कासिम बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य [Criminal Petition No. … / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज (Justice Suraj Govindaraj) (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: 2 नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: आपराधिक याचिका स्वीकृत; BNS की धारा 75(1)(ii) और 351(2) के तहत दाखिल आरोप पत्र और निचली अदालत की संपूर्ण कार्यवाहियां पूरी तरह रद्द (Quashed)।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (अभियुक्त) की ओर से:
- अधिवक्ता: ए.एस. कुलकर्णी (Advocate AS Kulkarni) एवं रक्षण एम.के. (Advocate Rakshan MK)।
- प्रतिवादी राज्य (कर्नाटक) की ओर से:
- उच्च न्यायालय सरकारी अधिवक्ता (High Court Government Pleader – HCGP) रंजीत कुमार एन. (Ranjith Kumar N)।
- प्रतिवादी शिकायतकर्ता की ओर से:
- अधिवक्ता: मोहम्मद उम्मर फारूक (Advocate Mohmmed Ummar Farooq)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 528 (उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां — पूर्ववर्ती CrPC धारा 482)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 75(1)(ii) — यौन अनुग्रह की मांग या अनुरोध करना (पूर्ववर्ती IPC धारा 354A(1)(ii))
- धारा 75(1)(iv) — लैंगिक दृष्टि से अभिप्रेत टिप्पणियां करना (पूर्ववर्ती IPC धारा 354A(1)(iv))
- धारा 351(2) — आपराधिक अभित्रास / धमकी (पूर्ववर्ती IPC धारा 506)
- धारा 352 — लोक शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान (पूर्ववर्ती IPC धारा 504)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- यौन उत्पीड़न के अनिवार्य घटक, अनुचित दृष्टि और आरोप पत्र की स्थिरता का विधिक मानक: ‘भारतीय न्याय संहिता की धारा 75(1)(ii) के अंतर्गत अपराध गठित करने हेतु यह अपरिहार्य है कि अभियुक्त द्वारा यौन प्रकृति के अनुग्रह की स्पष्ट और प्रत्यक्ष मांग या अनुरोध किया गया हो; किसी महिला की ओर केवल अनुचित तरीके से देखना (Looking inappropriately), अपने आप में, यौन अनुग्रह की मांग का विधिक अपराध नहीं बनाता; यद्यपि बयानों में मामूली विसंगतियां आपराधिक विचारण को रद्द करने का आधार नहीं होतीं, किंतु जहाँ स्वयं मूल शिकायतकर्ता जांच के दौरान अपने प्राथमिक गंभीर आरोपों (यौन मांग व धमकी) को पूरी तरह नकार दे और शेष बचा आरोप किसी संज्ञेय अपराध का गठन न करता हो, वहाँ अभियोजन के मूल विधिक आधार ही समाप्त हो जाते हैं; तथा ऐसी परिस्थितियों में अभियुक्त के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल करना और उसे आपराधिक मुकदमे के कटघरे में खड़ा रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, जिसे धारा 528 BNSS / 482 CrPC के तहत रद्द किया जाना न्याय के हित में अनिवार्य है।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: कर्नाटक उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद हफीज कासिम के विरुद्ध निचली अदालत में चल रहा आपराधिक मुकदमा औपचारिक रूप से समाप्त हो गया है; इस फैसले से यह स्पष्ट विधिक नज़ीर स्थापित हुई है कि जांच एजेंसियों को बयानों में आए बुनियादी बदलावों का संज्ञान लेकर ही आरोप पत्र तैयार करना चाहिए, न कि प्राथमिक प्राथमिकी की धाराओं को यांत्रिक रूप से अदालत में थोपना चाहिए।
Overt Demand: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज (Justice Suraj Govindaraj) |
| केस / पक्षकार | हफीज कासिम बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य (Hafeez Khasim v. State of Karnataka & Anr.) |
| प्रतिनिधित्व | याचिकाकर्ता पक्ष: अधिवक्ता ए.एस. कुलकर्णी व रक्षण एम.के. | राज्य पक्ष: उच्च न्यायालय सरकारी वकील रंजीत कुमार एन. | शिकायतकर्ता पक्ष: अधिवक्ता मोहम्मद उम्मर फारूक |
| संबंधित कानून/प्रावधान | भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 75(1)(ii) (यौन पक्ष की मांग), धारा 75(1)(iv) (कामुक टिप्पणी), धारा 351(2) (आपराधिक धमकी) एवं धारा 352 (शांति भंग हेतु अपमान) |
| मूल विवाद | वित्तीय विवाद के दौरान शुरू में पैसे व लाभ के बदले यौन अनुग्रह मांगने का आरोप; बाद में पुलिस बयान में महिला का मुख्य आरोपों से मुकरना और केवल “गलत नजर से देखने” का दावा करना। |
| अदालत का अंतिम आदेश | आपराधिक कार्यवाही निरस्त (Quashed): BNS धारा 75(1)(ii) और 351(2) के आवश्यक विधिक घटक अनुपस्थित; मुकदमे का संचालन कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना गया। |

