Wednesday, November 4, 2026
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Enrolling Lawyers: किसी भी वकील से वैकल्पिक फीस नहीं ली जा सकती…यह रहा सुप्रीम निर्देश

Enrolling Lawyers: सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि स्टेट बार काउंसिल्स और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) किसी भी लॉ ग्रेजुएट से नामांकन के समय वैकल्पिक (ऑप्शनल) फीस नहीं ले सकते।

जुलाई 2023 के निर्देश का नहीं हो रहा था पालन

शीर्ष कोर्ट ने कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल को ऐसी किसी भी फीस की वसूली तुरंत बंद करने का निर्देश दिया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने यह आदेश केएलजेए किरण बाबू की अवमानना याचिका पर दिया। याचिका में आरोप था कि सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2023 में जो निर्देश दिए थे, उनका पालन नहीं हो रहा है। कोर्ट ने तब कहा था कि स्टेट बार काउंसिल्स, खासकर कर्नाटक, लॉ ग्रेजुएट्स से नामांकन के समय मनमानी फीस नहीं वसूल सकते।

BCI ने अपने हलफनामे में निर्देश पालन की बात कही

BCI ने अपने हलफनामे में कहा कि सभी स्टेट बार काउंसिल्स कोर्ट के निर्देशों का पालन कर रही हैं। कर्नाटक बार काउंसिल द्वारा आईडी कार्ड, सर्टिफिकेट, वेलफेयर फंड और ट्रेनिंग आदि के लिए 6,800 रुपए और इसके अलावा 25,000 रुपए की जो फीस ली जा रही है, वह वैकल्पिक है, अनिवार्य नहीं। कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा, “हम स्पष्ट कर रहे हैं कि वैकल्पिक जैसा कुछ नहीं होता। कोई भी स्टेट बार काउंसिल या BCI किसी भी तरह की वैकल्पिक फीस नहीं वसूल सकते। वे केवल वही फीस वसूल सकते हैं, जो कोर्ट के मुख्य फैसले में तय की गई है।”

यह भी रही बार काउंसिल की कोर्ट में दलील

कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल वैकल्पिक के नाम पर कोई भी राशि वसूल रही है, तो उसे तुरंत बंद किया जाए। BCI चेयरमैन और सीनियर एडवोकेट मनन कुमार मिश्रा ने सुनवाई के दौरान बताया कि सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2023 के फैसले के बाद BCI ने 6 अगस्त को सभी स्टेट बार काउंसिल्स को पत्र भेजकर निर्देश दिए हैं कि नामांकन की प्रक्रिया कोर्ट के फैसले के अनुसार ही हो। BCI ने यह भी कहा कि उसे पूरा विश्वास है कि सभी स्टेट बार काउंसिल्स कोर्ट के फैसले का पालन कर रही हैं। साथ ही, अलग-अलग राज्यों की बार काउंसिल्स द्वारा ली जा रही फीस का एक विस्तृत चार्ट भी कोर्ट को सौंपा गया।

आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों के साथ भेदभाव का आरोप

पिछले साल 30 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि स्टेट बार काउंसिल्स लॉ ग्रेजुएट्स से नामांकन के समय अत्यधिक फीस नहीं वसूल सकते। कोर्ट ने इसे आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों के साथ भेदभाव बताया था, जो उनके कानूनी पेशे में आने की राह में बाधा बनता है। कोर्ट ने कहा था कि 15,000 से 40,000 रुपए तक की फीस वसूलना “समानता के सिद्धांत” के खिलाफ है। BCI और स्टेट बार काउंसिल्स संसद द्वारा तय की गई वित्तीय नीति में कोई बदलाव नहीं कर सकते।

अब तक वसूली गई अतिरिक्त फीस वापस नहीं करनी होगी

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि बार काउंसिल्स केवल 750 रुपए (सामान्य वर्ग) और 125 रुपए (SC-ST वर्ग) ही नामांकन फीस के रूप में ले सकते हैं। इससे अधिक फीस लेना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19(1)(g) (पेशे का अधिकार) का उल्लंघन है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा था कि यह फैसला भविष्य के लिए लागू होगा और अब तक वसूली गई अतिरिक्त फीस वापस नहीं करनी होगी।

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