Saturday, August 15, 2026
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Digital Arrest Scam: सुप्रीम कोर्ट के फर्जी वारंट और ED की धमकी लाया…हाईकोर्ट ने यह दी सजा

Digital Arrest Scam: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest) के जरिए 54 लाख रुपये की ठगी करने वाले एक आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस सुमीत गोयल ने आरोपी की दूसरी नियमित जमानत (Regular Bail) याचिका पर सुनवाई करते हुए उसे राहत देने से इनकार कर दिया। आरोपी पर मुंबई ED का बड़ा अधिकारी बनकर एक दंपत्ति से ₹54.26 लाख ठगने का आरोप है। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि फर्जी सुप्रीम कोर्ट वारंट और ED अधिकारी बनकर किया गया यह फ्रॉड एक “सुनियोजित साजिश” (Well-planned conspiracy) का हिस्सा है।

मोडस ऑपरेंडी: कैसे बुना गया जाल? (The Modus Operandi)

  • शिकायतकर्ता रमेश बावरी के अनुसार, ठगों ने बेहद शातिराना तरीके से इस वारदात को अंजाम दिया।
  • ED का डर: ठगों ने खुद को मुंबई ED का उच्च अधिकारी बताया और दावा किया कि शिकायतकर्ता के नाम पर ‘केनरा बैंक’ (मुंबई) में मनी लॉन्ड्रिंग के लिए खाता खुला है।
  • फर्जी सुप्रीम कोर्ट वारंट: डराने के लिए ठगों ने व्हाट्सएप पर सुप्रीम कोर्ट का एक जाली अरेस्ट वारंट भेजा।
  • डिजिटल अरेस्ट: ‘वेरिफिकेशन’ के नाम पर दंपत्ति को डिजिटल अरेस्ट की धमकी दी गई और डर के मारे उन्होंने बताए गए कई बैंक खातों में लाखों रुपये ट्रांसफर कर दिए।

आरोपी का बचाव और कोर्ट की जांच (The Financial Trail)

  • बचाव पक्ष: आरोपी के वकील आकाश मेहरा ने तर्क दिया कि उनका मुवक्किल जून 2025 से हिरासत में है और ट्रायल बहुत धीमी गति (Snail’s pace) से चल रहा है। साथ ही, FIR में उसका नाम नहीं था।
  • अभियोजन पक्ष: जांच में पता चला कि ठगी की एक बड़ी रकम “M/s भारत इलेक्ट्रॉनिक्स एंड एंटरप्राइजेज” नाम के खाते में गई, जिसे आरोपी संयुक्त रूप से चलाता था।

हाई कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष (Key Findings)

  • अदालत ने जमानत न देने के पीछे ठोस कानूनी आधार रखे।
  • गंभीर अपराध: यह मामला केवल पैसे की ठगी का नहीं, बल्कि सरकारी अधिकारियों की पहचान चोरी करने, जाली अदालती दस्तावेज बनाने और साइबर धोखाधड़ी का एक बड़ा नेटवर्क है।
  • जमानत के सिद्धांत: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत देना कोर्ट का विवेकाधिकार (Discretion) है, जिसे न्याय के हित में इस्तेमाल करना चाहिए। आरोपी के चरित्र, उसके भागने की संभावना और गवाहों को प्रभावित करने के खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
  • कोई नया बदलाव नहीं: चूंकि पहली जमानत याचिका खारिज होने के बाद परिस्थितियों में कोई बड़ा बदलाव (Change in circumstances) नहीं आया है, इसलिए दूसरी याचिका का कोई आधार नहीं बनता।

“डिजिटल अरेस्ट” पर कोर्ट की चेतावनी

हाई कोर्ट ने रेखांकित किया कि इस तरह के साइबर अपराध समाज के लिए बड़ा खतरा हैं। फर्जी डिजिटल अरेस्ट के जरिए लोगों के मन में कानून का डर पैदा करना और फिर उनसे पैसे ऐंठना एक गंभीर संगठित अपराध है।

निष्कर्ष: साइबर सुरक्षा और सतर्कता

यह फैसला साइबर अपराधियों के लिए एक कड़ा संदेश है। साथ ही, यह नागरिकों को याद दिलाता है कि ED, पुलिस या अदालतें कभी भी व्हाट्सएप पर वारंट नहीं भेजतीं और न ही “डिजिटल अरेस्ट” जैसा कोई कानूनी प्रावधान भारत में मौजूद है।

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