Thursday, October 1, 2026
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Dignity in Death: विरोध-प्रदर्शन के लिए शव का इस्तेमाल गलत…सम्मानजनक अंतिम संस्कार मौलिक अधिकार

Dignity in Death: मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने कहा, किसी भी मृतक के शरीर का उपयोग विरोध प्रदर्शन (Protest) के लिए ‘हथियार’ के रूप में नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट के जस्टिस एन. सतीश कुमार और जस्टिस एम. जोतिरामन की बेंच ने शिवगंगा जिले के एक 26 वर्षीय अनुसूचित जाति (SC) के युवक, आकाश की कथित हिरासत में मौत (Custodial Death) से जुड़ी एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया। एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार प्राप्त करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत एक मौलिक अधिकार है।

कोर्ट की पीड़ा: शव का अपमान न करें

  • अदालत ने कई दिनों तक शव को दफनाने में की जा रही देरी और उसे लेकर हो रहे प्रदर्शनों पर गहरा दुख जताया।
  • अनुच्छेद 21: “मृतक को गरिमापूर्ण विदाई देना केवल परंपरा नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है।”
  • राज्य की भूमिका: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासन या पुलिस परिवार को अंतिम संस्कार करने से नहीं रोक रही है, बल्कि प्रदर्शनों के कारण इसमें देरी हो रही है।

याचिका खारिज: “लोकहित नहीं, केवल पब्लिसिटी”

  • कोर्ट ने याचिकाकर्ता सी. सेल्वाकुमार द्वारा दायर PIL को ‘पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन’ करार देते हुए खारिज कर दिया।
  • जल्दबाजी: याचिकाकर्ता ने 22 मार्च 2026 की रात को ईमेल से शिकायत भेजी और अगले ही दिन कोर्ट में याचिका दायर कर दी। कोर्ट ने माना कि यह कदम केवल प्रचार पाने के उद्देश्य से उठाया गया था।
  • निगरानी में जांच: कोर्ट ने नोट किया कि मामला पहले से ही हाई कोर्ट की सिंगल बेंच की निगरानी में है और जांच CB-CID को सौंपी जा चुकी है।

मामला क्या था? (The Alleged Custodial Death)

  • घटना: आकाश नामक युवक की न्यायिक हिरासत के दौरान कथित तौर पर पुलिस प्रताड़ना से मौत हो गई थी।
  • मांग: याचिका में दोषी पुलिसकर्मियों की SC/ST एक्ट के तहत गिरफ्तारी और निष्पक्ष जांच के लिए स्थानीय अधिकारियों के तबादले की मांग की गई थी।
  • वर्तमान स्थिति: सरकार ने कोर्ट को बताया कि FIR में पहले ही SC/ST एक्ट की धाराएं जोड़ी जा चुकी हैं और एक DSP स्तर के अधिकारी जांच की निगरानी कर रहे हैं।

कोर्ट के मुख्य निर्देश (Key Observations)

  • कानूनी प्रक्रिया: जब एक मामला पहले से ही कोर्ट की निगरानी में है, तो उसी विषय पर दूसरी जनहित याचिका (PIL) स्वीकार करने का कोई आधार नहीं बनता।
  • परिवार की जिम्मेदारी: कोर्ट ने कहा कि अब यह परिवार और संबंधित लोगों पर है कि वे कानूनी प्रक्रियाओं का सम्मान करते हुए मृतक का सम्मानजनक अंतिम संस्कार करें।

निष्कर्ष: कानून और मानवीय संवेदना

यह फैसला एक नजीर पेश करता है कि न्याय की मांग करते समय मृतक की गरिमा से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। शव को विरोध का जरिया बनाना न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का भी अपमान है।

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