Marital Dispute: दिल्ली की एक सेशंस कोर्ट ने घरेलू हिंसा और वैवाहिक दुष्कर्म (Marital Rape) के एक मामले में पति की दोषमुक्ति (Acquittal) को बरकरार रखा है।
एडिशनल सेशंस जज पुरुषोत्तम पाठक ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका (Revision Petition) को खारिज कर दिया, जिसमें पति (करण) को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया था। कोर्ट ने महिला द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोपों को “अस्पष्ट और सामान्य” पाया, साथ ही यह भी नोट किया कि बलात्कार के आरोप महिला द्वारा ही दूसरे मामले में दिए गए बयानों के बिल्कुल विपरीत थे।
कोर्ट का मुख्य निष्कर्ष: खुद के बयानों में ही उलझी शिकायतकर्ता
- अदालत ने पाया कि महिला ने अलग-अलग मौकों पर परस्पर विरोधी बातें कहीं।
- सहमति का सवाल: एक घरेलू हिंसा के मामले (जो 2022 में खारिज हो गया था) में महिला ने जिरह के दौरान कहा था, “करण ने कभी भी मेरी सहमति के बिना मेरे साथ जबरन यौन संबंध बनाने की कोशिश नहीं की।”
- बदला हुआ बयान: हालांकि, वर्तमान मामले में उसने आरोप लगाया कि पति ने “सामान्य से अधिक बल” का प्रयोग किया, लेकिन यह नहीं कहा कि यह “बिना सहमति” के था। कोर्ट ने इन आरोपों को “प्रेरित” (Motivated) और “बाद में गढ़ा हुआ” (Afterthought) माना।
धारा 377 और वैवाहिक संबंध
- कोर्ट ने अप्राकृतिक यौन अपराधों (धारा 377 IPC) के संबंध में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के 2024 के एक फैसले का हवाला दिया।
- कानूनी स्थिति: कोर्ट ने सहमति व्यक्त की कि वैवाहिक संबंधों के भीतर धारा 377 के तहत अपराध नहीं बनता है।
- तथ्यों की कमी: महिला के बयानों में विरोधाभास होने के कारण इस धारा के तहत आरोप तय नहीं किए जा सकते।
धारा 498A (क्रूरता) और 406 (अमानत में खयानत)
- कोर्ट ने अन्य आरोपों को भी आधारहीन पाया।
- अस्पष्ट आरोप: धारा 498A के तहत लगाए गए मारपीट और एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के आरोपों में किसी विशिष्ट तारीख, समय या स्थान का जिक्र नहीं था। कोर्ट ने इन्हें “यांत्रिक” (Mechanical) और “अस्पष्ट” माना।
- स्त्रीधन (Stridhan) का मामला: धारा 406 के तहत गहने या नकदी हड़पने के आरोपों पर कोर्ट ने कहा कि महिला यह साबित करने में विफल रही कि उसने कब और कितना सामान पति को सौंपा था। न तो गहनों का वजन बताया गया और न ही नकदी की सही मात्रा।
Summary of Allegations vs. Court’s Observation
Section (IPC) Allegation Court’s Observation
377 Unnatural Sex Contradicted by complainant’s own prior statements. 498A Cruelty/Harrassment Vague allegations; no specific date or time provided.
406 Misappropriation of Stridhan No proof of entrustment.
मजिस्ट्रेट कोर्ट का फैसला सही
सेशंस कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 4 नवंबर, 2023 को मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा पति को डिस्चार्ज करने का आदेश पूरी तरह कानूनी है और इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने नोट किया कि शुरुआती FIR में घरेलू क्रूरता का कोई जिक्र नहीं था, जिसे बाद में जोड़ा गया।
निष्कर्ष: झूठे आरोपों के खिलाफ कड़ा संदेश
यह फैसला उन मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर है जहाँ वैवाहिक विवादों के दौरान एक पक्ष द्वारा दूसरे पर गंभीर आपराधिक आरोप लगाए जाते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि बिना ठोस सबूतों और सुसंगत बयानों के, केवल सामान्य आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।

