Justice for Minors: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी नाबालिग (Minor) कानूनी वारिस को सुनवाई के अवसर से वंचित करना न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
दीपेश माहेश्वरी बनाम रेनू माहेश्वरी मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों और हाई कोर्ट के फैसलों को पलट दिया। कोर्ट ने माना कि कानूनी प्रक्रियाओं में नाबालिगों के अधिकारों की रक्षा के लिए ‘गार्जियन’ (अभिभावक) की नियुक्ति अनिवार्य है। कोर्ट ने एक नाबालिग वारिस को प्रतिनिधित्व न मिलने के आधार पर उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) देने वाले एकतरफा (Ex-parte) आदेश को रद्द कर दिया है।
मामला क्या था? (The Dispute over Retiral Benefits)
- विवाद: मामला बिजली कंपनी में लाइनमैन रहे स्वर्गीय ओमप्रकाश माहेश्वरी के रिटायरमेंट लाभों (Retiral Benefits) के बंटवारे से जुड़ा था।
- दावा: उनकी बेटियों ने ट्रायल कोर्ट में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया। इस दौरान एक अन्य पक्ष ने आपत्ति जताई, लेकिन कोर्ट ने एकतरफा आदेश (Ex-parte) जारी कर बेटियों को प्रमाण पत्र दे दिया।
- अपील: नाबालिग अपीलकर्ता (जो उस समय करीब 12 वर्ष का था) की ओर से इस आदेश को चुनौती दी गई, जिसे हाई कोर्ट ने भी खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ: “प्रक्रियात्मक चूक”
- सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पाया कि इस मामले में गंभीर कानूनी खामियां थीं।
- अभिभावक की कमी: जब कार्यवाही शुरू हुई, अपीलकर्ता नाबालिग था। नियम के अनुसार उसके हितों की रक्षा के लिए कोर्ट को एक गार्जियन (Guardian) नियुक्त करना चाहिए था, जो नहीं किया गया।
- सार्वजनिक नोटिस का तर्क गलत: निचली अदालत का यह कहना कि ‘नाबालिग सार्वजनिक नोटिस का जवाब दे सकता था’, पूरी तरह गलत है। एक 12 साल का बच्चा कानूनी नोटिस को समझने या स्वतंत्र रूप से कार्य करने की स्थिति में नहीं होता।
- जानकारी छिपाना: प्रतिवादियों को नाबालिग के अस्तित्व के बारे में पता था, फिर भी उन्होंने यह सुनिश्चित नहीं किया कि उसे प्रतिनिधित्व मिले।
Order IX Rule 13 CPC का महत्व
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘ऑर्डर 9 रूल 13’ के तहत किसी भी एकतरफा आदेश को रद्द किया जा सकता है, यदि पक्षकार को उचित सूचना (Summons) न मिली हो। उसके पास अदालत में पेश न होने का कोई ‘ठोस कारण’ (Sufficient Cause) हो।
- कोर्ट का स्टैंड: नाबालिग होना और कानूनी संरक्षक का न होना अपने आप में ‘ठोस कारण’ है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
- आदेश रद्द: हाई कोर्ट के फैसले को सेट-साइड (Set aside) कर दिया गया और एकतरफा उत्तराधिकार प्रमाण पत्र को क्वैश (Quash) कर दिया गया।
- मामला बहाल: केस को दोबारा सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट को भेज दिया गया है।
- समय सीमा: ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि सभी पक्षों को सुनने के बाद एक वर्ष के भीतर इस मामले पर नया फैसला लिया जाए।
निष्कर्ष: नाबालिगों के कानूनी ढाल की मजबूती
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन हजारों बच्चों के लिए नजीर है जिनके हक अक्सर अदालती प्रक्रियाओं की जटिलताओं में दब जाते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘उचित प्रक्रिया’ (Fair Procedure) केवल कागजों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना कोर्ट की जिम्मेदारी है कि समाज का हर कमजोर वर्ग, विशेषकर बच्चे, अपनी बात रख सकें।
IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL APPELLATE JURISDICTION
CIVIL APPEAL NO…………………………OF 2026
(@ Special Leave Petition (Civil)No.11006 of 2021)
SANJAY KAROL, J. AUGUSTINE GEORGE MASIH, J.
DEEPESH MAHESWARI AND ANR.
VERSUS RENU MAHESWARI AND ORS

