Friday, October 16, 2026
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Mother’s Rights: बेटी की पढ़ाई के लिए मां बेच सकती है संपत्ति…विधवा मां के पक्ष में दिए फैसले को ध्यान से पढ़ें

Mother’s Rights: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए विधवा मां को उसकी नाबालिग बेटी की संयुक्त परिवार की संपत्ति (Joint Family Property) में हिस्सा बेचने की अनुमति दे दी है।

श्रीमती डोली बनाम श्रीमती शकुंतला देवी’ मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि एक मां, अपने पति की मृत्यु के बाद स्वाभाविक संरक्षक (Natural Guardian) होती है और उसे बच्चे के भविष्य के लिए संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों की शिक्षा और कल्याण के लिए लिया गया ऐसा निर्णय पूरी तरह कानूनी और न्यायसंगत है।

मामला क्या था? (Education vs. Property Lock)

  • पृष्ठभूमि: मुजफ्फरनगर की रहने वाली विधवा डोली ने अपनी नाबालिग बेटी वंशिका की उच्च शिक्षा (12वीं के बाद) के लिए धन जुटाने हेतु संयुक्त परिवार की संपत्ति में बेटी का 1/4 हिस्सा बेचने की अनुमति मांगी थी।
  • निचली अदालत का रुख: मुजफ्फरनगर की कोर्ट ने डोली को संरक्षक तो मान लिया, लेकिन संपत्ति बेचने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुँचा।
  • पारिवारिक समर्थन: दिलचस्प बात यह है कि बच्ची की दादी (जो मामले में प्रतिवादी थीं) को भी इस बिक्री पर कोई आपत्ति नहीं थी।

कोर्ट का कानूनी तर्क: “हिंदू कानून का तालमेल”

  • हाई कोर्ट ने हिंदू नाबालिग और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धाराओं का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित बिंदु रखे।
  • धारा 12 का महत्व: यदि नाबालिग का हिस्सा संयुक्त परिवार की संपत्ति में है और उसका प्रबंधन परिवार का कोई वयस्क सदस्य (चाहे वह पुरुष हो या महिला) कर रहा है, तो उस हिस्से के लिए अलग से कानूनी संरक्षक नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं है।
  • धारा 8 की सीमाएं: कोर्ट ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि धारा 8 के तहत संपत्ति बेचने पर लगी पाबंदियां संयुक्त परिवार की ‘अविभाजित संपत्ति’ (Undivided Share) पर कड़ाई से लागू नहीं होतीं।

बच्चे का कल्याण सर्वोपरि (Paramount Consideration)

  • जस्टिस की बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि कानून का उद्देश्य नाबालिग के हितों की रक्षा करना है, न कि उसके भविष्य के रास्ते में बाधा डालना है।
  • शिक्षा के लिए निवेश: मां अपनी बेटी की पढ़ाई के लिए संपत्ति बेचना चाहती थी, जो सीधे तौर पर बच्ची के कल्याण (Welfare) से जुड़ा है।
  • स्वाभाविक संरक्षक: पिता की मृत्यु के बाद मां ही बच्ची की प्राकृतिक संरक्षक है और वह संपत्ति का प्रबंधन करने के लिए सक्षम है।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

    • अदालत ने 17 जुलाई, 2025 के मुजफ्फरनगर कोर्ट के आदेश को ‘कानून की नजर में अस्थिर’ बताते हुए रद्द कर दिया।
    • पूर्ण अनुमति: मां को अपनी नाबालिग बेटी का हिस्सा बेचने की पूरी अनुमति दी गई है।
    • उद्देश्य: यह सुनिश्चित किया जाए कि प्राप्त राशि का उपयोग केवल बेटी की शैक्षिक आवश्यकताओं के लिए ही हो।

    निष्कर्ष: सामाजिक और कानूनी बदलाव

    यह फैसला महिलाओं को संयुक्त परिवार की संपत्ति के प्रबंधन में बराबरी का अधिकार देने की दिशा में एक बड़ा कदम है। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि ‘अविभाजित हिस्से’ को बेचने के लिए हर बार अदालती अनुमति की औपचारिकता जरूरी नहीं है, यदि उद्देश्य नेक और बच्चे के हित में हो।

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