FIR Delay Victory: सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया (Criminal Procedure) के एक बेहद महत्वपूर्ण नियम को स्पष्ट करते हुए रोमा आहूजा बनाम राज्य मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एन.वी. अंजारिया और प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति ने समय रहते पुलिस या मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज करा दी है, तो वह केस केवल इसलिए रद्द नहीं किया जा सकता क्योंकि कोर्ट ने उस पर विचार (Cognizance) करने में देरी कर दी। कोर्ट ने साफ किया है कि किसी केस में ‘समय सीमा’ (Limitation) की गणना शिकायत दर्ज करने की तारीख से होगी, न कि उस तारीख से जब जज उस पर संज्ञान (Cognizance) लेते हैं।
क्या था कानूनी विवाद? (The Legal Puzzle)
- मामला: मई 2011 में दिल्ली की एक अदालत के बाहर मारपीट हुई थी। रोमा आहूजा ने एक वकील के खिलाफ मारपीट (Section 323) और गलत तरीके से रोकने (Section 341) की FIR दर्ज कराई थी।
- दिक्कत: इन अपराधों के लिए कानून में 1 साल की समय सीमा तय है। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल करने में 1 साल से ज्यादा का समय लगा दिया।
- हाई कोर्ट का फैसला: दिल्ली हाई कोर्ट ने 2025 में इस आधार पर केस रद्द कर दिया कि चार्जशीट देरी से आई और कोर्ट ने तय समय के बाद संज्ञान लिया।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: शिकायत की तारीख ही असली (Filing Date is Key)
- सुप्रीम कोर्ट ने सराह मैथ्यू (2014) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया।
- शिकायतकर्ता का अधिकार: एक बार जब नागरिक ने अपनी शिकायत दर्ज कर दी, तो उसकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है।
-कोर्ट की देरी: संज्ञान लेना (Taking Cognizance) अदालत का काम है। कोर्ट की फाइलों के बोझ या प्रशासनिक देरी के कारण किसी पीड़ित का न्याय पाने का अधिकार नहीं छीना जा सकता। - अटल सिद्धांत: कानून का एक पुराना सिद्धांत है—”अदालत के किसी कृत्य से किसी पक्ष को नुकसान नहीं होना चाहिए।”
लिमिटेशन (Section 468 CrPC) के नियम
कोर्ट ने समझाया कि अपराध की गंभीरता के हिसाब से शिकायत दर्ज करने की समय सीमा अलग-अलग होती है। यह समय सीमा केवल शिकायत शुरू करने के लिए है, न कि केस खत्म करने या जज के संज्ञान लेने के लिए।
- सिर्फ जुर्माना: 6 महीने की समय सीमा।
- 1 साल तक की सजा: 1 साल की समय सीमा।
- 1 से 3 साल तक की सजा: 3 साल की समय सीमा।
फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| मुख्य सवाल | क्या चार्जशीट की देरी से केस खत्म हो जाएगा? |
| सुप्रीम कोर्ट का जवाब | नहीं, अगर FIR समय पर है तो केस चलेगा। |
| संवैधानिक बेंच का असर | साराह मैथ्यू केस का नियम अब सभी अदालतों पर बाध्यकारी है। |
| नतीजा | रोमा आहूजा का केस बहाल (Restore) कर दिया गया। |
न्याय के द्वार हमेशा खुले हैं
यह फैसला उन हजारों पीड़ितों के लिए सुरक्षा कवच है जिनके मामले पुलिस या कोर्ट की धीमी प्रक्रिया के कारण अधर में लटके रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायपालिका की अपनी देरी का बोझ आम नागरिक के कंधों पर नहीं डाला जा सकता।
IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CORAM: PRASHANT KUMAR MISHRA J., N.V. ANJARIA J.
CRIMINAL APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL APPEAL NOS. 1831-1832 OF 2026
(Arising out of SLP (Crl.) Nos.9971-9972 of 2025)
ROMA AHUJA
VERSUS
THE STATE AND ANOTHER

