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Digital Justice: ₹7,210 करोड़ की ई-कोर्ट फेज III परियोजना लॉन्च…अब तकनीक न्याय का संवैधानिक साधन है

Digital Justice: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने नई दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान ई-कोर्ट परियोजना के चरण III (Phase III of the e-Courts Project) का औपचारिक शुभारंभ किया।

न्यायिक डिजिटल परिवर्तन पर आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि ई-कोर्ट फेज III केवल अदालतों का कंप्यूटरीकरण नहीं है, बल्कि यह न्याय वितरण प्रणाली को जड़ से बदलने (Reimagining) की कोशिश है। ₹7,210 करोड़ के भारी-भरकम बजट वाली यह परियोजना भारतीय न्यायपालिका को पूरी तरह से डिजिटल और नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

फेज III का मुख्य उद्देश्य (The Shift)

  • CJI के अनुसार, अब सवाल यह नहीं है कि अदालतें डिजिटल हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या सिस्टम नागरिकों की बेहतर सेवा कर रहा है।
  • अंतिम मील तक पहुँच (Last-mile connectivity): ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में न्याय पहुँचाना।
  • बाधाओं को खत्म करना: भौगोलिक और आर्थिक स्थिति न्याय के रास्ते में रुकावट नहीं बननी चाहिए।
  • ई-सेवा केंद्र (eSewa Kendras): इन केंद्रों का विस्तार किया जाएगा ताकि वे लोग भी डिजिटल सेवाओं का लाभ ले सकें जो तकनीक के मामले में साक्षर नहीं हैं।

फेज III के तहत लॉन्च की गई प्रमुख डिजिटल पहलें

  • Single Sign-On (SSO): सभी न्यायिक प्लेटफार्मों तक पहुँचने के लिए एक एकीकृत पोर्टल।
  • eCourts-ePrisons एकीकरण: अदालतों और जेलों के सिस्टम को आपस में जोड़ना ताकि सूचनाओं का आदान-प्रदान तेज हो।
  • इलेक्ट्रॉनिक समन: अब ईमेल के माध्यम से अदालती समन की डिलीवरी की जा सकेगी।
  • eCourts App 4.0: मोबाइल ऐप का नया वर्जन लॉन्च किया गया ताकि वकील और वादी आसानी से केस स्टेटस देख सकें।

ई-कोर्ट्स का अब तक का सफर (Journey from 2005)

  • CJI ने 2005 से शुरू हुए सफर को याद करते हुए चरणों का विवरण दिया।
  • फेज I और II: बुनियादी ढांचे के निर्माण पर ध्यान केंद्रित था—अदालतों का कंप्यूटरीकरण, नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) का निर्माण, और ‘विधिक अनुवाद’ सॉफ्टवेयर का विकास।
  • फेज III: यह बुनियादी ढांचे से आगे बढ़कर “सिस्टम ट्रांसफॉर्मेशन” की ओर एक कदम है।

तकनीक: एक “संवैधानिक उपकरण”

CJI ने तकनीक को केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि एक “संवैधानिक साधन” (Constitutional Instrument) बताया। यह कानून के समक्ष समानता (Equality before law) को मजबूत करती है। यह प्रक्रियात्मक कठोरता (Procedural rigidities) को खत्म कर न्याय को सुलभ बनाती है।

सुलभ न्याय की नई सुबह

ई-कोर्ट फेज III के साथ, भारतीय न्यायपालिका ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि न्याय की गुणवत्ता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितने मामले निपटाए गए, बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि आम नागरिक को न्याय पाने में कितनी आसानी हुई। तकनीक अब न्यायपालिका की ताकत बन चुकी है, जो भौगोलिक दूरियों को मिटाकर अदालत को हर नागरिक के दरवाजे तक ले जाने का प्रयास कर रही है।

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