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Maintenance Rights: कान खोलकर सुन लीजिए! पत्नी का गुजारा भत्ता मांगने का हक अनंत काल तक रहेगा…भविष्य में मेंटेनेंस न मांगने का समझौता अवैध

Maintenance Rights: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने महिलाओं के भरण-पोषण (Maintenance) के अधिकार पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल की बेंच ने होशियारपुर के एक पति की पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि पत्नी द्वारा भविष्य के भरण-पोषण के अधिकार को छोड़ना सार्वजनिक नीति (Public Policy) के खिलाफ है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी आपसी समझौता या ‘लंप-सम’ (Lump sum) राशि का भुगतान किसी महिला को भविष्य में भरण-पोषण मांगने से नहीं रोक सकता, क्योंकि यह अधिकार एक संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा है।

मामला क्या था? (The Dispute)

  • पति का तर्क: पति ने दावा किया कि उसने अपनी पत्नी को एक पुराने समझौते के तहत ₹60,000 की एकमुश्त राशि दी थी। इसके बदले पत्नी ने भविष्य में कभी भी मेंटेनेंस न मांगने का वादा (Waive) किया था।
  • पति का दूसरा तर्क: उसने कहा कि पत्नी एक सक्षम महिला है और एक ‘निजी मेड’ के रूप में काम कर रही है, इसलिए वह अपना गुजारा खुद कर सकती है। साथ ही उसने खुद को एक दिहाड़ी मजदूर बताते हुए अपनी आय केवल ₹10,000 बताई।

कोर्ट का फैसला: बैठकर भूखे मरने की उम्मीद नहीं की जा सकती

  • अदालत ने पति के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया और कई महत्वपूर्ण बातें कहीं।
  • जीवित रहने का संघर्ष: कोर्ट ने कहा कि यदि पति गुजारा भत्ता नहीं दे रहा है और पत्नी जीवित रहने के लिए शारीरिक श्रम (मेहनत-मजदूरी) कर रही है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है। पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अदालत के आदेश तक बैठकर भूखी मरती रहे।
  • समझौते की वैधता: सुप्रीम कोर्ट के ‘बाई ताहिरा (1978)’ केस का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई भी समझौता जिसमें पत्नी भविष्य का मेंटेनेंस छोड़ने की बात कहती है, कानूनी रूप से मान्य नहीं है। यह अधिकार एक वैधानिक अधिकार (Statutory Right) है जिसे किसी समझौते से छीना नहीं जा सकता।

आय का निर्धारण और महंगाई का असर

  • पति की योग्यता: कोर्ट ने पाया कि पति 12वीं पास और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा धारक है। वह एक ‘कुशल कारीगर’ (Skilled Mason) है।
  • आय का अनुमान: फैमिली कोर्ट द्वारा पति की आय ₹20,000 प्रति माह मानना उचित है, क्योंकि राज्य द्वारा कुशल श्रमिकों के लिए अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी इसी के आसपास है।
  • मेंटेनेंस राशि: बढ़ती महंगाई और जीवन यापन की लागत को देखते हुए ₹6,000 मासिक भत्ता पूरी तरह से जायज है।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुहाई कोर्ट का निष्कर्ष
₹60,000 का भुगतानयह राशि जीवन भर के लिए पर्याप्त नहीं है; यह मेंटेनेंस के दावे को खत्म नहीं करती।
कामकाजी पत्नीमेहनत-मजदूरी करके पेट पालना ‘आत्मनिर्भर’ होना नहीं कहलाता; हक बरकरार रहेगा।
पब्लिक पॉलिसीमेंटेनेंस छोड़ने का समझौता कानून की नजर में शून्य (Void) है।
नतीजापति की याचिका खारिज; ₹6,000 प्रति माह देने का आदेश बरकरार।

सामाजिक सुरक्षा का कवच

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि धारा 125 CrPC का मुख्य उद्देश्य—महिलाओं और बच्चों को बेसहारा होने से बचाना—किसी भी निजी समझौते की भेंट न चढ़े। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पति की यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अपनी पत्नी को भोजन, कपड़े, आश्रय और चिकित्सा उपचार के लिए पर्याप्त सहायता प्रदान करे, चाहे पहले कोई भी समझौता क्यों न हुआ हो।

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