Tuesday, September 8, 2026
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Rights of Arrestee: पूछताछ के नाम पर हिरासत गैरकानूनी है…कागजी कार्रवाई नहीं, रोक-टोक का पहला पल ही गिरफ्तारी, इसको समझें

Rights of Arrestee: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) के संरक्षण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस सुमीत गोयल ने नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) द्वारा हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति को रिहा करने का आदेश देते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने पाया कि आरोपी को 24 घंटे की संवैधानिक सीमा से अधिक समय तक बिना न्यायिक अनुमति के हिरासत में रखा गया था। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पुलिस या जांच एजेंसियों द्वारा तैयार किया गया ‘अरेस्ट मेमो’ (Arrest Memo) गिरफ्तारी के समय का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। असली पैमाना वह क्षण है जब किसी व्यक्ति की आजादी को ‘भौतिक’ रूप से रोका गया।

गिरफ्तारी का असली मतलब: जब आजादी खत्म, तब अरेस्ट शुरू

  • अदालत ने ‘गिरफ्तारी’ (Arrest) को परिभाषित किया।
  • अधिकारों की घड़ी: जिस क्षण पुलिस या जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को जाने से रोक देती है, उसी क्षण से गिरफ्तारी शुरू मानी जाती है।
  • अम्बुलेटरी प्रोविडेंस: जैसे ही किसी व्यक्ति की अपनी मर्जी से चलने-फिरने की शक्ति (Volition) सरकारी ताकत के अधीन हो जाती है, वह ‘हिरासत’ में माना जाएगा।
  • लेबल का खेल खत्म: कोर्ट ने “पूछताछ के लिए हिरासत” या “पूछताछ के लिए बुलाना” जैसे शब्दों को कानूनी रूप से निरर्थक बताया, यदि वास्तव में व्यक्ति की आजादी छीन ली गई हो।

अरेस्ट मेमो बनाम हकीकत (Paperwork is not Final)

  • जस्टिस गोयल ने जांच एजेंसियों के ‘डॉक्यूमेंट्री खेल’ पर कड़ी टिप्पणी की।
  • प्रक्रियात्मक औपचारिकता: अरेस्ट मेमो में दर्ज समय केवल एक प्रक्रिया है। इसे गिरफ्तारी के वास्तविक समय का अचूक सूचकांक (Infallible Index) नहीं माना जा सकता।
  • मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी: कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट का यह पवित्र कर्तव्य है कि वह कागजों के ‘पर्दे’ को हटाकर (Piercing the veil) यह देखे कि वास्तव में गिरफ्तारी कब हुई थी।

घड़ी’ कब शुरू होती है? (Section 57 CrPC / 58 BNSS)

  • संविधान और कानून (CrPC की धारा 57 या BNSS की धारा 58) के अनुसार, किसी व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
  • HC का निर्देश: यह 24 घंटे की अवधि उस क्षण से गिनी जाएगी जब व्यक्ति को भौतिक रूप से रोका गया, न कि उस समय से जब पुलिस ने कागजों पर ‘औपचारिक गिरफ्तारी’ दिखाई।
  • निर्णायक कारक: क्या व्यक्ति को रातभर थाने में रखा गया? क्या उसे अपना खाना खुद लाने की आजादी थी? क्या वह अपनी मर्जी से बाहर जा सकता था? इन तथ्यों से गिरफ्तारी का समय तय होगा।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मामलाNCB द्वारा ट्रामाडोल टैबलेट की जब्ती से जुड़ी जांच।
वास्तविक हिरासत31 अक्टूबर 2025, रात 11 बजे से।
कागजी गिरफ्तारी1 नवंबर 2025, रात 9 बजे (लगभग 22 घंटे बाद)।
कोर्ट का आदेशहिरासत को गैरकानूनी घोषित किया और आरोपी को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।

कागजी बहानेबाजी पर रोक

यह फैसला जांच एजेंसियों द्वारा की जाने वाली उस आम प्रैक्टिस पर लगाम लगाता है, जिसमें किसी व्यक्ति को ‘पूछताछ’ के बहाने दो-तीन दिनों तक बिठाए रखा जाता है और गिरफ्तारी तब दिखाई जाती है जब उसे कोर्ट ले जाने की तैयारी हो। हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि “स्वतंत्रता की घड़ी” पुलिस की कलम से नहीं, बल्कि नागरिक की आजादी छिनने के पहले पल से चलती है।

IN THE HIGH COURT OF PUNJAB AND HARYANA AT
HON’BLE MR. JUSTICE SUMEET GOEL
CRM-M-2979-2026(O&M)
Anuj Kumar Singh Versus Union of India

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