Economic Abuse: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में ‘आर्थिक शोषण’ (Economic Abuse) पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
फैमिली कोर्ट में लंबित मेंटेनेंस केस निपटारे की मांग
हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने पति की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने फैमिली कोर्ट में लंबित अपने ‘मेंटेनेंस’ केस के जल्द निपटारे की मांग की थी। कोर्ट ने न केवल उसकी याचिका खारिज की, बल्कि उस पर भारी जुर्माना भी लगाया। ते हुए पति को अपनी पत्नी को ₹15 लाख का हर्जाना (Compensatory Cost) देने का आदेश दिया है। अदालत ने पाया कि पति ने धोखे से पत्नी के वेतन खाते पर कर्ज (Loan) लिया और उस रकम को अपने निजी खाते में ट्रांसफर कर लिया।
आर्थिक शोषण की खौफनाक कहानी (The Economic Abuse)
- कर्ज का जाल: पति के दबाव में आकर पत्नी (जो हाई कोर्ट में एडिशनल प्राइवेट सेक्रेटरी हैं) ने ₹13.56 लाख का पर्सनल लोन लिया।
- धोखाधड़ी: पति ने पत्नी की जानकारी के बिना लगभग पूरी लोन राशि अपने निजी खाते में ट्रांसफर कर ली। वादा जमीन खरीदने का था, जो कभी पूरी नहीं हुई।
- वित्तीय बोझ: पत्नी आज भी हर महीने ₹26,020 की ईएमआई (EMI) भर रही है, जबकि पैसा पति के पास है।
कोर्ट से तथ्य छिपाना (Concealment of Facts)
- अदालत पति के आचरण से बेहद नाराज दिखी क्योंकि उसने कई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए थे।
- दोहरा लाभ: पति ने यह नहीं बताया कि एक फैमिली कोर्ट पहले ही पत्नी को उसे ₹5,000 मासिक अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दे चुका है।
- स्टे ऑर्डर: उसने यह भी छिपाया कि हाई कोर्ट की एक अन्य बेंच ने उसके मेंटेनेंस केस की कार्यवाही पर पहले ही रोक (Stay) लगा दी है।
हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां (Key Judicial Observations)
- अदालत ने ‘वैवाहिक शोषण’ को परिभाषित किया।
- संकीर्ण सोच से बाहर निकलना: कोर्ट ने कहा कि शादी के भीतर आर्थिक शोषण बहुत सूक्ष्म तरीके से काम करता है— जैसे आय पर नियंत्रण और संपत्ति का जबरन अधिग्रहण। ऐसे में केवल कानूनी खर्च दिलाना पर्याप्त नहीं है।
- पुनर्स्थापन (Restitution): हर्जाना ऐसा होना चाहिए जो पत्नी के हुए वित्तीय नुकसान की भरपाई कर सके और संतुलन वापस ला सके।
- कल्याणकारी राज्य: कानून को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विवाह संस्था का उपयोग शोषण के उपकरण के रूप में न किया जाए।
कोर्ट के कड़े निर्देश (Directions of the Court)
| निर्देश | विवरण |
| हर्जाना | पति को 6 सप्ताह के भीतर पत्नी को ₹15 लाख का डिमांड ड्राफ्ट देना होगा। |
| वसूली | भुगतान न करने पर इटावा के जिलाधिकारी (DM) इसे भू-राजस्व (Land Revenue) की तरह वसूल करेंगे। |
| संपत्ति की जांच | पति की चल और अचल संपत्तियों की गहन जांच (Inquiry) के आदेश। |
| फर्जी हलफनामा | गलत जानकारी देने के लिए पति के खिलाफ प्रयागराज फैमिली कोर्ट में उचित कार्यवाही शुरू की जाए। |
मुकदमेबाजी की स्थिति
- पति: स्टेट बार काउंसिल में वकील के रूप में नामांकित है, लेकिन दावा किया कि उसकी कोई नियमित आय नहीं है।
- पत्नी: हाई कोर्ट में कार्यरत हैं। कोर्ट ने उनके द्वारा दायर तलाक के मामले और मेंटेनेंस आदेश के खिलाफ उनकी रिव्यू याचिका को जल्द निपटाने का निर्देश दिया है।
पतियों के लिए एक बड़ी चेतावनी
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उन पतियों के लिए एक नजीर है जो खुद को ‘बेरोजगार’ या ‘असहाय’ दिखाकर कामकाजी पत्नियों की आय पर निर्भर रहना चाहते हैं और साथ ही उनके संसाधनों का दुरुपयोग करते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि ‘इक्विटी’ (Equity) की मांग करने वाले व्यक्ति को साफ हाथों के साथ कोर्ट आना चाहिए। यदि कोई तथ्यों को छिपाता है और पत्नी का आर्थिक शोषण करता है, तो कानून उसे कतई बर्दाश्त नहीं करेगा।

