Tuesday, October 27, 2026
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Police Misconduct: ये पुलिस है या रक्षक?… SDOP ने पद का दुरुपयोग कर आरोपी को पहुंचाया फायदा; HC ने लगाई कड़ी फटकार

Police Misconduct: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर “स्तब्ध” करने वाली टिप्पणी करते हुए नर्मदापुरम पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है।

हाई कोर्ट के जस्टिस जी. एस. अहलुवालिया की बेंच ने एक बलात्कार मामले के आरोपी की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसने इटारसी के SDOP द्वारा तैयार की गई एक ‘समांतर जांच रिपोर्ट’ के आधार पर राहत मांगी थी। अदालत ने बलात्कार जैसे गंभीर अपराध में आरोपी को बचाने के लिए की गई ‘समांतर जांच’ (Parallel Enquiry) को अवैध और कानून की अज्ञानता का नमूना करार दिया।

मामला क्या था? (The Parallel Loophole)

  • पृष्ठभूमि: आरोपी के पिता ने SP को आवेदन दिया था, जिसके बाद SP ने मुख्य जांच लंबित होने के बावजूद एक समांतर जांच के आदेश दे दिए।
  • रिपोर्ट: SDOP इटारसी ने 3 मार्च को एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें दावा किया गया कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप गलत हैं।
  • अदालत का सवाल: हाई कोर्ट ने पूछा कि जब मुख्य जांच चल रही हो, तो ऐसी ‘पैरेलल इंक्वायरी’ किस कानून के तहत की गई?

पीड़िता के पीछे उसकी आलोचना कैसे कर सकते हैं?

  • अदालत ने SDOP की जांच के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए।
  • एकतरफा कार्रवाई: अधिकारी ने पीड़िता का बयान दर्ज किए बिना ही उसे झूठा करार दे दिया।
  • न्याय का सिद्धांत: कोर्ट ने पूछा, कोई अधिकारी किसी व्यक्ति की पीठ पीछे उसकी आलोचना कैसे कर सकता है? उसे निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पीड़िता को अपना पक्ष रखने का मौका देना चाहिए था।
  • कानूनी स्थिति: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच लंबित रहने के दौरान CrPC/BNSS की धारा 36 के तहत समांतर जांच का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की मिसाल (Legal Precedents)

  • हाई कोर्ट ने अपने फैसले को पुख्ता करने के लिए पुराने निर्णयों का हवाला दिया।
  • प्रीतम वर्मा बनाम MP राज्य (2018): इसमें तय हुआ था कि समांतर जांच मान्य नहीं है।
  • सुरेंद्र सिंह गौर बनाम MP राज्य (2022): इस सिद्धांत पर सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगाई थी।
  • कोर्ट का आदेश: अदालत ने निर्देश दिया कि इस समांतर जांच रिपोर्ट को ट्रायल कोर्ट द्वारा किसी भी उद्देश्य के लिए कभी भी विचार में नहीं लिया जाएगा।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
अदालतमध्य प्रदेश हाई कोर्ट (जबलपुर)।
मुख्य विवादरेप केस में पुलिस द्वारा की गई ‘पैरेलल इंक्वायरी’।
दोषी अधिकारीSP (जांच का आदेश देने के लिए) और SDOP (फर्जी रिपोर्ट के लिए)।
अदालती टिप्पणी“यह चौंकाने वाला है कि वरिष्ठ पदों का उपयोग आरोपियों को फायदा पहुँचाने के लिए किया जा रहा है।”
परिणामसमांतर जांच रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज (Discard) कर दिया गया।

जांच में पारदर्शिता जरूरी

यह फैसला पुलिस के उस रवैये पर कड़ा प्रहार है जहाँ रसूखदार आरोपियों को बचाने के लिए मुख्य जांच के बगल में एक और ‘अनौपचारिक’ जांच खड़ी कर दी जाती है। हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पुलिस अधिकारियों को कानून की बुनियादी जानकारी होनी चाहिए और वे किसी पीड़िता के संवैधानिक अधिकारों के साथ इस तरह खिलवाड़ नहीं कर सकते।

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