Wednesday, June 17, 2026
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POCSO Case Quashed: बदले की भावना से दर्ज केस नहीं चलेगा…पुजारी को दी राहत; कहा-बिना सबूत के 5 साल की देरी गलत, जरूर पढ़ें

POCSO Case Quashed: कर्नाटक हाई कोर्ट जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक मठ के पुजारी के खिलाफ दर्ज POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) मामले को रद्द कर दिया है।

कोर्ट ने माना कि शिकायत दर्ज करने में हुई 5 साल की देरी और उसका “अस्पष्ट स्पष्टीकरण” पूरी कानूनी कार्यवाही को दूषित (Vitiate) करता है। यह मामला एक नाबालिग लड़की से जुड़ा है, जिसके परिवार ने 2017 में स्वास्थ्य समस्याओं के लिए पुजारी से संपर्क किया था। आरोप था कि पुजारी ने 2017 से 2019 के बीच उसका यौन उत्पीड़न किया, लेकिन शिकायत 2024 में दर्ज कराई गई।

मामले की पृष्ठभूमि: 2017 की घटना, 2024 में केस

  • आरोप: पीड़िता का दावा था कि जब वह 14 साल की थी, तब इलाज के बहाने पुजारी ने उसे अकेले ले जाकर उसका उत्पीड़न किया। यह सिलसिला 2019 तक चला।
  • देरी का गणित: कोर्ट ने नोट किया कि पहली घटना 2017 की है और आखिरी 2019 की। इसके बाद 5 साल तक कोई शिकायत नहीं की गई और मार्च 2024 में अचानक FIR दर्ज कराई गई।
  • पुजारी का पक्ष: पुजारी ने तर्क दिया कि यह मामला पूरी तरह से “प्रतिशोध” (Vengeance) के लिए बनाया गया है। उन्होंने पहले कुछ लोगों के खिलाफ रंगदारी (Extortion) और जबरन वसूली का केस दर्ज कराया था, जिसके जवाब में उन पर यह POCSO केस लाद दिया गया।

हाई कोर्ट का कानूनी रुख: देरी की अहमियत

  • जस्टिस नागप्रसन्ना ने मामले को रद्द करते समय कुछ कड़े कानूनी सिद्धांत रखे।
  • कार्यवाही का दूषित होना: कोर्ट ने कहा, “बिना किसी ठोस स्पष्टीकरण के 5 से 7 साल की देरी पूरी कार्यवाही को खत्म कर देती है। अगर शिकायत 2017 में ही दर्ज होती, तो परिस्थिति बिल्कुल अलग होती।”
  • बयानों की गुणवत्ता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन मामलों में केवल पीड़िता का बयान ही आधार हो और कोई मेडिकल या अन्य सहायक सबूत (Corroborative Evidence) न हो, वहां बयान “सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता” (Sterling Quality) का होना चाहिए। इस मामले में अत्यधिक देरी के कारण बयानों में “बढ़ा-चढ़ाकर” (Embellishments) बातें जोड़े जाने की पूरी संभावना है।
  • POCSO एक्ट का दुरुपयोग: कोर्ट ने टिप्पणी की कि 7 साल बाद POCSO के तहत मामला दर्ज करना कानून का घोर दुरुपयोग (Gross Misuse) प्रतीत होता है।

‘Extortion’ (रंगदारी) का एंगल

कोर्ट के सामने यह बात भी आई कि पुजारी ने पहले ही शिकायत की थी कि कुछ लोग उनकी निजी तस्वीरें सार्वजनिक करने की धमकी देकर उनसे पैसे वसूलने की कोशिश कर रहे थे। इसके बाद ही पुजारी के खिलाफ यह यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया, जिससे कोर्ट को “प्रतिशोध की भावना” के दावे में सच्चाई नजर आई।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
आरोपीएक मठ का पुजारी (Pontiff)।
देरीघटना के 7 साल बाद (और अंतिम घटना के 5 साल बाद) FIR।
कोर्ट का आदेशआपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द (Quashed) किया गया।
कानूनी संदेशPOCSO जैसे गंभीर कानूनों का इस्तेमाल निजी दुश्मनी निकालने के लिए नहीं किया जा सकता।

कानून और समय की सीमा

कर्नाटक हाई कोर्ट का यह फैसला याद दिलाता है कि न्याय में देरी न केवल न्याय मिलने में बाधा है, बल्कि देरी से दर्ज कराई गई शिकायतें अक्सर संदेह के घेरे में आ जाती हैं। विशेष रूप से गंभीर अपराधों में, समय पर शिकायत दर्ज कराना मामले की विश्वसनीयता के लिए अनिवार्य है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि बिना किसी ठोस कारण के वर्षों की देरी को “न्यायिक प्रक्रिया” का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।

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