Monday, September 21, 2026
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Forum Shopping: अपनी पसंद की बेंच या अनुकूल आदेश पाने के लिए फोरम शॉपिंग की कोशिश…यूं लगाया वकील पर जुर्माना, पढ़ें केस

Forum Shopping: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस कृष्ण पहल ने जमानत याचिका को खारिज करते हुए वकील के आचरण की कड़ी निंदा की।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विवरणतथ्य
न्यायाधीशजस्टिस कृष्ण पहल।
सजा/जुर्मानावकील पर ₹2,000 का जुर्माना।
आरोपबेंच हंटिंग और आदेश सुनाते समय बाधा डालना।
कानूनी सिद्धांतट्रायल अंतिम चरण में होने पर जमानत से इनकार।
निर्देशट्रायल कोर्ट को मामले की सुनवाई में तेजी लाने का आदेश।

वकील पर ₹2,000 का जुर्माना लगाया

अदालत ने एक POCSO मामले में ‘फोरम शॉपिंग’ (Forum Shopping) और ‘बेंच हंटिंग’ (Bench Hunting) करने की कोशिश पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने महज 10 महीने के भीतर तीन बार जमानत याचिका दायर करने और बहस पूरी होने के बाद आदेश सुनाते समय स्थगन (Adjournment) मांगने पर वकील पर ₹2,000 का जुर्माना लगाया है। यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) और POCSO अधिनियम के तहत दर्ज एक अपराध से जुड़ा है, जहां आरोपी पिछले काफी समय से जेल में है।

फोरम शॉपिंग और बेंच हंटिंग पर टिप्पणी

अदालत ने पाया कि वकील ने बहुत ही कम अंतराल पर एक के बाद एक तीन जमानत याचिकाएं दायर कीं। इसमें पहली याचिका: 1 मई, 2025 को खारिज हुई।दूसरी याचिका: 17 अक्टूबर, 2025 को खारिज हुई। तीसरी याचिका: 26 फरवरी, 2026 को दायर की गई। कोर्ट ने कहा कि इतनी जल्दी-जल्दी याचिकाएं दायर करना स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि वकील अपनी पसंद की ‘बेंच’ या अनुकूल आदेश पाने के लिए ‘फोरम शॉपिंग’ की कोशिश कर रहा था।

आदेश सुनाते समय स्थगन मांगने पर फटकार

  • अदालत सबसे ज्यादा इस बात पर नाराज हुई कि जब बहस (Arguments) पूरी हो गई और जज ने अपना आदेश बोलना (Pronounce) शुरू किया, तब वकील ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए मामले को टालने (Adjournment) की मांग की।
  • कोर्ट का रुख: जस्टिस पहल ने कहा कि ऐसा आचरण ‘कोर्ट की अवमानना’ (Contempt of Court) के समान है। हालांकि, उन्होंने अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के बजाय वकील पर ₹2,000 की आर्थिक पेनल्टी लगाना उचित समझा।

तीसरी जमानत याचिका खारिज होने के कारण

  • वकील ने जमानत के लिए कुछ नए तर्क दिए थे, जिन्हें कोर्ट ने अपर्याप्त माना।
  • नया आधार: दलील दी गई कि पीड़िता के शरीर पर कोई चोट के निशान नहीं पाए गए और यह जमीन के विवाद के कारण फंसाने का मामला है।
  • सुप्रीम कोर्ट का हवाला: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले [X बनाम राजस्थान राज्य (2024)] का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया है कि एक बार ट्रायल शुरू होने और आरोप (Charges) तय होने के बाद, सामान्यतः जमानत नहीं दी जानी चाहिए।
  • ट्रायल की स्थिति: ट्रायल कोर्ट की रिपोर्ट के अनुसार, 8 गवाहों की जांच हो चुकी है और ट्रायल अपने अंतिम चरण में है।

न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान अनिवार्य

यह फैसला वकीलों और वादियों के लिए एक चेतावनी है कि वे अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग न करें। बार-बार एक ही मांग के साथ कोर्ट का दरवाजा खटखटाना या अनुकूल बेंच की तलाश करना न केवल न्यायिक समय की बर्बादी है, बल्कि यह न्याय प्रणाली की गरिमा के खिलाफ भी है।

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