Thursday, June 25, 2026
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Bar Member: वकालत के लिए बार एसो. की सदस्यता अनिवार्य नहीं…कहा-सदस्य न होने पर वकील को प्रैक्टिस से रोकना असंवैधानिक, अधिवक्तागण जरूर पढ़ें

Bar Member: तेलंगाना हाई कोर्ट ने वकीलों के पेशेवर अधिकारों पर एक बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी बार एसोसिएशन (Bar Association) की सदस्यता लेना पूरी तरह से स्वैच्छिक (Voluntary) है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के 2015 के नियमों की व्याख्या

जस्टिस एन. तुकाराम जी की पीठ ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के 2015 के नियमों की व्याख्या करते हुए कहा कि वकालत का अधिकार ‘एडवोकेट्स एक्ट, 1961’ से मिलता है, न कि किसी प्राइवेट या नॉन-स्टैच्यूटरी एसोसिएशन की सदस्यता से। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई वकील किसी एसोसिएशन का सदस्य नहीं है, तो उसे वकालत करने से नहीं रोका जा सकता। यह मामला एक वकील द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसने ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया सर्टिफिकेट एंड प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (वेरिफिकेशन) रूल्स, 2015’ के नियम 6 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी।

“नियम 6” की नई व्याख्या (Reading Down)

  • अदालत ने बीसीआई के नियम 6 को “रीड डाउन” (सीमित व्याख्या) करते हुए तीन मुख्य बातें कहीं।
  • स्वैच्छिक सदस्यता: बार एसोसिएशन की सदस्यता लेना वकील की अपनी पसंद है।
  • प्रैक्टिस पर कोई रोक नहीं: सदस्यता न होने के आधार पर किसी वकील को अदालतों में पेश होने या प्रैक्टिस करने से वंचित नहीं किया जा सकता।
  • एसोसिएशन का नियंत्रण: बार एसोसिएशनों के पास वकीलों के प्रैक्टिस करने के अधिकार पर कोई नियामक (Regulatory) नियंत्रण नहीं होगा।

संवैधानिक और कानूनी आधार

  • कोर्ट ने अपने फैसले में भारत के संविधान और एडवोकेट्स एक्ट का हवाला दिया।
  • अनुच्छेद 19(1)(c) और 19(1)(g): संविधान नागरिकों को संघ बनाने (Association) और अपनी पसंद का पेशा (Profession) चुनने की स्वतंत्रता देता है। सदस्यता के लिए मजबूर करना इन अधिकारों का उल्लंघन है।
  • एडवोकेट्स एक्ट, 1961: इस कानून की धारा 29, 30 और 33 स्पष्ट करती हैं कि केवल बार काउंसिल में नामांकित (Enrolled) व्यक्ति ही वकालत का हकदार है। इसमें बार एसोसिएशन का सदस्य होने की कोई शर्त नहीं है।
  • वेरिफिकेशन का उद्देश्य: कोर्ट ने माना कि वेरिफिकेशन और सर्टिफिकेट की प्रक्रिया केवल ‘असली वकीलों’ की पहचान करने और कल्याणकारी योजनाओं (Welfare Schemes) का लाभ देने के लिए है, न कि वकीलों को डराने या मजबूर करने के लिए।

ग़ौरव कुमार बनाम भारत संघ’ का संदर्भ

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation) यानी बार काउंसिल द्वारा बनाए गए नियम, मूल कानून (एडवोकेट्स एक्ट) से बाहर जाकर नई बाध्यताएं या अक्षमताएं पैदा नहीं कर सकते।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणतथ्य
मुख्य मुद्दाक्या बार एसोसिएशन की सदस्यता अनिवार्य है?
कोर्ट का फैसलानहीं, यह पूरी तरह स्वैच्छिक है।
नियम की स्थितिBCI नियम 6 को केवल ‘नियामक और कल्याणकारी’ माना गया।
निर्देशBCI सभी राज्य बार काउंसिलों को स्पष्टीकरण जारी करे।
अधिकार का स्रोतएडवोकेट्स एक्ट, 1961 और संविधान का अनुच्छेद 19।

वकीलों की स्वतंत्रता की जीत

यह फैसला उन वकीलों के लिए बड़ी राहत है जो किसी कारणवश स्थानीय बार एसोसिएशनों का हिस्सा नहीं बन पाते या उनकी राजनीति से दूर रहना चाहते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बार काउंसिल का काम ‘विनियमन’ (Regulation) करना है, ‘बाध्य’ (Coercion) करना नहीं।

IN THE HIGH COURT FOR THE STATE OF TELANGANA, HYDERABAD
THE HONOURABLE SRI JUSTICE N. TUKARAMJI
WRIT PETITION No. 11364 OF 2024
Vijay Gopal, Aged: 35 years, Occupation: Advocate
VERSUS
Bar Council of India (BCI), Represented by Chairman & Bar Council for State of Telangana (BCST), Represented by
Chairman

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