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Obstructionist Mind: सिर्फ विकास रोकने के लिए याचिकाएं क्यों?…जजों ने पूछा— क्या कोई ऐसा प्रोजेक्ट है जिसका ‘पर्यावरणविदों’ ने स्वागत किया हो?

Obstructionist Mind: सुप्रीम कोर्ट ने विकास परियोजनाओं (Developmental Projects) के खिलाफ दायर होने वाली याचिकाओं पर कड़ी टिप्पणी की है।

गुजरात के पीपावाव पोर्ट के विस्तार के खिलाफ याचिका

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने गुजरात के पीपावाव पोर्ट (Pipavav Port) के विस्तार के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान ये मौखिक टिप्पणियां कीं। अदालत ने “विकास बनाम पर्यावरण” की बहस में सतत विकास (Sustainable Development) पर जोर देते हुए कहा कि केवल विरोध के लिए याचिकाएं दाखिल करने की प्रवृत्ति देश की प्रगति में बाधक है। यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के उस आदेश के खिलाफ था, जिसने पीपावाव पोर्ट के आधुनिकीकरण के लिए दी गई पर्यावरण और तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) क्लीयरेंस को चुनौती देने वाली अपील खारिज कर दी थी।

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“विकास को रोकना प्रगति में बाधा”

  • सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ताओं की मंशा पर सवाल उठाया।
  • प्रगति का सवाल: “इस देश में जिस तरह की याचिकाएं दायर की जा रही हैं, वे केवल विकास को रोकने के लिए हैं। यही समस्या है। अगर ऐसी याचिकाएं दाखिल होती रहीं तो देश प्रगति कैसे करेगा?”
  • कार्यकर्ताओं की भूमिका: कोर्ट ने तल्ख अंदाज में पूछा— “हमें इस देश में एक भी ऐसा प्रोजेक्ट दिखाएं जहां इन तथाकथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कहा हो कि हम इस प्रोजेक्ट का स्वागत करते हैं।”

पर्यावरण और विकास में संतुलन (The Balance)

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि वह पर्यावरण विरोधी नहीं है, लेकिन विकास भी अनिवार्य है।
  • न्यायालय की चिंता: पीठ ने कहा कि अदालतें हमेशा पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर गंभीर रही हैं और पर्यावरण को प्रभावित करने वाली किसी भी चीज़ की आलोचना करती हैं।
  • सुझाव की मांग: कोर्ट ने कहा कि वह तब सराहना करेगा जब पर्यावरणविद् या कार्यकर्ता केवल “रोक” (Stall) लगाने के बजाय प्रभावी सुझाव लेकर आएं, ताकि पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ सतत विकास सुनिश्चित हो सके।

NGT को समीक्षा का निर्देश

  • याचिका पर विचार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को एक वैकल्पिक रास्ता दिया।
  • रिव्यू याचिका: कोर्ट ने याचिकाकर्ता को छूट दी कि वह NGT के पास ‘पुनर्विचार आवेदन’ (Review Application) दायर कर सकता है।
  • मुख्य बिंदु: NGT को यह जांचने को कहा गया है कि क्या याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दों पर पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में उचित विचार किया गया था या नहीं।
  • वास्तविक आशंकाएं: कोर्ट ने स्वीकार किया कि जब कोई प्रोजेक्ट प्रस्तावित होता है, तो शुरुआत में पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर वास्तविक आशंकाएं हो सकती हैं, लेकिन इसका समाधान प्रोजेक्ट को पूरी तरह रोकने में नहीं है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणतथ्य
संबंधित प्रोजेक्टगुजरात का पीपावाव पोर्ट (विस्तार एवं आधुनिकीकरण)।
कोर्ट की मुख्य आपत्तिकेवल विकास कार्यों को बाधित करने के लिए याचिकाएं दाखिल करना।
न्यायालय का दृष्टिकोणविकास आवश्यक है, लेकिन वह ‘सतत’ (Sustainable) होना चाहिए।
अगला कदमयाचिकाकर्ता NGT के सामने अपनी विशिष्ट चिंताओं के साथ रिव्यू दाखिल कर सकता है।

विरोध नहीं, विशेषज्ञता की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि भारत अब “सक्रिय न्यायिक हस्तक्षेप” से “विकास-अनुकूल न्यायशास्त्र” (Development-friendly Jurisprudence) की ओर बढ़ रहा है। कोर्ट चाहता है कि कार्यकर्ता केवल ‘अवरोधक’ (Obstructionist) न बनें, बल्कि तकनीकी विशेषज्ञता के साथ न्यायपालिका की मदद करें ताकि पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों साथ चल सकें।

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