Saturday, August 15, 2026
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Speedy Justice: साधारण मारपीट का केस 35 साल तक चल रहा…इलाहाबाद HC से लंबित केसों व कैदियों का पूरा डेटा मांगा, पढ़ें केस

Speedy Justice: सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश के एक पुलिस कांस्टेबल के खिलाफ पिछले 35 वर्षों से लंबित आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है।

पुलिस मेस में खाने को लेकर हुआ था विवाद

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भूयां की पीठ ने स्पष्ट किया कि त्वरित न्याय (Speedy Justice) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है और इसका उल्लंघन होने पर मुकदमे को जारी रखना अन्यायपूर्ण है।कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि साधारण मारपीट के मामले में तीन दशक से ज्यादा का समय लगना न्याय का मजाक है। यह मामला 1989 में प्रयागराज (इलाहाबाद) के कुंभ मेला ड्यूटी के दौरान का है। एक पुलिस मेस में खाने को लेकर हुए विवाद में कांस्टेबल कैलाश चंद्र कापरी और अन्य पर एक साथी कांस्टेबल के साथ मारपीट करने का आरोप लगा था।

मामले की पृष्ठभूमि (1989-2026)

  • घटना: 1989 में जीआरपी रामबाग थाना, इलाहाबाद में FIR दर्ज हुई। आरोप था कि पांच कांस्टेबलों ने मिलकर एक साथी की पिटाई की।
  • धाराएं: IPC की धारा 147 (दंगा), 323 (मारपीट), 504 (अपमान) और रेलवे अधिनियम की धारा 120।
  • देरी का आलम: मुकदमा 1991 से लंबित था। इस दौरान दो आरोपियों की मौत हो गई और दो को 2023 में बरी कर दिया गया क्योंकि अभियोजन पक्ष किसी गवाह को पेश नहीं कर सका।
  • इलाहाबाद HC का रुख: हाई कोर्ट ने मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अब पलट दिया है।

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यूपी की न्याय प्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट की सर्जरी

सुप्रीम कोर्ट ने केवल एक व्यक्ति को राहत देने तक सीमित न रहकर उत्तर प्रदेश की पूरी न्यायिक व्यवस्था की रिपोर्ट मांग ली है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को 13 जुलाई, 2026 तक एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें निम्नलिखित जानकारियां मांगी गई हैं:

अदालतों और जजों का विवरण

  • लंबित मामले: मजिस्ट्रेट और सत्र न्यायालयों (Sessions Courts) में लंबित आपराधिक मामलों की कुल संख्या और उनकी उम्र।
  • पदों की स्थिति: जजों के स्वीकृत पद, वर्तमान संख्या और खाली पदों (Vacancies) का पूरा ब्यौरा।
  • बाधाएं: केसों के निपटारे में आने वाली प्रशासनिक या अन्य अड़चनें।

कैदियों और जमानत (Bail) की स्थिति

  • विचाराधीन कैदी (Undertrials): जेलों में बंद ऐसे कैदियों की संख्या जो लंबे समय से सजा काट रहे हैं।
  • जमानत के आवेदन: इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित जमानत याचिकाओं का वर्षवार डेटा।
  • जेल की अवधि: ऐसे कैदियों का विवरण जो बिना जमानत के 5 से 10 साल या उससे अधिक समय से जेल में हैं।

अनुच्छेद 21: अमूर्त सुरक्षा कवच नहीं

  • कोर्ट ने जोर देकर कहा कि त्वरित न्याय का अधिकार केवल कागजों पर रहने वाला “अमूर्त या भ्रमकारी सुरक्षा कवच” (Abstract or illusory safeguard) नहीं होना चाहिए।
  • साधारण चोट बनाम 35 साल: कोर्ट ने हैरानी जताई कि ‘सिंपल हर्ट’ जैसे छोटे अपराध के लिए किसी व्यक्ति को 35 साल तक अदालतों के चक्कर लगवाना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य विवरणतथ्य / निर्देश
याचिकाकर्ताकैलाश चंद्र कापरी (कांस्टेबल)।
केस की अवधि35 साल (1991 से लंबित)।
कोर्ट की टिप्पणीत्वरित न्याय अनुच्छेद 21 का अनिवार्य हिस्सा (Sine qua non) है।
डेटा की मांगयूपी की सभी अदालतों में लंबित केस, खाली पद और जेलों में बंद कैदियों का ब्यौरा।
डेडलाइन13 जुलाई, 2026 तक रिपोर्ट सौंपनी होगी।

व्यवस्था सुधार की ओर कदम

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उत्तर प्रदेश की न्याय वितरण प्रणाली में एक बड़े सुधार का संकेत है। अक्सर छोटे मामलों में देरी के कारण निर्दोष लोग दशकों तक कानूनी प्रक्रिया में फंसे रहते हैं। हाई कोर्ट से विस्तृत डेटा मांगकर सुप्रीम कोर्ट अब जमीनी स्तर पर लंबित मामलों और जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की समस्या का स्थायी समाधान ढूंढना चाहता है।

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