बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और टिप्पणियां
- ‘नैतिक प्रवचन’ पर कड़ी नाराजगी: खंडपीठ ने टिप्पणी की:“फैमिली कोर्ट के जज द्वारा एक पत्नी के तथाकथित ‘पवित्र कर्तव्यों’ की व्याख्या करना या उससे परिवार की ‘बहू’ की तरह व्यवहार करने की अपेक्षा करना न केवल अवांछित और अप्रमाणित है, बल्कि बेहद पिछड़ा हुआ (Regressive) भी है। यह वैवाहिक संबंधों के बारे में रूढ़िवादी और गलत धारणाओं को बढ़ावा देता है। जजों को ऐसी टिप्पणियां करने में बेहद सावधान रहना चाहिए।”
- अभिभावकता (Guardianship) बनाम कस्टडी (Custody): कोर्ट ने अथर्व हुसैन बनाम सैयद सिराज अहमद (2010) फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि भले ही पिता प्राकृतिक अभिभावक (Natural Guardian) हो, लेकिन धारा 12 के तहत अंतरिम कस्टडी में तुरंत बदलाव तभी किया जा सकता है जब वर्तमान व्यवस्था से बच्चे को कोई खतरा या नुकसान हो। बच्चे की दिनचर्या में स्थिरता और भावनात्मक जुड़ाव सबसे महत्वपूर्ण है।
- वित्तीय श्रेष्ठता कस्टडी का एकमात्र आधार नहीं: फैमिली कोर्ट ने एक तरफ कहा कि आर्थिक स्थिति कस्टडी तय नहीं करती, लेकिन दूसरी तरफ पिता के बड़े घर, नौकर-चाकर और सिंगापुर के कैम्ब्रिज पाठ्यक्रम को आधार बनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि पुणे में बच्चा सुरक्षित है, स्कूल जा रहा है और अपने ननिहाल/परिवार से जुड़ा हुआ है।
- विदेशी कोर्ट आदेश (Foreign Custody Order) और Parens Patriae का सिद्धांत: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि रुचि मजू बनाम संजीव मजू (2011) फैसले के अनुसार, भारतीय अदालतें पेरेंस पैट्री (Parens Patriae – राज्य/अदालत का बच्चे के अभिभावक के रूप में कर्तव्य) क्षेत्राधिकार का पालन करती हैं। केवल विदेशी अदालत (सिंगापुर) का आदेश होने मात्र से भारतीय अदालतें बच्चे के कल्याण की स्वतंत्र जांच किए बिना कस्टडी ट्रांसफर नहीं कर सकतीं।
मुंबई: बाल अभिरक्षा (Child Custody) और संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890) के तहत अंतरिम आदेश पारित करते समय न्यायिक दृष्टिकोण, लैंगिक रूढ़िवादिता (Gender Stereotypes) और बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interests of the Child) के निर्धारण पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अत्यंत प्रगतिशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
नाबालिग बेटे की कस्टडी मां के पास ही बरकरार
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति आशीष एस. चव्हाण की खंडपीठ ने निचली अदालत के दृष्टिकोण को “प्रतिगामी” (Regressive), “अनुचित” (Unwarranted) और “विधिक रूप से निराधार” करार देते हुए नाबालिग बेटे की कस्टडी मां के पास ही बरकरार रखने का आदेश दिया। इसके साथ ही अदालत ने पिता को प्रत्येक तीन माह में भौतिक मुलाकात (Physical Access) और प्रति सप्ताह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मिलने का अधिकार प्रदान किया है। उच्च न्यायालय ने पुणे फैमिली कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह खारिज और निरस्त कर दिया है, जिसमें एक मां को “सदाचारी/पवित्र पत्नी” (Pious Wife) के कर्तव्यों की याद दिलाते हुए और उसे परिवार की “बहू” होने के आधार पर उपदेश देते हुए 8 वर्षीय बेटे की अंतरिम कस्टडी छीनकर पिता को सौंपने और बच्चे को सिंगापुर ले जाने की अनुमति दे दी गई थी।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं तल्ख टिप्पणियां
1. फैमिली कोर्ट के ‘नैतिक उपदेशों’ और ‘बहू’ की टिप्पणियों पर सख्त एतराज
न्यायमूर्ति आशीष एस. चव्हाण द्वारा लिखित खंडपीठ के फैसले में फैमिली कोर्ट के पीठासीन न्यायाधीश की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया: “मामले को पुनर्विचार (Remand) के लिए वापस भेजते समय इस न्यायालय ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था कि फैमिली कोर्ट ने पति-पत्नी के तनावपूर्ण संबंधों पर अत्यधिक जोर दिया है। हालांकि, ऐसा प्रतीत होता है कि इस टिप्पणी का वांछित प्रभाव नहीं पड़ा। फैमिली कोर्ट ने वर्तमान आदेश में एक बार फिर माता और पिता के बीच के आरोपों-प्रत्यारोपों पर ध्यान केंद्रित किया और विशेष रूप से अपीलकर्ता-मां की कथित कमियों को ही निशाना बनाया। उदाहरण के लिए, यह टिप्पणी की गई कि अपीलकर्ता यह भूल गई है कि प्रतिवादी उसके बच्चे का ‘जनक पिता’ है और उसने अपने पति के साथ ‘समझौता’ (Patch-up) करने की रत्ती भर भी इच्छा प्रदर्शित नहीं की, बल्कि केवल भारी वित्तीय सहायता की उम्मीद कर रही है। यह अत्यंत व्यथित करने वाला (Rather Perturbing) है कि फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश ने उपदेश देना शुरू कर दिया और अपने पति के प्रति एक ‘पवित्र/सदाचारी पत्नी’ (Pious Wife) के तथाकथित कर्तव्यों को यह तय करने का आधार बना दिया कि बच्चे के सर्वोत्तम हित में उसे पिता के साथ होना चाहिए।”
पीठ ने आगे जोड़ा: “मानो यह नैतिक उपदेश (Moralistic Sermon) ही काफी नहीं था, फैमिली कोर्ट ने मुहावरों और कहावतों का सहारा लेकर नाबालिग बच्चे और उसके दादा के संबंधों के बारे में आकस्मिक, रूढ़िवादी और सामान्यीकृत टिप्पणियां कीं और अपीलकर्ता पर इस तथ्य के आधार पर तीखे आक्षेप लगाए कि वह परिवार की ‘बहू’ है। फैमिली कोर्ट के जज की ये टिप्पणियां न केवल अनुचित और निराधार हैं, बल्कि पूरी तरह से प्रतिगामी (Regressive) हैं, जो वैवाहिक संबंधों के बारे में रूढ़िवादी और त्रुटिपूर्ण धारणाओं को बढ़ावा देती हैं। हम यह टिप्पणी किए बिना नहीं रह सकते कि जजों को किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में ऐसे मामलों के तथ्यों से असंबद्ध और असंवेदनशील टिप्पणियां करने से बचना चाहिए।”
2. वित्तीय श्रेष्ठता (Financial Superiority) कस्टडी का निर्धारक पैमाना नहीं
- फैमिली कोर्ट ने पिता के पक्ष में कस्टडी देते हुए यह तर्क दिया था कि पिता सिंगापुर में बड़ा घर, घरेलू नौकर और कैम्ब्रिज पाठ्यक्रम (Cambridge Curriculum) में अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिलाने में आर्थिक रूप से सक्षम है।
- हाईकोर्ट ने इसे खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केवल वित्तीय श्रेष्ठता या आलीशान सुविधाएं बच्चे की कस्टडी तय करने का आधार नहीं बन सकतीं। अदालत ने पाया कि मां के साथ पुणे में रहते हुए बच्चे की उपेक्षा (Neglect) या किसी आसन्न खतरे का कोई साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था।
3. विदेशी अदालत का आदेश बनाम भारतीय न्यायालयों का ‘पेरेंट्स पैट्रिए’ (Parens Patriae) क्षेत्राधिकार
- सिंगापुर की पारिवारिक अदालत ने पूर्व में पिता के पक्ष में कस्टडी का आदेश दिया था, जिस पर फैमिली कोर्ट ने ‘न्यायालयों के सौहार्द’ (Comity of Courts) के सिद्धांत के तहत अत्यधिक भरोसा किया।
- सुप्रीम कोर्ट के मील का पत्थर निर्णय रुचि मजू बनाम संजीव मजू (2011) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि जब कोई बच्चा भारत में रह रहा हो, तो भारतीय अदालतें उसके संरक्षक के रूप में (Parens Patriae) कार्य करती हैं। किसी विदेशी अदालत के कस्टडी आदेश के बावजूद, भारतीय अदालत को विदेशी आदेश के आगे घुटने टेकने के बजाय स्वतंत्र रूप से यह देखना होता है कि बच्चे का भावनात्मक, मानसिक और शैक्षणिक कल्याण किसके साथ सुरक्षित रहेगा।
4. धारा 12 के तहत अंतरिम कस्टडी की वैधानिक सीमाएं
- अदालत ने अथर हुसैन बनाम सैयद सिराज अहमद (2010) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि धारा 12 केवल नाबालिग की अंतरिम सुरक्षा और अस्थायी व्यवस्था के लिए है। इसके तहत मुख्य वाद की सुनवाई पूरी हुए बिना बच्चे की वास्तविक और स्थायी कस्टडी को पूरी तरह नहीं बदला जा सकता, जब तक कि कोई असाधारण और बाध्यकारी कारण (Compelling Reasons) न हों।
- व्हाट्सएप चैट जैसे अप्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर मां के खिलाफ यह निष्कर्ष निकालना कि वह बच्चे को पिता के खिलाफ भड़का रही है, कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण था क्योंकि यह ट्रायल का विषय है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं वैवाहिक विवाद
- विवाह और सिंगापुर प्रवास:
- दोनों पक्षों का विवाह 18 मार्च 2012 को हिंदू रीति-रिवाज से पुणे में हुआ था।
- 16 मार्च 2016 को उनके बेटे का जन्म हुआ। बच्चे के प्रारंभिक वर्ष पुणे में बीते।
- जुलाई 2022 में यह परिवार सिंगापुर शिफ्ट हो गया और बच्चे का दाखिला वहां के इंटरनेशनल स्कूल में कराया गया।
- वैवाहिक विवाद और भारत वापसी (2025):
- दांपत्य जीवन में घरेलू हिंसा और भावनात्मक प्रताड़ना के गंभीर आरोप-प्रत्यारोप उभरे।
- 11 मार्च 2025 को मां अपने 8 वर्षीय बेटे को लेकर भारत लौट आई और पुणे में अपने मायके में रहने लगी, जहां बच्चा नियमित रूप से स्कूल जा रहा है और अपने ननिहाल के परिवेश में पूरी तरह घुल-मिल चुका है।
- कानूनी लड़ाई और फैमिली कोर्ट का आदेश:
- पिता ने पुणे फैमिली कोर्ट में संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा 7 के तहत मुख्य याचिका और धारा 12 के तहत अंतरिम कस्टडी व बच्चे को सिंगापुर ले जाने की अर्जी दायर की।
- फैमिली कोर्ट ने 16 मई 2026 को पिता की अर्जी स्वीकार करते हुए बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपने और उसे सिंगापुर स्थानांतरित करने का आदेश दिया।
- इसके खिलाफ मां ने अधिवक्ता अक्षय पेटकर के माध्यम से हाईकोर्ट में अपील (FCA No. 16488 of 2026) दाखिल की।
बॉम्बे हाईकोर्ट का अंतिम आदेश एवं व्यवस्था
- फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त: फैमिली कोर्ट द्वारा 16 मई 2026 को अंतरिम कस्टडी पिता को सौंपने का दिया गया आदेश पूरी तरह रद्द किया गया।
- मां के पास रहेगी कस्टडी: बच्चा निरंतर मां के साथ पुणे में ही रहेगा।
- पिता को विज़िटेशन व वीडियो एक्सेस अधिकार:
- पिता को प्रत्येक तीन माह में एक बार (Once every three months) बच्चे से भौतिक रूप से मिलने (Physical Access) का अधिकार दिया गया।
- बच्चे की छुट्टियों/वेकेशन के दौरान दोनों पक्ष आपसी सहमति से अतिरिक्त मुलाकातों की व्यवस्था करेंगे।
- मां को निर्देश दिया गया कि वह पिता को सप्ताह में कम से कम एक बार (Once every week) वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बच्चे से बात कराएगी।
- मुख्य मामले का त्वरित निपटारा: पुणे फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह धारा 7 के तहत लंबित मुख्य कस्टडी याचिका की सुनवाई हाईकोर्ट की अंतरिम टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना शीघ्रता से पूरी करे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: क्षितिजा अनूप गोगटे (अपीलकर्ता-मां) बनाम अनूप अनिल गोगटे (प्रतिवादी-पिता) [फैमिली कोर्ट अपील (स्टैम्प) संख्या 16488/2026 – बॉम्बे उच्च न्यायालय, अपीलीय शाखा]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता (मां) की ओर से: अधिवक्ता अक्षय पेटकर एवं अभिषेक सालियान (न्याय लीगल द्वारा निर्देशित)
- प्रतिवादी (पिता) की ओर से: अधिवक्ता अभिजीत सरवटे
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890):
- धारा 12 (नाबालिग की अस्थायी अभिरक्षा और अंतरिम सुरक्षा के आदेश की शक्ति)
- धारा 7 (संरक्षक नियुक्त करने की अदालत की शक्ति)
- धारा 17 (कस्टडी तय करते समय नाबालिग के कल्याण को सर्वोपरि रखने का सिद्धांत)
- हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 13 (नाबालिग का कल्याण सर्वोच्च विचार होना)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 226/227 एवं अपीलीय क्षेत्राधिकार
- संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890):
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- रुचि मजू बनाम संजीव मजू (2011, सुप्रीम कोर्ट) — ‘विदेशी अदालत के कस्टडी आदेश के बावजूद भारतीय अदालतों का पेरेंट्स पैट्रिए क्षेत्राधिकार बच्चे के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है; विदेशी आदेश का यांत्रिक क्रियान्वयन नहीं किया जा सकता।’
- अथर हुसैन बनाम सैयद सिराज अहमद (2010, सुप्रीम कोर्ट) — ‘संरक्षकता (Guardianship) और अभिरक्षा (Custody) दो भिन्न कानूनी अवधारणाएं हैं; भले ही पिता प्राकृतिक संरक्षक हो, लेकिन अंतरिम कस्टडी उस व्यक्ति के पास रह सकती है जहां बच्चे का तात्कालिक हित सुरक्षित हो।’
- गौरव नागपाल बनाम सुमेधा नागपाल (2009, सुप्रीम कोर्ट) — ‘कस्टडी की लड़ाइयों में केवल माता-पिता के विवाद, अहंकार या सामाजिक पूर्वाग्रहों के बजाय बच्चे का शारीरिक, नैतिक और मनोवैज्ञानिक विकास ही एकमात्र निर्णायक कसौटी है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति आशीष एस. चव्हाण (बॉम्बे उच्च न्यायालय)
- फैसला उद्घोषक: न्यायमूर्ति आशीष एस. चव्हाण (खंडपीठ हेतु)
- अंतिम निर्णय: मां की अपील स्वीकार; फैमिली कोर्ट का सिंगापुर कस्टडी ट्रांसफर आदेश निरस्त; मां के पास अंतरिम कस्टडी सुरक्षित।
Moralistic Sermon:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति भारती डांगरे एवं न्यायमूर्ति आशीष एस. चव्हाण |
| कानूनी प्रावधान | गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 (अंतरिम कस्टडी) |
| मुख्य निर्णय | फैमिली कोर्ट द्वारा बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपने का आदेश रद्द; बच्चा माँ के पास ही रहेगा। पिता को मुलाकात (Physical & Virtual Access) का अधिकार। |
| कोर्ट का संदेश | कस्टडी के मामलों में जजों को पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी धारणाओं/नैतिक प्रवचनों से दूर रहकर निष्पक्षता से केवल बच्चे के हित को देखना चाहिए। |

