अदालत की मुख्य तीखी टिप्पणियां
- अदालत के माहौल में व्यवधान स्वीकार्य नहीं:न्यायामूर्ति शुक्ला ने कहा कि जब अदालत को एक दिन में 70 से अधिक मामलों की सुनवाई करनी होती है, तो ऐसी स्थिति में बैकग्राउंड नॉइज (पीछे का शोर) और बार-बार कार की आवाजाही अदालती कार्यवाही को बाधित करती है।
- वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम 2025 का संदर्भ:कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिल्ली हाईकोर्ट के इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस एंड वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूल्स, 2025 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वकीलों को वाहनों के अंदर से कार्यवाही में शामिल नहीं होना चाहिए, जब तक कि कोई असाधारण परिस्थिति न हो और इसके लिए अदालत से पूर्व अनुमति न ली गई हो।
- नियम केवल औपचारिक नहीं हैं:हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा:“यह आवश्यकता केवल औपचारिक या प्रक्रियात्मक नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए है कि जब वकील वर्चुअली भी उपस्थित हों, तो वे ऐसे शांत और अनुकूल वातावरण से जुड़ें जो इस अदालत के उचित संचालन के लिए आवश्यक है। इस मामले में कोई असाधारण परिस्थिति मौजूद नहीं थी और वकील का आचरण नियमों का सीधा उल्लंघन है।”
नई दिल्ली: अदालती कार्यवाहियों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के उपयोग, वर्चुअल सुनवाई की औपचारिक मर्यादा (Courtroom Decorum) और वकीलों के पेशेवर आचरण पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक सख्त और नजीर पेश करने वाला दंडात्मक आदेश पारित किया है।
न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि वर्चुअल कोर्ट की सुविधा वकीलों की सहूलियत के लिए दी गई है, लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि वे अदालत की गरिमा, एकाग्रता और मर्यादा से समझौता करें। अदालत ने रेखांकित किया कि जब एक न्यायाधीश को एक ही दिन में 70 से अधिक मामलों का निपटारा करना होता है, तो चलती गाड़ियों से जुड़ने पर आने वाला बैकग्राउंड शोर और हलचल न्यायिक प्रक्रिया को गंभीर रूप से बाधित करती है। उच्च न्यायालय ने चलती हुई कार (Moving Car) में बैठकर वर्चुअल सुनवाई में शामिल होने और अदालती कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न करने के लिए एक अधिवक्ता पर ₹1 लाख की भारी कॉस्ट (जुर्माना) अधिरोपित की है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘अदालत की गरिमा की कीमत पर नहीं मिल सकती वर्चुअल सुविधा’ न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला ने वर्चुअल हियरिंग में शामिल होने वाले अधिवक्ताओं के रवैये पर कड़ा एतराज जताते हुए कहा: “वर्चुअल कार्यवाहियों (Virtual Proceedings) की सुविधा कभी भी अदालत कक्ष की गरिमा (Courtroom Decorum) की कीमत पर या न्यायिक कार्यवाहियों के संचालन में व्यवधान उत्पन्न करके नहीं प्राप्त की जा सकती। जब इस अदालत को एक दिन में 70 से अधिक मामलों से निपटना होता है, तो सुनवाई के दौरान आने वाला बैकग्राउंड शोर (Background Noise) और हलचल (Movement) इस अदालत की कार्यवाही को आगे बढ़ाने में गंभीर बाधा उत्पन्न करते हैं।”
2. VC रूल्स, 2025 का सीधा उल्लंघन: ‘पर्यावरण गरिमापूर्ण होना चाहिए’
- अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस एंड वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूल्स, 2025 के विशिष्ट प्रावधानों का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था दी गई है कि अधिवक्ताओं को वाहनों में बैठकर अदालती कार्यवाही में शामिल होने से बचना चाहिए, सिवाय इसके कि कोई असाधारण परिस्थिति (Exceptional Circumstances) हो और उसके लिए अदालत से पूर्व अनुमति ली गई हो।
- पीठ ने जोर देकर कहा:“यह आवश्यकता केवल एक औपचारिक प्रक्रियात्मक नियम नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब वकील वर्चुअल रूप से उपस्थित हों, तो वे एक ऐसे अनुकूल वातावरण (Conducive Environment) से उपस्थित हों जो इस अदालत के गरिमापूर्ण और सुचारू कामकाज के लिए उपयुक्त हो। वर्तमान मामले में ऐसी कोई असाधारण परिस्थिति मौजूद नहीं थी और वकील का आचरण नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है।”
3. ₹1 लाख की कॉस्ट और विधिक सेवा समिति में जमा कराने का निर्देश
- अदालत ने संबंधित अधिवक्ता नचिकेता गोयल के आचरण को अनुशासनहीनता और प्रक्रिया का उल्लंघन मानते हुए उन पर ₹1,00,000 (एक लाख रुपये) की लागत लगाई।
- अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि दिल्ली उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति (Delhi High Court Legal Services Committee – DHCLSC) के खाते में निश्चित समय-सीमा के भीतर जमा कराई जाए।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- मूल कार्यवाही: दिल्ली उच्च न्यायालय साउथ इंडियन बैंक (South Indian Bank) और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Union Bank of India) द्वारा भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के खिलाफ दायर की गई निष्पादन कार्यवाहियों (Enforcement Proceedings) की सुनवाई कर रहा था।
- घटनाक्रम: इसी मामले की पुकार के दौरान अधिवक्ता नचिकेता गोयल वर्चुअल मोड के माध्यम से स्क्रीन पर उपस्थित हुए, परंतु वे किसी कार्यालय या शांत कक्ष के बजाय एक चलती हुई कार के भीतर से जुड़े हुए थे। उनके कैमरे में लगातार हलचल और बैकग्राउंड का शोर स्पष्ट सुनाई दे रहा था, जिस पर पीठ ने कड़ी आपत्ति दर्ज की और तत्काल जुर्माना ठोक दिया।
विधिक प्रासंगिकता एवं वर्चुअल कोर्ट शिष्टाचार
- वर्चुअल सुनवाई और अदालती शिष्टाचार (Virtual Decorum):
- कोविड-19 महामारी के बाद सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने न्याय तक त्वरित पहुंच के लिए हाइब्रिड और वर्चुअल सुनवाई को संस्थागत रूप दिया।
- हालांकि, कई मौकों पर वकीलों द्वारा अनुचित परिधान (टी-शर्ट, बनियान), पार्कों, बाजारों या ड्राइविंग करते हुए शामिल होने की घटनाएं सामने आई हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स ने बार-बार अवमानना या जुर्माने की चेतावनियां जारी की हैं।
- अधिवक्ता आचार संहिता (BCI Rules):
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) रूल्स के तहत प्रत्येक अधिवक्ता का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह अदालत की गरिमा और सम्मान बनाए रखे, चाहे सुनवाई भौतिक रूप से हो रही हो या वर्चुअल माध्यम से।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: साउथ इंडियन बैंक व अन्य बनाम भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) [निष्पादन याचिका / प्रवर्तन कार्यवाही – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- संबंधित अधिवक्ता: अधिवक्ता नचिकेता गोयल
- प्रासंगिक नियम एवं विधिक प्रावधान:
- दिल्ली उच्च न्यायालय इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियमावली, 2025 (Delhi High Court Electronic Evidence and Video Conferencing Rules, 2025) (वाहनों से जुड़ने पर प्रतिबंध एवं अनुकूल माहौल की अनिवार्यता)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 35A (अदालती समय बर्बाद करने और प्रक्रियात्मक उल्लंघन पर लागत/हर्जाना अधिरोपित करने की अंतर्निहित शक्ति)
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियमावली (बार और बेंच के प्रति अधिवक्ता के पेशेवर कर्तव्य)
- संबद्ध पूर्ववर्ती न्यायिक नजीरें:
- सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘वर्चुअल अदालतें भी वास्तविक अदालतों की तरह ही हैं; किसी भी वकील द्वारा वहां की जाने वाली लापरवाही या अनौपचारिकता न्याय प्रशासन की गरिमा को ठेस पहुंचाती है।’
- मद्रास हाईकोर्ट एवं गुजरात हाईकोर्ट के पूर्ववर्ती आदेश — ‘गाड़ी चलाते हुए या सार्वजनिक पार्कों से वर्चुअल सुनवाई में शामिल होने वाले अधिवक्ताओं पर पूर्व में भी उच्च न्यायालयों द्वारा ₹10,000 से ₹25,000 तक की कॉस्ट लगाई जा चुकी है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला (दिल्ली उच्च न्यायालय)
- अंतिम आदेश: अधिवक्ता पर ₹1 लाख का जुर्माना अधिरोपित; राशि को दिल्ली हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी (DHCLSC) में जमा कराने का अनिवार्य निर्देश।
Virtual Hearing: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला |
| संबंधित वकील | एडवोकेट नचिकेता गोयल (Advocate Nachiketa Goyal) |
| कार्रवाई/जुर्माना | ₹1,000,00 (₹1 लाख) की राशि दिल्ली हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी (DHCLSC) में जमा कराने के निर्देश। |
| कारण | इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस एंड वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूल्स, 2025 का उल्लंघन (चलती कार से सुनवाई में शामिल होना)। |

