Monday, August 17, 2026
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Aata-Satta Marriages: नाबालिग को आटा-साटा प्रथा में झोंकने…बाद में मुकलावा (गौना) के जरिए उसकी शादी, यह रोचक केस सभी पढ़ें

Aata-Satta Marriages: राजस्थान हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और सामाजिक कुप्रथाओं को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटा

हाईकोर्ट के जस्टिस अरुण मोंगा व जस्टिस सुनील बेनीवाल ने साफ कहा कि ‘आटा-साटा’ (अदला-बदली विवाह) जैसी सामाजिक कुप्रथाओं के कारण उपजे पारिवारिक विवाद को किसी महिला के खिलाफ “वैवाहिक क्रूरता” या “स्वेच्छा से घर छोड़ने” (Desertion) का आधार नहीं बनाया जा सकता। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) के उस फैसले को पलट दिया, जिसने पत्नी की तलाक की याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने कानूनी सिद्धांतों को नजरअंदाज कर सारा ध्यान ‘आटा-साटा’ विवाद पर केंद्रित कर दिया, जो कि तार्किक रूप से पूरी तरह गलत है।

फैमिली कोर्ट की ‘बड़ी भूल’ पर हाई कोर्ट का प्रहार

हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट यह समझने में पूरी तरह नाकाम रहा कि दो अलग-अलग बातें क्या हैं। इनमें पहला आटा-साटा’ जैसी प्रथा से पैदा हुआ पारिवारिक विवाद और दूसरा वैवाहिक क्रूरता और परित्याग को तय करने का स्वतंत्र कानूनी पैमाना।

यह रही हाई कोर्ट की टिप्पणी

फैमिली कोर्ट ने गलत तरीके से यह मान लिया कि बाहर का कोई पारिवारिक विवाद (आटा-साटा) सीधे तौर पर पति-पत्नी के बीच के विवाद का इकलौता कारण है। किसी महिला के साथ सालों तक मानसिक अलगाव और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जाए, तो उससे वैवाहिक जीवन सामान्य रखने की उम्मीद नहीं की जा सकती। सिर्फ एक छत के नीचे रहने का मतलब सामंजस्यपूर्ण जीवन नहीं होता, कई बार यह विपरीत परिस्थितियों में की गई सिर्फ ‘जबरन सहनशीलता’ होती है।

आर्थिक मजबूरी और लोकलाज में सहना ‘सहमति’ नहीं

  • हाई कोर्ट ने महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर बेहद संवेदनशील टिप्पणी की।
  • मजबूरी की संबध: केवल इस तथ्य से कि पति-पत्नी कुछ साल साथ रहे, महिला के साथ हुई क्रूरता खत्म नहीं हो जाती।
  • सहनशीलता का गलत अर्थ: भारत में कई महिलाएं आर्थिक निर्भरता, सामाजिक दबाव, बच्चों के भविष्य, रहने की जगह न होने या माता-पिता के समर्थन की कमी के कारण कठिन शादियों में भी टिकी रहती हैं।
  • सहमति नहीं: अगर कोई पत्नी इसलिए रुकती है क्योंकि उसके पास “जाने के लिए कोई और जगह नहीं है”, तो इसे क्रूरता न होने का सबूत नहीं माना जा सकता। सहनशीलता को अक्सर सहमति या माफी समझ लिया जाता है, जो कि गलत है।

‘आटा-साटा’ प्रथा पर कोर्ट का कड़ा रुख और सामाजिक संदेश

  • कोर्ट ने नाबालिग लड़कियों को ‘आटा-साटा’ प्रथा में झोंकने और बाद में ‘मुकलावा’ (गौना) के जरिए उसे शादी में तब्दील करने की परंपरा की कड़ी निंदा की।
  • कानून सर्वोपरि: बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत वैवाहिक कानून सहमति, वयस्कता और गरिमा पर आधारित हैं। कोई भी समुदाय कानून से ऊपर उठकर कुप्रथा की दुहाई नहीं दे सकता।
  • बंधक जैसा तंत्र: इस प्रथा में एक बेटी का जीवन दूसरी बेटी के समर्पण पर निर्भर कर दिया जाता है। अगर एक शादी टूटती है, तो दूसरी शादी में बदला लिया जाता है। यह शादियों को परिवारों के बीच ‘आपसी बंधक’ बनाने जैसा है।
  • नैतिक रूप से दिवालिया: कोर्ट ने कहा, “संस्कृति या परंपरा की आड़ में शोषण को सही नहीं ठहराया जा सकता। बेटी कोई सौदेबाजी की वस्तु नहीं है, न ही वह किसी के बेटे की शादी की ‘सुरक्षा गारंटी’ (Security) है।”

मामले की पृष्ठभूमि और पत्नी के आरोप

  • शादी और प्रताड़ना: याचिकाकर्ता (पत्नी) की शादी 31 मार्च 2016 को बीकानेर में हुई थी। आरोप है कि हैसियत से ज्यादा दहेज देने के बाद भी मोटरसाइकिल और सोने की मांग को लेकर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
  • गंभीर आरोप: पत्नी ने अपने ससुर और जेठ पर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए, और विरोध करने पर मारपीट की गई। 19 मार्च 2020 को उसे उसकी नाबालिग बेटी के साथ जबरन घर से निकाल दिया गया।
  • कानूनी कार्रवाई: पीड़िता ने बीकानेर के महिला थाने में FIR संख्या 87/2020 दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने आईपीसी की धारा 498-A, 406, 323 और 34 के तहत चार्जशीट दाखिल की। उसने धारा 125 CrPC के तहत गुजारा भत्ते का केस भी किया।

पति का बचाव

पति ने क्रूरता के आरोपों से इनकार करते हुए ‘आटा-साटा’ की दलील दी थी। उसका कहना था कि उसकी बहन ने बालिग होने पर पत्नी के भाई के साथ ‘मुकलावा’ करने से मना कर दिया, जिसके बाद पत्नी के मायके वालों ने दबाव बनाना शुरू किया और पत्नी अपनी मर्जी से घर छोड़कर चली गई।

हाई कोर्ट का अंतिम निर्णय

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक मामलों में सबूतों को ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (Preponderance of Probabilities) के आधार पर परखा जाता है, न कि आपराधिक मामलों की तरह ‘संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt)। फैमिली कोर्ट ने पत्नी के सबूतों को नजरअंदाज कर गंभीर गलती की थी। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए अपील का निस्तारण किया और साफ किया कि इस कोर्ट की टिप्पणियां केवल हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 (तलाक) के संदर्भ में हैं, इसका पक्षों के बीच चल रहे आपराधिक या बच्चों की कस्टडी के मामलों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

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