Thursday, October 1, 2026
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Labour Law: काम के प्रति नग के हिसाब से वेतनधारक दर्जी भी नियमित कर्मी, भले वह मोटा वेतन न ले रहा हो…निजी कंपनी कर्मी यह फैसला पढ़ें

Labour Law: दिल्ली हाईकोर्ट ने श्रम कानून (Labour Law) के तहत एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।

यह कानूनी लड़ाई ‘संजय गारमेंट्स’ (Sanjay Garments) नामक एक कपड़ा कंपनी और वहां काम करने वाले दर्जी ‘राकेश कुमार’ के बीच 1999 से चल रही थी। कंपनी का तर्क था कि चूंकि वे राकेश को प्रति पीस सिलने के हिसाब से भुगतान करते थे, इसलिए वे कंपनी के नियमित कर्मचारी नहीं थे।

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1.25 लाख रुपये की एकमुश्त समेकित मुआवजा देने का निर्देश

हाईकोर्ट के न्यायाधीश शैल जैन की एकल पीठ ने 1999 से (पिछले 25 वर्षों से) लंबित इस विवाद का निपटारा करते हुए, पीड़ित दर्जी (टेलर) के पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि, मुकदमेबाजी के लंबे समय (दो दशक से अधिक) और दर्जी की सेवानिवृत्ति की उम्र को देखते हुए, कोर्ट ने बहाली (Reinstatement) के पुराने आदेश को बदलते हुए कंपनी को 1.25 लाख रुपये की एकमुश्त समेकित मुआवजा (Consolidated Compensation) राशि देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को ‘पीस-रेट’ (काम के प्रति नग के हिसाब से भुगतान – Piece-rate basis) पर वेतन दिया जाता है, तो मात्र इस आधार पर उसे कंपनी का नियमित कर्मचारी (Workman) मानने से इनकार नहीं किया जा सकता।

नियोक्ता-कर्मचारी संबंध तय करने का सही पैमाना क्या है? (The Control Test)

  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने श्रम अदालत (Labour Court) के पुराने फैसले को बरकरार रखते हुए नियोक्ता-कर्मचारी संबंध (Employer-Employee Relationship) को परिभाषित किया।
  • नियंत्रण और पर्यवेक्षण का सिद्धांत (Control and Supervision Test): हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई कर्मचारी नियमित है या नहीं, यह इस बात से तय होता है कि नियोक्ता (Employer) का उसके काम के तरीके और तौर-तरीकों पर कितना नियंत्रण है, न कि इस बात से कि उसे वेतन कैसे दिया जाता है।
  • अन्यत्र काम करने की आजादी नहीं: कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि दर्जी संजय गारमेंट्स के अलावा कहीं और स्वतंत्र रूप से सिलाई का काम करने के लिए स्वतंत्र था। वह पूरी तरह से इसी कंपनी के नियंत्रण और देखरेख में काम कर रहा था।
  • केवल ‘पीस-रेट’ होना बहाना नहीं: कोर्ट ने कहा कि केवल इस तथ्य से कि पारिश्रमिक की गणना प्रति पीस के आधार पर की जाती थी, कर्मचारी के वैधानिक अधिकारों को नकारा नहीं जा सकता। वह श्रम कानूनों के तहत सुरक्षा का पूरा हकदार है।

1999 से चल रहा पूरा विवाद (The 25-Year Timeline)

  • रोजगार की अवधि: दर्जी राकेश कुमार का दावा था कि वे 1988 से इस प्रतिष्ठान (पहले मेसर्स दयाल संस सिलेक्शन और बाद में मेसर्स संजय गारमेंट्स, जो एक ही परिसर से संचालित थे) में स्थायी कर्मचारी के रूप में काम कर रहे थे और उनका आखिरी वेतन ₹2,000 प्रति माह था। वहीं कंपनी का कहना था कि उन्होंने केवल जुलाई 1998 से अगस्त 1999 तक काम किया और वे ₹2,600 प्रति माह कमा रहे थे।
  • अवैध छंटनी (Illegal Retrenchment): अगस्त 1999 में वैधानिक लाभों की मांग करने पर कंपनी ने बिना किसी नोटिस, चार्जशीट या घरेलू जांच के राकेश कुमार को काम से निकाल दिया। इसके खिलाफ ऑल इंडिया इंजीनियरिंग एंड जनरल मजदूर यूनियन के माध्यम से सहायक श्रम आयुक्त के पास शिकायत दर्ज कराई गई थी।
  • लेबर कोर्ट का फैसला (2010): जुलाई 2010 में, लेबर कोर्ट ने दर्जी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें नौकरी पर बहाल करने और अगस्त 1999 से बहाली की तारीख तक 80% पिछला वेतन (Back Wages) देने का आदेश दिया था। कपड़ा कंपनी ने 2013 में इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट का अंतिम निर्णय और राहत

उच्च न्यायालय ने माना कि लेबर कोर्ट का यह निष्कर्ष बिल्कुल सही था कि दर्जी को नौकरी से निकालना पूरी तरह अवैध था। हालांकि, चूंकि यह मामला 25 साल पुराना हो चुका है और दर्जी अब अपनी सेवानिवृत्ति (Retirement) की उम्र के करीब पहुंच चुके हैं, इसलिए उन्हें वापस नौकरी पर रखने का कोई व्यावहारिक औचित्य नहीं रह गया था। इसलिए, अदालत ने न्याय के हित में आदेश दिया कि याचिकाकर्ता (संजय गारमेंट्स) को निर्देश दिया जाता है कि वह श्रम अदालत के पुरस्कार के पूर्ण और अंतिम निपटान के रूप में दर्जी को 8-सप्ताह के भीतर ₹1,25,000 की समेकित राशि का भुगतान करे।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य कानूनी बिंदुदिल्ली उच्च न्यायालय का रुख
माननीय न्यायाधीशजस्टिस शैल जैन
मूल सिद्धांतवेतन उत्पादन (Piece-rate) से जुड़े होने मात्र से कोई व्यक्ति ‘श्रमिक’ के दायरे से बाहर नहीं हो जाता।
अंतिम आदेशकंपनी की अपील आंशिक रूप से स्वीकार; बहाली के बदले ₹1.25 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश।
भुगतान की समयसीमाआदेश जारी होने के 8 सप्ताह के भीतर।

असंगठित और संविदा कर्मचारियों के लिए राहत

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला गारमेंट और अन्य विनिर्माण उद्योगों (Manufacturing Industries) में काम करने वाले लाखों ऐसे कामगारों के अधिकारों को मजबूती देता है, जिन्हें कंपनियां ‘ठेका कर्मचारी’ या ‘पीस-रेट कर्मचारी’ बताकर श्रम कानूनों के लाभों और छंटनी के मुआवजे से वंचित कर देती हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि काम का स्वरूप और नियंत्रण ही रोजगार की प्रकृति तय करेगा, न कि भुगतान की पद्धति।

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