Saturday, August 22, 2026
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Advocates Protection: वकीलों के साथ हिंसा, उत्पीड़न व डराने-धमकाने जैसी घटना न हो…उठाया जा रहा बड़ा कदम, सभी अधिवक्तागण जरूर पढ़ें

Advocates Protection: बॉम्बे हाई कोर्ट की कोल्हापुर बेंच ने महाराष्ट्र में वकीलों (Advocates) के साथ होने वाली हिंसा, उत्पीड़न और डराने-धमकाने की घटनाओं को रोकने के लिए व्यवस्था बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस माधव जे. जामदार और जस्टिस प्रवीण एस. पाटिल की डिवीजन बेंच ने इस जनहित याचिका (PIL) पर विस्तृत सुनवाई के लिए अगली तारीख 18 जून 2026 तय की है। कोर्ट इस बात की समीक्षा कर रहा है कि जब तक ‘Advocate Protection Bill’ कानून का रूप नहीं ले लेता, तब तक राज्य स्तर पर वकीलों की सुरक्षा के लिए अंतरिम दिशानिर्देश (Statewide Guidelines) जारी किए जाएं या नहीं।

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एडवोकेट प्रोटेक्शन बिल पर केंद्र और राज्य सरकार का रुख

  • सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र के महाधिवक्ता (Advocate General) मिलिंद साठे और केंद्र सरकार के वकील ने कोर्ट को कई बातों की जानकारी दी।
  • लॉ कमीशन के पास लंबित: ‘एडवोकेट्स प्रोटेक्शन बिल’ (अधिवक्ता संरक्षण विधेयक) पर वर्तमान में भारत के विधि आयोग (Law Commission of India) द्वारा विचार किया जा रहा है।
  • अदालती निर्देश न देने का अनुरोध: सरकार के वकीलों ने कोर्ट से आग्रह किया कि चूंकि यह बिल प्रक्रिया में है, इसलिए अभी अदालत इस मामले में कोई अलग से निर्देश या गाइडलाइंस जारी न करे।
  • हालांकि, कोर्ट द्वारा नियुक्त ‘एमीकी क्यूरी’ (Amici Curiae – अदालत के मित्र) ने सुझाव दिया कि बिल के कानून बनने तक अंतरिम सुरक्षा व्यवस्था के रूप में कोर्ट की गाइडलाइंस बेहद जरूरी हैं।

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Amici Curiae द्वारा वकीलों की सुरक्षा के लिए दिए गए 6 बड़े सुझाव (The Blueprint)

  • अदालत की सहायता कर रहे एमीकी क्यूरी (वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव चव्हाण और सत्यव्रत जोशी) ने दलील दी कि मौजूदा आपराधिक कानून (Penal Codes) वकीलों के काम में आने वाली बाधाओं और खतरों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने सुरक्षा के लिए एक 6-सूत्रीय ब्लूप्रिंट पेश किया।
  • जिला स्तरीय सुरक्षा समितियां (District Committees): हर जिले में जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में ‘अधिवक्ता संरक्षण समिति’ बनाई जाए, जो वकीलों की शिकायतों का समयबद्ध निवारण करे।
  • पुलिस की मनमानी पर रोक: किसी न्यायिक प्राधिकारी (Judicial Authority) की पूर्व जांच/अनुमति के बिना वकीलों के खिलाफ गिरफ्तारी या तलाशी जैसी दंडात्मक पुलिस कार्रवाई पर रोक हो।
  • तत्काल पुलिस सुरक्षा: किसी मामले की पैरवी के कारण यदि किसी वकील को गंभीर या विश्वसनीय खतरा है, तो थ्रेट असेसमेंट के आधार पर उन्हें तुरंत पुलिस सुरक्षा दी जाए।
  • उच्च स्तरीय जांच (High-level Probe): वकीलों के खिलाफ हिंसा या उनके काम में बाधा डालने के मामलों की जांच कम से कम ‘डिप्टी सुप्रीटेंडेंट’ (DySP) रैंक के अधिकारी द्वारा की जाए।
  • फर्जी मुकदमों से सुरक्षा: वकीलों को उनके पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन के बदले में की जाने वाली प्रतिशोधात्मक कार्रवाई, दुर्भावनापूर्ण मुकदमों और तंग करने वाली शिकायतों से बचाया जाए।
  • क्लाइंट प्राइवेसी की सुरक्षा: कोर्ट के आदेश के बिना वकीलों को अपने मुवक्किल (Client) की गोपनीय बातचीत या दस्तावेजों को जांच एजेंसियों के सामने उजागर करने के लिए मजबूर न किया जाए।

क्या था पूरा मामला? (The Trigger Point)

  • यह जनहित याचिका (PIL) 7 मार्च 2026 को कोल्हापुर जिला अदालत परिसर में हुई एक हिंसक घटना के बाद दायर की गई थी। वहाँ एक मुवक्किल/वादी (Litigant) अश्विनी निखिल पाटिल ने महिला वकील एडवोकेट काजल शेलके पर हमला कर दिया था।
  • सुरक्षा खामियां उजागर: इस हमले ने कोर्ट परिसरों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
  • पुलिस चौकी का प्रस्ताव: कोर्ट की कड़ाई के बाद अब राज्य सरकार ने कोल्हापुर कोर्ट परिसर में एक समर्पित पुलिस चौकी (Police Chowki) बनाने का प्रस्ताव दिया है और पुलिस की तैनाती बढ़ा दी गई है।
  • अवमानना का मामला बंद: कोर्ट ने हमलावर महिला के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का मामला शुरू किया था, जिसे महिला द्वारा बिना शर्त माफी (Unconditional Apology) मांगने के बाद 6 मई को बंद कर दिया गया।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य पहलूबॉम्बे हाई कोर्ट की कार्यवाही का विवरण
मामलाकोल्हापुर जिला बार एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य।
अन्य राज्यों की नजीरकोर्ट ने नोट किया कि कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों ने वकीलों की सुरक्षा के लिए पहले ही कड़े कानून पारित किए हैं।
अगली सुनवाई18 जून 2026 (गर्मी की छुट्टियों के बाद विस्तृत सुनवाई)।
मुख्य विचारणीय बिंदुक्या कानून बनने तक वकीलों को स्वतंत्र और निर्भीक माहौल देने के लिए ‘अदालती गाइडलाइंस’ लागू की जानी चाहिए?

निर्भीक न्याय प्रणाली के लिए वकीलों की सुरक्षा जरूरी

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह रुख साफ करता है कि न्याय के पहियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए वकीलों का बिना किसी डर, धमकी या उत्पीड़न के काम करना आवश्यक है। यदि वकील ही अदालत परिसरों में सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो वे आम नागरिकों के अधिकारों की पैरवी मजबूती से नहीं कर पाएंगे। 18 जून 2026 को होने वाली सुनवाई यह तय करेगी कि महाराष्ट्र में कर्नाटक और तेलंगाना की तर्ज पर वकीलों को तत्काल सुरक्षा कवच मिलता है या नहीं।

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