Tuesday, August 25, 2026
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Complaint Case: मजिस्ट्रेट पुलिस को एफआईआर (FIR) दर्ज करने का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं…इस कानूनी स्पष्टीकरण को ध्यान दें सभी

Complaint Case: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत मजिस्ट्रेट के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा कानूनी स्पष्टीकरण दिया है।

यूपी के CJM गोंडा के आदेश को हाईकोर्ट में दी गई थी चुनौती

हाईकोर्ट के जस्टिस बृज राज सिंह की एकल पीठ ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), गोंडा के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए यह कानूनी व्यवस्था दी। अदालत ने फैसला सुनाया है कि धारा 175(3) BNSS (जो पहले सीआरपीसी की धारा 156(3) थी) के तहत दिए गए हर आवेदन पर मजिस्ट्रेट पुलिस को एफआईआर (FIR) दर्ज करने का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपों की प्रकृति ऐसी है जहां शिकायतकर्ता के पास खुद सारे तथ्य और सबूत मौजूद हैं और किसी विशेष पुलिस जांच की आवश्यकता नहीं है, तो मजिस्ट्रेट विवेक का इस्तेमाल करते हुए उस मामले को ‘परिवाद’ या शिकायत मामले (Complaint Case) के रूप में मानकर खुद सुनवाई कर सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  • पीड़िता का आरोप: याचिकाकर्ता (महिला) का आरोप था कि जब वह अपने कृषि क्षेत्र (खेत) से लौट रही थी, तब आरोपियों ने उसे पकड़ लिया, गन्ने के खेत में खींचने का प्रयास किया और विरोध करने पर उसके साथ मारपीट और छेड़छाड़ की।
  • पुलिस द्वारा सुनवाई न होना: महिला ने घटना के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस और बाद में उच्च पुलिस अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई। इसके बाद उसने धारा 175(3) BNSS के तहत सीजेएम (CJM) कोर्ट में एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देने के लिए आवेदन किया।
  • मजिस्ट्रेट का फैसला: सीजेएम, गोंडा ने 20 मार्च 2026 को दिए अपने आदेश में पुलिस को एफआईआर का आदेश देने के बजाय, इस आवेदन को एक शिकायत मामले (Complaint Case) के रूप में स्वीकार कर लिया और पीड़िता व गवाहों के बयान दर्ज करने की तारीख तय कर दी। पीड़िता ने इसी आदेश को “ललिता कुमारी” केस का उल्लंघन बताते हुए हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

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हाई कोर्ट की मुख्य कानूनी टिप्पणियां और मजिस्ट्रेट के 4 विकल्प

ललिता कुमारी का फैसला केवल पुलिस पर लागू होता है, मजिस्ट्रेट पर नहीं: याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) फैसले के अनुसार, यदि संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence – विशेषकर यौन उत्पीड़न) का खुलासा होता है, तो एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ललिता कुमारी का फैसला धारा 154 CrPC (अब धारा 173 BNSS) के तहत ‘पुलिस’ के वैधानिक कर्तव्य के लिए है। यह फैसला धारा 175(3) BNSS के तहत ‘मजिस्ट्रेट’ के न्यायिक विवेक (Judicial Discretion) को खत्म नहीं करता।

मजिस्ट्रेट के पास उपलब्ध 4 कानूनी विकल्प: जस्टिस बृज राज सिंह ने सुखवासी बनाम यूपी राज्य (2007), कैलाश विजयवर्गीय (2023) और हालिया ओम प्रकाश अम्बाडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) जैसे निर्णयों का हवाला देते हुए मजिस्ट्रेट के अधिकारों को चार बिंदुओं में संक्षेप में समझाया:

  • विकल्प I: यदि प्रथम दृष्टया मामला गंभीर लगता है, तो पुलिस को सीधे FIR दर्ज करने का आदेश देना।
  • विकल्प II: आवेदन को शिकायत मामले (Complaint Case) के रूप में मानना और खुद गवाहों के बयान दर्ज कर प्रक्रिया आगे बढ़ाना।
  • विकल्प III (जब पुलिस जांच जरूरी हो): यदि सबूत इस प्रकृति के हैं जिन्हें केवल पुलिस ही गहन जांच (Thorough Investigation) के जरिए जुटा सकती है (जैसे सीसीटीवी फुटेज, वैज्ञानिक साक्ष्य या कॉल रिकॉर्ड), तो मजिस्ट्रेट को अनिवार्य रूप से FIR का आदेश देना चाहिए। XYZ बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2023) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि यौन अपराधों में जहां पीड़िता पहले से ही डरी हुई हो, वहां अदालतों को उस पर सबूत जुटाने का अतिरिक्त बोझ नहीं डालना चाहिए और पुलिस से जांच करानी चाहिए।
  • विकल्प IV (जब पुलिस जांच जरूरी न हो): यदि शिकायतकर्ता के पास मामले की पूरी जानकारी, गवाह और दस्तावेजी सबूत पहले से मौजूद हैं और किसी पुलिस जांच की जरूरत नहीं है, तो मजिस्ट्रेट शिकायत प्रक्रिया का पालन कर सकता है।

वर्तमान मामले में अदालत का अंतिम निर्णय

हाई कोर्ट ने गोंडा के सीजेएम द्वारा पारित आदेश को पूरी तरह सही और कानूनी माना। अदालत ने कहा, इस मामले की शिकायत को देखने से पता चलता है कि इसमें ऐसा कोई तकनीकी या छुपा हुआ सबूत नहीं है, जिसके लिए पुलिस जांच की अनिवार्य आवश्यकता हो। शिकायतकर्ता खुद गवाहों के माध्यम से कोर्ट में अपनी बात साबित कर सकती है। इसलिए मजिस्ट्रेट ने अपने न्यायिक विवेक का सही इस्तेमाल किया है। इस निष्कर्ष के साथ हाई कोर्ट ने महिला की आवेदन याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही, इस कानूनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए हाई कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे इस फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश की सभी अधीनस्थ अदालतों (Subordinate Courts) में जिला न्यायाधीशों के माध्यम से प्रसारित (Circulate) करें ताकि भविष्य में कानून का समान रूप से पालन हो सके।

केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)

कानूनी बिंदुहाई कोर्ट का दिशा-निर्देश
सुनवाई करने वाले न्यायाधीशजस्टिस बृज राज सिंह (Single Bench)
केंद्रीय कानूनधारा 175(3) BNSS (पुरानी धारा 156(3) CrPC)
मूल सिद्धांतसंज्ञेय अपराध का दावा होने मात्र से मजिस्ट्रेट यांत्रिक रूप से (Mechanically) FIR का आदेश देने को बाध्य नहीं है।
अंतिम आदेशसीजेएम, गोंडा का आदेश बहाल; याचिका खारिज।

निष्कर्ष (Takeaway)

यह फैसला नए कानून (BNSS) के तहत मजिस्ट्रेटों की न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए बेहद अहम है। अदालत ने साफ किया है कि धारा 175(3) का इस्तेमाल पुलिस पर दबाव बनाने के शॉर्टकट के रूप में नहीं होना चाहिए। अगर मामला सीधा और गवाहों पर आधारित है, तो शिकायत मामले (Complaint Case) के जरिए भी त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है।

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