DHCBA STRIKE: दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा काम का बहिष्कार (हड़ताल) करने के फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई है।
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने तब की, जब सोमवार को अदालत की कार्यवाही शुरू होते ही वकील हड़ताल पर थे और उनकी जगह केवल प्रॉक्सी काउंसिल (स्थानापन्न वकील) पेश हो रहे थे। अदालत ने बेहद सख्त लहजे में वकीलों को उनके मूल कर्तव्य की याद दिलाते हुए कहा कि आपको वादकारियों (Litigants/मुकदमेबाजों) के लिए काम करना होगा। अदालत से दूरी बनाना सही नहीं है। यह विवाद दिल्ली की विभिन्न अदालतों के ‘आर्थिक क्षेत्राधिकार’ (Pecuniary Jurisdiction) को बढ़ाने के एक प्रस्ताव से जुड़ा है।
पूरा विवाद क्या है? (The Core Dispute)
प्रस्ताव क्या है?: दिल्ली की सभी जिला अदालतों (District Courts) की आर्थिक सुनवाई सीमा को मौजूदा 2 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपये करने की मांग की जा रही है।
समर्थन और विरोध: जिला अदालतों के वकील (समर्थन में): ऑल जिला कोर्ट बार एसोसिएशन की समन्वय समिति ने मई 2025 में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर यह मांग की थी। उनका तर्क है कि 2015 के बाद से बढ़ती महंगाई और संपत्ति की कीमतों के कारण 2 करोड़ की सीमा पुरानी हो चुकी है। जिला अदालतें जनता के अधिक करीब और कम खर्चीली हैं।
हाई कोर्ट के वकील (विरोध में): दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) इस बदलाव का कड़ा विरोध कर रही है। उनका मानना है कि जटिल और हाई-स्टेक (बड़े) कमर्शियल मामलों की सुनवाई हाई कोर्ट की विशिष्ट बेंचों में ही होनी चाहिए। डीएचसीबीए का यह भी तर्क है कि हाई कोर्ट को इस विषय पर विचार करने के लिए आंतरिक जजों की समिति बनाने का अधिकार नहीं है, क्योंकि क्षेत्राधिकार बदलना केवल संसद या विधायी दायरे का काम है।
अदालत की मुख्य और तीखी टिप्पणियां
जब जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने एक प्रॉक्सी काउंसिल से पूछा कि हड़ताल किस बात को लेकर है, तो वकील ने बताया कि बार एसोसिएशन जिला अदालतों का क्षेत्राधिकार बढ़ाने के प्रस्ताव का विरोध कर रही है। इस पर न्यायाधीश ने कहा, आप अदालती काम से खुद को कैसे अलग रख सकते हैं? अगर वकील पेश नहीं होंगे, तो नुकसान किसका होगा? अंततः वादकारी (litigants) ही पीड़ित होते हैं। यदि आपकी कोई शिकायत या विरोध है, तो उसे उचित तंत्र के माध्यम से एक सही मंच (Appropriate Forum) पर रखा जाना चाहिए, न कि कोर्ट का काम रोककर। वादकारियों को नुकसान भुगतना पड़ता है।
बिना निर्देश के पेश होने वाले ‘प्रॉक्सी वकीलों’ पर सवाल
अदालत ने उन प्रॉक्सी वकीलों को भी आड़े हाथों लिया जो मुख्य वकीलों की जगह केवल कोर्ट से तारीख (Adjournment) मांगने के लिए खड़े हो रहे थे। जस्टिस कौरव ने कहा, जब आपके पास मामले को लेकर कोई स्पष्ट निर्देश (Instructions) ही नहीं हैं, तो आप अदालत की सहायता कैसे कर सकते हैं? वैसे भी ग्रीष्मकालीन अवकाश (Vacations) शुरू होने से पहले हमारे पास काम के बहुत कम दिन बचे हैं।
मामले की मौजूदा स्थिति (Current Status)
जजों की समिति गठित: जिला अदालतों की मांग के बाद, दिल्ली हाई कोर्ट ने सितंबर 2025 में सभी हितधारकों (Stakeholders) से बात करने और इस मुद्दे का अध्ययन करने के लिए 6 वरिष्ठ न्यायाधीशों की एक समिति (जिसमें जस्टिस वी. कामेश्वर राव, प्रतिबा एम. सिंह और नवीन चावला शामिल हैं) का गठन किया था।
गतिरोध जारी: हाई कोर्ट की जजों की समिति ने जनवरी 2026 में इस विषय पर चर्चा के लिए प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया था। लेकिन डीएचसीबीए इस प्रक्रिया को पूरी तरह रोकने (Abeyance में रखने) की मांग पर अड़ी है और इसी के विरोध में आज (सोमवार) काम का बहिष्कार किया गया।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| बिंदु | विवरण |
| सुनवाई करने वाले न्यायाधीश | जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव (Delhi HC) |
| हड़ताल का कारण | जिला अदालतों का आर्थिक दायरा ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹20 करोड़ करने के प्रस्ताव का विरोध। |
| अदालत का स्पष्ट रुख | वकील केवल वादकारियों (Litigants) के लिए हैं; हड़ताल के जरिए अदालती कार्यवाही रोकना पूरी तरह अनुचित है। |
| पिछला संशोधन | दिल्ली में आखिरी बार साल 2015 में जिला अदालतों का दायरा ₹20 लाख से बढ़ाकर ₹2 करोड़ किया गया था। |
निष्कर्ष (Takeaway)
हाई कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने फैसलों की याद दिलाती है जिसमें कहा गया था कि वकीलों को हड़ताल पर जाने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि इससे ‘त्वरित न्याय’ के नागरिकों के मौलिक अधिकार का हनन होता है। यह टकराव दिल्ली हाई कोर्ट के वकीलों और निचली अदालतों के वकीलों के बीच काम के बंटवारे को लेकर चल रही वर्चस्व की लड़ाई को भी दर्शाता है, जिसमें अंततः आम जनता ही पिसती है।

