Thursday, July 16, 2026
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In-laws Case: ससुराल वालों का विवाद में बहू को यह कहना…किसी तरह एडजस्ट कर लो, कोई आपराधिक कृत्य नहीं, घरेलू हिंसा का यह केस अहम, पढ़ें

In-laws Case: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पति के रिश्तेदारों (ससुराल पक्ष) के खिलाफ दर्ज होने वाले मुकदमों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक फैसला सुनाया है।

लड़की के ससुराल वालों पर केस दर्ज को किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने 25 मई 2026 को यह अहम फैसला सुनाते हुए लड़की के ससुराल वालों (In-laws) के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) और घरेलू हिंसा (DV Act) के मामले को पूरी तरह से रद्द (Quash) कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (ग्वालियर बेंच) के उस पुराने आदेश को पलट दिया, जिसने कार्यवाही रोकने से इनकार कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ससुराल वालों द्वारा बहू को केवल ‘माहौल में ढलने’ या ‘एडजस्ट (Adjust) करने’ की सलाह देना कोई आपराधिक कृत्य नहीं है और केवल इतने भर के लिए उन पर घरेलू हिंसा या दहेज प्रताड़ना का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

मामला क्या था? (Background of the Dispute)

शादी और आरोप: इस मामले में जोड़े की शादी नवंबर 2019 में हुई थी। जनवरी 2023 में पत्नी ने मध्य प्रदेश के गुना में अपने पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ IPC की धारा 498A (घरेलू क्रूरता), धारा 34 और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराई।

शिकायत की प्रकृति: पत्नी का आरोप था कि शादी में भारी दहेज दिया गया था, लेकिन बाद में अतिरिक्त पैसों के लिए उसे प्रताड़ित किया गया। उसने घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) के तहत भी मामला दर्ज कराया, जिसमें मानसिक उत्पीड़न, छिपे हुए कैमरों से निगरानी (Surveillance) और हथियार से डराने जैसे आरोप लगाए गए थे।

ससुराल वालों की भूमिका: याचिकाकर्ता (ससुराल वालों) का कहना था कि उनके खिलाफ कोई सीधा या विशिष्ट आरोप नहीं है। मुख्य आरोप यह था कि वे पति का साथ देते थे, विवाद में बीच-बचाव नहीं करते थे और लड़की को ही ‘एडजस्ट’ करने को कहते थे।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणियां

चिंता: जस्टिस कोटिश्वर सिंह द्वारा लिखे गए इस फैसले में अदालत ने वैवाहिक विवादों में पूरे परिवार को घसीटने की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की और कुछ बुनियादी कानूनी सिद्धांत तय किए।

एडजस्ट’ करने की सलाह देना अपराध नहीं: अदालत ने याचिकाकर्ता के पक्ष में अपील स्वीकार करते हुए कहा, याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आरोप पूरी तरह से सामान्य और अस्पष्ट हैं। शिकायत में ऐसा कोई विशिष्ट या सीधा कृत्य नहीं बताया गया है जिसे घरेलू हिंसा या शारीरिक-मानसिक शोषण का रूप दिया जा सके। उनके खिलाफ मुख्य आरोप यह है कि उन्होंने पति का समर्थन किया या शिकायतकर्ता को स्थिति के अनुसार तालमेल बिठाने (Adjust) को कहा। बिना किसी ठोस तथ्य के ऐसे सामान्य और व्यापक आरोपों के आधार पर रिश्तेदारों के खिलाफ मुकदमा चलाना न्यायसंगत नहीं है।

नैतिक रूप से गलत होना, कानूनी रूप से अपराध नहीं: अदालत ने एक बहुत बारीक लेकिन महत्वपूर्ण अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा, ऐसी स्थितियां हो सकती हैं जहां परिवार के कुछ सदस्य केवल मूकदर्शक बने रहें या शिकायतकर्ता की मदद के लिए आगे न आएं। ऐसा आचरण नैतिक रूप से संदिग्ध (Morally Questionable) हो सकता है, लेकिन इसे तब तक आपराधिक संलिप्तता (Criminal Culpability) नहीं माना जा सकता, जब तक कि परिस्थितियों से अपराध में उनकी सक्रिय भागीदारी साबित न हो।

प्रत्येक आरोपी के खिलाफ विशिष्ट आरोप होना अनिवार्य: शीर्ष अदालत ने साफ किया कि वैवाहिक विवादों से जुड़े मुकदमों को आगे बढ़ाने के लिए प्रत्येक आरोपी के खिलाफ आरोप विशिष्ट, अलग और प्रथम दृष्टया (Prima Facie) ठोस सबूतों पर आधारित होने चाहिए। पीड़ित के अधिकारों की रक्षा करना बेहद जरूरी है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि बिना किसी पुख्ता आधार के परिवार के हर सदस्य पर आपराधिक कानून का डंडा चला दिया जाए।

आपराधिक कानून व्यक्तिगत बदला लेने का हथियार नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को वैवाहिक मामलों में अधिक सतर्कता बरतने की हिदायत देते हुए कहा, यह अक्सर देखा जाता है कि जब वैवाहिक संबंध बिगड़ते हैं, तो गुस्से और कड़वाहट में आकर जीवनसाथी के पूरे परिवार को आपराधिक मुकदमेबाजी में खींच लिया जाता है। लेकिन, स्पष्ट और कानूनी रूप से टिकाऊ आरोपों के अभाव में आपराधिक कानून को व्यक्तिगत शिकायतें दूर करने या पारिवारिक हिसाब-किताब चुकता करने का साधन बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसलिए, अदालतों को रिश्तेदारों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने से पहले गहन न्यायिक संवीक्षा (Judicial Scrutiny) और अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

शादी टूटने के बाद केस का कोई औचित्य नहीं: अदालत ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ही सक्षम फैमिली कोर्ट द्वारा पति-पत्नी के बीच विवाह विच्छेद (Divorce) की डिक्री पारित की जा चुकी है, यानी उनकी शादी पहले ही कानूनी रूप से टूट चुकी है। ऐसी स्थिति में ससुराल वालों के खिलाफ घरेलू हिंसा (DV Act) के मामले को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि पत्नी अपने पति के खिलाफ कानूनी रूप से उचित कदम उठाने के लिए स्वतंत्र है।

केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)

कानूनी पैरामीटरविवरण
माननीय सुप्रीम कोर्ट बेंचजस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
फैसले की तारीख25 मई 2026
मूल धाराएंIPC की धारा 498A (क्रूरता) और घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act)
स्थापित कानूनी सिद्धांतरिश्तेदारों के खिलाफ सामान्य या ‘ओम्नीबस’ (Omnibus) आरोप मान्य नहीं; सक्रिय संलिप्तता के बिना केवल निष्क्रिय रहना अपराध नहीं।
कोर्ट का अंतिम आदेशससुराल वालों के खिलाफ चल रहे सभी आपराधिक मामले पूरी तरह रद्द (Quashed)

निष्कर्ष (Takeaway)

यह फैसला भारतीय न्यायपालिका द्वारा धारा 498A और घरेलू हिंसा कानूनों के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में एक और बड़ा और स्पष्ट संदेश है। कानून महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है, न कि पूरे ससुराल पक्ष को बिना वजह प्रताड़ित करने के लिए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मुकदमों में केवल “सब शामिल थे” जैसे सामान्य बयानों के आधार पर दूर के रिश्तेदारों या माता-पिता को जेल नहीं भेजा जा सकता। यह आदेश उन परिवारों के लिए एक बड़ी राहत है जो वैवाहिक कड़वाहट के कारण झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए मुकदमों का सामना कर रहे हैं।

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