IVF In Old Age: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने देश के प्रजनन कानूनों के तहत तय उम्र सीमा में ढील देते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है।
किसी भी संभावित नुकसान या चोट की पूरी जिम्मेदारी लेंगे
हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन बंसल की एकल पीठ ने 19 मई 2026 को यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने यह अनुमति तब दी जब याचिकाकर्ता दंपत्ति के वकील ने अदालत को आश्वस्त किया कि वे इस उपचार से महिला को होने वाले किसी भी संभावित नुकसान या चोट की पूरी जिम्मेदारी खुद लेते हुए एक शपथ-पत्र (Undertaking) दाखिल करेंगे। अदालत ने एक 51 वर्षीय महिला को आईवीएफ (In-Vitro Fertilisation – IVF) उपचार के जरिए दोबारा गर्भधारण करने की अनुमति दे दी है, भले ही देश का कानून इसकी इजाजत नहीं देता था।
विवाद और कानूनी बाधा: एआरटी एक्ट (ART Act) क्या कहता है?
भारत में सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (Assisted Reproductive Technology Act – ART Act) के तहत आईवीएफ (IVF) सेवाओं का लाभ उठाने के लिए एक सख्त आयु सीमा तय की गई है। इसमें महिला के लिए कानूनी उम्र सीमा: 21 से 50 वर्ष व पुरुष के लिए कानूनी उम्र सीमा: 21 से 55 वर्ष है।
मामले की पृष्ठभूमि (The Background)
याचिकाकर्ता दंपत्ति ने साल 2023 में आईवीएफ (IVF) उपचार लिया था, जिसके बाद महिला ने जुड़वां बच्चों को गर्भ में धारण किया। हालांकि, गर्भावस्था के दौरान एक भ्रूण जीवित नहीं रह सका, लेकिन महिला ने एक स्वस्थ बेटी को जन्म दिया। अब यह दंपत्ति दूसरा बच्चा चाहता था। वर्तमान में पति की उम्र 54 वर्ष और पत्नी की उम्र 51 वर्ष है। जब वे फर्टिलिटी सेंटर गए, तो डॉक्टरों ने कानूनन महिला की उम्र 50 पार होने के कारण उनका इलाज करने से मना कर दिया, जिसके बाद दंपत्ति ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाई कोर्ट की दलीलें और फैसला
- सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के समक्ष मुख्य बिंदु रखे।
- महिला पूरी तरह स्वस्थ है: हालांकि महिला की उम्र 51 वर्ष (कानूनी सीमा से एक वर्ष अधिक) है, लेकिन वह शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ है और उसे कोई गंभीर बीमारी (Medical Condition) नहीं है जो उसे दूसरे बच्चे को जन्म देने से रोके।
- समान कानूनी मिसाल: वकील ने दलील दी कि ऐसा ही एक मामला पहले भी हाई कोर्ट द्वारा निपटाया जा चुका है, इसलिए यह मामला पूरी तरह से कानूनी मिसालों से कवर्ड है।
- केंद्र सरकार का रुख: केंद्र सरकार (Union of India) के वकील ने भी पिछली मिसालों की प्रासंगिकता पर कोई आपत्ति नहीं जताई। हालांकि, उन्होंने सुझाव दिया कि दंपत्ति को स्वास्थ्य और सुरक्षा जोखिमों की जिम्मेदारी लेते हुए सक्षम प्राधिकारी के सामने एक अंडरटेकिंग (शपथ-पत्र) देना चाहिए।
अदालत का अंतिम आदेश
हाई कोर्ट ने इस शर्त को स्वीकार करते हुए दंपत्ति की याचिका मंजूर कर ली। कोर्ट ने आदेश दिया। कहा, याचिकाकर्ता सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपनी जिम्मेदारी का शपथ-पत्र प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद प्रतिवादी नंबर 7 (फर्टिलिटी सेंटर) महिला का आगे का आईवीएफ उपचार शुरू करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होगा।”
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| हाई कोर्ट बेंच | जस्टिस जगमोहन बंसल (पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय) |
| फैसले की तारीख | 19 मई 2026 |
| संबंधित कानून | सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) अधिनियम, 2021 की धारा 21(g) |
| कानूनी उम्र बनाम वास्तविक उम्र | कानूनन महिला की सीमा: 50 वर्ष | याचिकाकर्ता महिला की उम्र: 51 वर्ष। |
| अदालत का रुख | स्वतः जिम्मेदारी का शपथ-पत्र (Undertaking) देने की शर्त पर आईवीएफ उपचार की अनुमति। |
एक और मिसाल: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
पीठ: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के अलावा, हाल ही में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस अमितेन्द्र किशोर की पीठ ने भी 24 अप्रैल 2026 को उम्र सीमा से जुड़े एक ऐसे ही संवेदनशील मामले में पुरजोर फैसला सुनाया था।
मामला: एक दंपत्ति (महिला 49 वर्ष और पुरुष 55 वर्ष से अधिक) का इकलौता बच्चा साल 2022 में गुजर गया था। इस गहरे सदमे के कारण वे तुरंत दूसरा बच्चा प्लान नहीं कर पाए। जब वे आईवीएफ के लिए गए, तो क्लिनिक ने मना कर दिया क्योंकि पति कानून द्वारा तय 55 वर्ष की उम्र पार कर चुका था (हालांकि पत्नी 50 से कम उम्र की थी)।
कोर्ट की मानवीय व्याख्या: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कानून की मानवीय और उद्देश्यपूर्ण व्याख्या (Purposive Interpretation) करते हुए कहा कि एआरटी एक्ट, 2021 एक कल्याणकारी और विनियामक कानून है, जिसका उद्देश्य नैतिक तकनीकों तक पहुंच को सुगम बनाना है, न कि नागरिकों के सामने अनुचित बाधाएं खड़ी करना।
कोर्ट की टिप्पणी: अदालत ने माना कि दंपत्ति ने एक अपूरणीय व्यक्तिगत क्षति झेली है और इलाज में देरी पूरी तरह से जायज थी। कोर्ट ने कहा कि “उपचार से इनकार करना उनके माता-पिता बनने के संवैधानिक अधिकार से हमेशा के लिए वंचित (Permanent Deprivation) करने जैसा होगा।” इसलिए कोर्ट ने असाधारण परिस्थितियों के तहत इलाज की मंजूरी दी।
निष्कर्ष (Takeaway)
ये दोनों न्यायिक फैसले (पंजाब व हरियाणा और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट) यह रेखांकित करते हैं कि भारतीय अदालतें अब जैविक और प्रजनन अधिकारों (Reproductive Rights) को नागरिक के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 21) के चश्मे से देख रही हैं। यद्यपि एआरटी कानून में उम्र की सीमाएं चिकित्सा सुरक्षा के लिए तय की गई हैं, लेकिन अदालतें असाधारण, वैध और मानवीय परिस्थितियों (जैसे संतान का खो जाना या शारीरिक रूप से फिट होना) में इन सीमाओं को शिथिल कर सकती हैं। यह फैसला उन दंपत्तियों के लिए एक नई उम्मीद है जो मामूली उम्र सीमा पार कर जाने के कारण माता-पिता बनने के सुख से वंचित हो रहे थे।

