Scientist Carrier: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देश के हित में समुद्र में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक मिशन को पूरा करने वाले एक सरकारी वैज्ञानिक के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने आदेश पारित करते हुए सरकारी नौकरशाही के अड़ियल रवैये पर बेहद तीखी टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अरब सागर (Arabian Sea) में देश के लिए आधिकारिक ड्यूटी पर तैनात किसी अधिकारी को नए विभाग में देर से ज्वाइन करने के लिए दंडित नहीं किया जा सकता। अदालत ने केंद्र सरकार की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें एक वैज्ञानिक को उसके नए विभाग में केवल 39 दिन की सेवा कम होने के आधार पर पदोन्नति (Promotion) देने से इनकार कर दिया गया था।
मामला क्या था? (अरब सागर में इकलौता केमिस्ट)
- यह कहानी वैज्ञानिक परिमल बनर्जी की है, जो 24 जुलाई 2009 से भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India – GSI) में कार्यरत थे।
- नई नौकरी और संकट: 11 अगस्त 2010 को सीधी भर्ती के माध्यम से केंद्र सरकार के तहत उनका चयन ‘केमिकल एक्जामिनर ग्रेड-II’ (Chemical Examiner Grade-II) के पद पर हुआ। उन्हें शुरुआत में 10 सितंबर 2010 तक जॉइन करने को कहा गया।
- मिशन के लिए मांगी मोहलत: बनर्जी उस समय अरब सागर में जीएसआई के एक अत्यंत महत्वपूर्ण अपतटीय भूवैज्ञानिक मानचित्रण मिशन (Offshore Geological Mapping Mission – क्रूज़ SD-231) पर थे। वे उस पूरे जहाजी मिशन पर एकमात्र केमिस्ट थे, जिनका काम जहाज पर ही रासायनिक विश्लेषणात्मक परीक्षण करना था।
- नौकरी जॉइन करने में देरी: राष्ट्रीय महत्व के इस वैज्ञानिक मिशन को बीच में लावारिस नहीं छोड़ा जा सकता था, इसलिए बनर्जी ने कार्यभार संभालने के लिए समय बढ़ाने की मांग की। अधिकारियों ने उनकी जॉइनिंग की समय-सीमा पहले 31 अक्टूबर 2010 और फिर 10 फरवरी 2011 तक बढ़ा दी। मिशन पूरा होने के बाद जीएसआई ने उन्हें 7 फरवरी 2011 को कार्यमुक्त (Relieve) किया और उन्होंने दो दिन के भीतर 9 फरवरी 2011 को नए विभाग में जॉइन कर लिया।
विवाद: 39 दिनों का गणित और रुकी पदोन्नति
- विवाद तब शुरू हुआ जब वर्ष 2014-15 की रिक्तियों के लिए ‘केमिकल एक्जामिनर ग्रेड-II’ से ‘केमिकल एक्जामिनर ग्रेड-I’ के पद पर पदोन्नति पर विचार किया गया।
- नियम: भर्ती नियमों के अनुसार, पदोन्नति के लिए 5 वर्ष की नियमित सेवा अनिवार्य थी।
- प्रशासन का रुख: कार्मिक विभाग ने बनर्जी की सेवा की गणना 9 फरवरी 2011 (जॉइनिंग की तारीख) से की। इस गणना के अनुसार, पात्रता की अंतिम तिथि (Crucial Eligibility Date) तक उनकी सेवा में 39 दिन की कमी रह गई थी।
- अदालत की शरण: विभाग ने इस मामूली कमी को माफ (Relaxation) करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद बनर्जी ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) का दरवाजा खटखटाया।
कैट (CAT) का फैसला (2016)
अप्रैल 2016 में, कैट (CAT) की इलाहाबाद पीठ ने बनर्जी के पक्ष में फैसला सुनाया। न्यायाधिकरण ने कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के 1 सितंबर 1998 के एक आधिकारिक ज्ञापन (Office Memorandum) का हवाला दिया। यह नीति कहती है कि यदि कोई कर्मचारी जनहित में सीधी भर्ती के माध्यम से किसी अन्य सरकारी संगठन में शामिल होता है, तो पात्रता शर्तों को पूरा करने के लिए उसकी पिछली ग्रुप ए (Group A) सेवा की गणना की जा सकती है। इसके खिलाफ केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट में अपील की थी।
हाई कोर्ट की नौकरशाही को कड़ी फटकार
दलील: हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की दलीलों (जिसमें सरकार ने चेतावनी दी थी कि ऐसे फैसलों से प्रशासनिक ‘अराजकता’ फैल जाएगी) को पूरी तरह खारिज कर दिया।
मिशन को बीच में नहीं छोड़ सकते थे वैज्ञानिक: अदालत ने कहा, याचिकाकर्ता केवल दूसरे विभाग में जल्दी जॉइन करने के लिए अरब सागर में चल रहे एक महत्वपूर्ण सरकारी वैज्ञानिक मिशन को बीच में ही लावारिस (Abandon) नहीं छोड़ सकता था। जब कमी केवल 39 दिनों की थी, तो न्यायाधिकरण द्वारा राहत देना पूरी तरह न्यायोचित था।
कार्मिक विभाग के रवैये पर सवाल: अदालत ने हैरानी जताते हुए कहा कि यह मामला स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सरकारी संगठनों के कार्मिक विभाग अपने ही होनहार अधिकारियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। कोर्ट ने सवाल उठाया कि विभाग एक ऐसे अधिकारी के खिलाफ मुकदमा लड़ने में सरकारी ऊर्जा क्यों बर्बाद कर रहा है जो अरब सागर के बेहद कठिन अपतटीय मिशन पर देश की सेवा कर रहा था। कोर्ट ने यहां तक कहा कि विभाग “बाहरी या दुर्भावनापूर्ण कारणों” (Extraneous reasons) से काम करता हुआ प्रतीत हो रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों की संपुष्टि: हाई कोर्ट ने कैट के उस फैसले को सही ठहराया जो सुप्रीम कोर्ट के दो ऐतिहासिक फैसलों पर आधारित था, इसमें पहला
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वी. एन. भट और दूसरा केस साइंटिफिक एडवाइजर टू रक्षा मंत्री बनाम वी. एम. जोसेफ है। इन फैसलों के अनुसार, पदोन्नति के उद्देश्यों के लिए किसी कर्मचारी की पिछली ग्रुप ए सेवा को इस तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय उच्च न्यायालय बेंच | मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र (इलाहाबाद हाई कोर्ट) |
| फैसले की तारीख | 26 मई 2026 |
| वैज्ञानिक का नाम | परिमल बनर्जी (केमिस्ट, GSI / केमिकल एक्जामिनर) |
| विवाद का कारण | पदोन्नति के लिए अनिवार्य 5 वर्ष की सेवा में 39 दिन की कमी (आधिकारिक मिशन पर रहने के कारण)। |
| प्रासंगिक नीति | DoPT का 1998 का ऑफिस मेमोरेंडम (पिछली ग्रुप ए सेवा की गणना की अनुमति)। |
| अदालत का अंतिम आदेश | केंद्र सरकार की रिट याचिका खारिज; वैज्ञानिक की पदोन्नति सुरक्षित। |
निष्कर्ष (Takeaway)
मुकदमे की पेंडेंसी (लंबित रहने) के दौरान, कैट के आदेश के अनुपालन में परिमल बनर्जी को पहले ही प्रोमोट कर दिया गया था, लेकिन वह प्रमोशन इस रिट याचिका के अंतिम फैसले के अधीन था। हाई कोर्ट के इस संवेदनशील फैसले के बाद अब उनकी पदोन्नति पूरी तरह सुरक्षित हो गई है। यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि नियमों की लकीर पीटकर देश के प्रति समर्पित वैज्ञानिकों और अधिकारियों के मनोबल को नहीं तोड़ा जा सकता; प्रशासनिक नियमों की व्याख्या हमेशा ‘लोकहित’ और ‘व्यावहारिक परिस्थितियों’ को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए।

