Criminal Contempt: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अदालती कार्यवाही में बाधा डालने और बिना किसी न्यायिक आदेश के एक बलात्कार पीड़िता को जबरन अदालत कक्ष में पेश करने पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है।
दो पुलिस अफसरों पर आपराधिक अवमानना की कार्यवाही
हाईकोर्ट के जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने 25 मई 2026 को यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने इस बात पर गहरी “हैरानी” जताई कि जब अदालत मामले में अपना आदेश लिखवा रही थी, तब पुलिस ने बिना किसी समन या निर्देश के पीड़िता को अदालत कक्ष में खड़ा कर दिया। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इसे अदालत की अवमानना और कार्यवाही को बाधित करने की सोची-समझी साजिश मानते हुए दो पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया है।
मामला क्या था? (The Unprecedented Drama in Court)
यह मामला एक एफआईआर (FIR) से जुड़ा है जिसमें एक महिला के अपहरण, सामूहिक बलात्कार (Gang Rape) और उसका अश्लील वीडियो रिकॉर्ड करने के गंभीर आरोप हैं। मामले के मुख्य आरोपी (दूसरे याचिकाकर्ता) और उसके पिता ने इस एफआईआर को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
अदालत कक्ष में क्या हुआ?
अचानक एंट्री: जब हाई कोर्ट की पीठ इस मामले में अपना फैसला लिखवा (Dictate) रही थी, तभी अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता (AGA) ने कोर्ट को बताया कि पीड़िता एक सब-इस्पेक्टर के साथ कोर्ट रूम में मौजूद है।
हंगामा और व्यवधान: बिना किसी आदेश के बुलाई गई पीड़िता अचानक पब्लिक गैलरी से “चीखने-चिल्लाने और रोने” लगी और जज से बात करने की जिद करने लगी। जब उसे आगे बुलाया गया, तो उसने कोर्ट के सामने नखरे (T tantrums) दिखाए, जिससे अदालत की कार्यवाही पूरी तरह ठप हो गई।
पुलिसकर्मी का गायब होना: पीड़िता को कोर्ट लाने वाला सब-इंस्पेक्टर हंगामा शुरू होते ही पहले तो कोर्ट रूम से गायब हो गया। बाद में जब उससे पूछताछ की गई, तो उसने दावा किया कि उसे “उच्च अधिकारियों” (Higher-ups) ने पीड़िता को कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया था ताकि “अदालत को इस मामले का सच पता चल सके।”
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी और निर्देश
आरोप: खंडपीठ ने माना कि यह सब अनायास नहीं हुआ, बल्कि संबंधित थाना प्रभारी (SHO) और सब-इंस्पेक्टर के इशारे पर अदालत की कार्यवाही को जानबूझकर बाधित करने के उद्देश्य से किया गया था।
पुलिस अधिकारियों का आचरण निंदनीय: कोर्ट ने कहा कि बिना किसी न्यायिक आदेश या समन के किसी संवेदनशील मामले की पीड़िता को इस तरह अदालत में लाकर खड़ा करना और माहौल खराब करना प्रथम दृष्टया (Prima Facie) अदालत की घोर अवमानना है।
आपराधिक अवमानना का मामला दर्ज: हाई कोर्ट ने दोनों पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एक अलग आपराधिक अवमानना का मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया है और मामले को संबंधित बेंच के पास भेज दिया है जो अवमानना के मामलों की सुनवाई करती है।
मूल मामले में कोर्ट का फैसला: अदालत ने नोट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 183 (जो मजिस्ट्रेट के सामने पीड़ित/गवाह के बयान से संबंधित है – पूर्व में CrPC की धारा 164) के तहत पीड़िता ने जो बयान दर्ज कराया था, उसमें आरोप मुख्य रूप से केवल दूसरे याचिकाकर्ता (बेटे) के खिलाफ थे, उसके पिता के खिलाफ नहीं। इसलिए कोर्ट ने मुख्य आरोपी (बेटे) के खिलाफ दर्ज एफआईआर में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। सह-याचिकाकर्ता (पिता) की याचिका को स्वीकार करते हुए, उन्हें अगली सुनवाई तक गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण (Protection from Arrest) प्रदान कर दिया।
एक अन्य मामला: बंदूक से डराने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनाई जेल की सजा
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस मामले के साथ ही दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की पीठ द्वारा 29 अक्टूबर 2025 को दिए गए अवमानना के एक अन्य कड़े फैसले का भी संदर्भ सामने आया है।
मामला: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति के कार्यालय के निरीक्षण के लिए एक ‘कोर्ट कमिश्नर’ (अदालत द्वारा नियुक्त अधिकारी) को नियुक्त किया था। निरीक्षण के दौरान उस व्यक्ति ने कोर्ट कमिश्नर को डराने के उद्देश्य से उनके सामने मेज पर एक बंदूक (Gun) रख दी थी।
अदालत का फैसला: दिल्ली हाई कोर्ट ने इस कृत्य को न्याय प्रशासन में सीधा और गंभीर हस्तक्षेप माना। कोर्ट ने अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12 के तहत दोषी को एक महीने के साधारण कारावास और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
कानूनी प्रावधान: धारा 12 के तहत अदालत की अवमानना के लिए अधिकतम 6 महीने की जेल या 2,000 रुपये जुर्माना (या दोनों) का प्रावधान है। हालांकि, यदि आरोपी बिना शर्त और पूरी ईमानदारी (Bona fide) से अदालत से माफी मांगता है, तो कोर्ट उसे बरी भी कर सकता है, लेकिन इस मामले में कोर्ट ने नरमी नहीं दिखाई।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय उच्च न्यायालय बेंच | जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना (इलाहाबाद हाई कोर्ट) |
| आदेश की तारीख | 25 मई 2026 |
| कार्रवाई का कारण | बिना अदालती आदेश के बलात्कार पीड़िता को कोर्ट में पेश करना और कार्यवाही बाधित करना। |
| संबंधित कानून | न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 और BNSS, 2023 की धारा 183 |
| अदालत का अंतिम निर्देश | संबंधित SHO और सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ आपराधिक अवमानना का केस दर्ज करने का आदेश। |
निष्कर्ष (Takeaway)
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह कदम प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस बल के लिए एक कड़ा संदेश है। कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदार पुलिस खुद कानून की सीमाओं को नहीं लांघ सकती। जजों को प्रभावित करने या अदालती कार्यवाही पर दबाव बनाने के लिए पीड़ितों को “मोहरे” की तरह इस्तेमाल करने की अनुमति किसी भी जांच एजेंसी को नहीं दी जा सकती। न्यायपालिका की गरिमा और उसकी स्वतंत्र प्रक्रिया को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अदालतें ऐसे अनुचित पुलिसिया तौर-तरीकों के खिलाफ हमेशा सख्त रुख अपनाएंगी।

