Friday, October 16, 2026
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The Picket Duty: एक पुलिसकर्मी का पैर कटना उसकी पूरी कार्यशैली को प्रभावित करता है…दिल्ली पुलिस कांस्टेबल की मुआवजे वाली कहानी को पढ़िए

The Picket Duty: दिल्ली हाई कोर्ट ने ऑन-ड्यूटी दुर्घटना में अपना पैर गंवाने वाले दिल्ली पुलिस के एक हेड कांस्टेबल के पक्ष में मानवीय और न्यायसंगत फैसला सुनाया है।

पैर कटने के बाद भी कांस्टेबल की नौकरी का मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस अनीश दयाल की एकल पीठ ने 19 मई 2026 को दिए अपने आदेश में मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) द्वारा तय की गई 70% फंक्शनल डिसेबिलिटी (कार्यात्मक विकलांगता) को बरकरार रखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारी के काम की प्रकृति को किसी सामान्य डेस्क जॉब (Sedentary Occupation) के बराबर नहीं आंका जा सकता। अदालत ने बीमा कंपनी की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि पैर कटने के बाद भी कांस्टेबल की नौकरी (डेस्क जॉब) सुरक्षित रहने के कारण उसे भविष्य की आय का नुकसान नहीं हुआ है।

घटना और विवाद की पृष्ठभूमि (The Picket Duty Accident)

ड्यूटी के दौरान हादसा: यह मामला 19 जनवरी 2014 की रात का है। दिल्ली पुलिस के 54 वर्षीय हेड कांस्टेबल गीता कॉलोनी की तरफ सड़क पर बैरिकेड्स लगाकर वाहनों की चेकिंग (पिकेट ड्यूटी) कर रहे थे। इसी दौरान एक तेज रफ्तार हुंडई i-10 कार आई। कांस्टेबल ने उसे रुकने का इशारा किया, लेकिन ड्राइवर ने गाड़ी रोकने के बजाय सीधे बैरिकेड्स में दे मारी, जिसकी चपेट में कांस्टेबल आ गए।

पैर काटना पड़ा: हादसे में उनके दाहिने पैर में गंभीर चोटें (Crush Injuries) और कई फ्रैक्चर आए। एलएनजेपी (LNJP) और मैक्स अस्पताल में इलाज के दौरान संक्रमण फैलने से रोकने के लिए उनके दाहिने पैर को घुटने के नीचे से काटना (Below-knee Amputation) पड़ा। मेडिकल बोर्ड ने उन्हें 70% स्थायी शारीरिक विकलांगता का प्रमाण पत्र दिया।

ट्रिब्यूनल का आदेश: MACT ने पीड़िता को 41.66 लाख रुपये का मुआवजा (9% वार्षिक ब्याज के साथ) देने का आदेश दिया, जिसके खिलाफ बीमा कंपनी (HDFC जनरल इंश्योरेंस) ने हाई कोर्ट में अपील की थी।

बीमा कंपनी का तर्क: नौकरी तो बची हुई है

बीमा कंपनी के वकील (अधिवक्ता राजीव एम. रॉय) ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने शारीरिक विकलांगता को ही कार्यात्मक विकलांगता (Functional Disability) मानकर गलती की है। दुर्घटना के बाद भी पुलिसकर्मी की नौकरी नहीं छूटी है और न ही उनकी सैलरी में कोई कटौती की गई है। वे अभी भी विभाग में कार्यरत हैं, इसलिए उन्हें “भविष्य की आय के नुकसान” (Loss of Future Income) का मुआवजा नहीं मिलना चाहिए।

हाई कोर्ट की विधिक टिप्पणियां: डेस्क जॉब काफी नहीं

फील्ड ड्यूटी और डेस्क जॉब में बड़ा अंतर: जस्टिस अनीश दयाल ने बीमा कंपनी के तर्कों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के ‘राज कुमार बनाम अजय कुमार’ और ‘मोहम्मद सबीर बनाम यूपी एसआरटीसी’ मामलों के कानूनी सिद्धांतों का हवाला दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में गतिशीलता (Mobility), कानून व्यवस्था बनाए रखना और पिकेट पर घंटों खड़े रहकर वाहनों की चेकिंग करना अनिवार्य होता है। पैर कटने के कारण उनकी इस कार्यक्षमता पर गंभीर असर पड़ा है। भले ही दुर्घटना के बाद उन्हें विभाग में किसी डेस्क जॉब (ऑफिस के काम) पर बिठा दिया गया हो, लेकिन वे अपने सहकर्मियों की तुलना में हमेशा गंभीर रूप से नुकसान की स्थिति में रहेंगे। इससे उनकी सामान्य गतिशीलता प्रभावित होगी और भविष्य में पदोन्नति (Promotional Opportunities) के अवसर भी छिन जाएंगे।

कृत्रिम पैर (Prosthetic Limb) के लिए 3 रिप्लेसमेंट का खर्च: कोर्ट ने माना कि भले ही पीड़ित ने इसकी अलग से मांग न की हो, लेकिन एक ‘न्यायसंगत मुआवजा’ (Just Compensation) देना अदालत का कर्तव्य है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, एक प्रोस्थेटिक पैर को हर 5 से 6 साल में बदलना पड़ता है। दुर्घटना के वक्त कर्मचारी की उम्र 54 साल थी। जीवन प्रत्याशा को 70 वर्ष मानते हुए उन्हें अगले 16 वर्षों तक प्रोस्थेटिक पैर की जरूरत होगी। इस आधार पर कोर्ट ने गणना की कि उन्हें कम से कम 3 बार प्रोस्थेटिक पैर बदलने का खर्च और उसका वार्षिक रखरखाव (Maintenance) मिलना चाहिए, जिसकी व्यवस्था ट्रिब्यूनल ने की थी।

मुआवजे की गणना और कानूनी सुधार (Legal Adjustments)

मल्टीप्लायर में बदलाव: हाई कोर्ट ने मुआवजे की गणना के विधिक फॉर्मूले (मल्टीप्लायर) में आंशिक संशोधन किया। ट्रिब्यूनल ने भविष्य की आय के नुकसान की गणना के लिए ’11’ का मल्टीप्लायर लगाया था। हाई कोर्ट ने ‘गोविंद सिंह मौनी’ केस के कानून का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि एक सरकारी या पब्लिक सेक्टर के कर्मचारी के मामले में (जो 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होगा), रिटायरमेंट के बाद की आय के नुकसान के लिए ‘9’ का मल्टीप्लायर लागू होना चाहिए।

फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स: कोर्ट ने 54 वर्ष की आयु को देखते हुए भविष्य की संभावनाओं (Future Prospects) के लिए 15% की बढ़ोतरी को सही ठहराया।

केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)

कानूनी पैरामीटरविवरण
माननीय उच्च न्यायालय बेंचजस्टिस अनीश दयाल (दिल्ली उच्च न्यायालय)
आदेश की तारीख19 मई 2026
पीड़ित का विवरण54 वर्षीय हेड कांस्टेबल, दिल्ली पुलिस (हादसा: 19 जनवरी 2014)
दुर्घटना का प्रकारपिकेट चेकिंग के दौरान तेज रफ्तार कार द्वारा बैरिकेड तोड़कर मारना।
कानूनी प्रावधानआईपीसी की धारा 279/338 (एफआईआर) और एमएक्ट के नियम।
अदालत का अंतिम निर्णयबीमा कंपनी की अपील खारिज; 70% कार्यात्मक विकलांगता और प्रोस्थेटिक रिप्लेसमेंट का खर्च बरकरार; मल्टीप्लायर को ’11’ से संशोधित कर ‘9’ किया गया।

निष्कर्ष (Takeaway)

यह फैसला देश सेवा में अग्रिम मोर्चे पर रहने वाले सुरक्षाकर्मियों के अधिकारों की रक्षा करता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ कर दिया कि केवल कागजी तौर पर नौकरी बचे रहने से किसी अंग को गंवाने वाले व्यक्ति के करियर और जीवन की क्षति की भरपाई नहीं हो जाती। एक पुलिसकर्मी का पैर कटना उसकी पूरी कार्यशैली को प्रभावित करता है, और बीमा कंपनियां तकनीकी बारीकियों के पीछे छिपकर उचित मुआवजा देने से बच नहीं सकतीं।

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