Monday, June 1, 2026
HomeScam NoseSuspicious Appointment: न्याय और सहानुभूति कभी भी कानून से ऊपर नहीं…फर्जीवाड़े से...

Suspicious Appointment: न्याय और सहानुभूति कभी भी कानून से ऊपर नहीं…फर्जीवाड़े से मिली थी यूपी में 4 शिक्षकों को नौकरी, देखिए यह फैसला

Suspicious Appointment: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जालसाजी और अवैध नियुक्तियों पर एक बेहद कड़ा और नीतिगत फैसला सुनाया है।

चार शिक्षकों द्वारा वेतन और सेवानिवृत्ति लाभों का मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि “फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हासिल की गई सार्वजनिक नियुक्तियां कानून की नज़र में शुरुआत से ही शून्य (Void ab initio) होती हैं। धोखाधड़ी हर पवित्र कार्य को दूषित कर देती है, जिससे लाभार्थी का सेवा या उससे जुड़े लाभों पर कोई अधिकार नहीं रह जाता। अदालत ने महाराजगंज जिले के एक जूनियर हाई स्कूल के चार शिक्षकों द्वारा वेतन और सेवानिवृत्ति लाभों (Retirement Benefits) की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया।

क्या था पूरा मामला? (Background of the Case)

नियुक्ति और रोक: यह विवाद महाराजगंज जिले के ‘जनता लघु माध्यमिक विद्यालय, सतगुर मुजुरी’ से जुड़ा है। साल 1996 में इस स्कूल में कई सहायक शिक्षकों (Assistant Teachers) की नियुक्ति की गई थी। इन शिक्षकों को अगस्त 2000 तक नियमित वेतन मिला, लेकिन नियुक्तियों की वैधता को लेकर शिकायतें मिलने के बाद इनका वेतन रोक दिया गया।

याचिकाकर्ता: कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले शिक्षकों में ब्रह्मदेव यादव, अनिरुद्ध यादव, अमर प्रकाश चंद्र और अन्य शामिल थे। इनमें से ब्रह्मदेव यादव और अनिरुद्ध यादव क्रमशः 2021 और 2022 में सेवानिवृत्त (Retire) भी हो चुके हैं।

अदालत को दस्तावेजों में मिलीं ये गंभीर विसंगतियां (Suspicious Documents)

पोस्टमास्टर को पत्र: सुनवाई के दौरान कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच की तो पाया कि नियुक्तियों का पूरा आधार ही संदिग्ध और जाली दस्तावेजों पर टिका था। साल 1988 का पद-सृजन (Post-creation) आदेश फर्जी प्रतीत हुआ, क्योंकि वह पत्र विभाग के बजाय किसी पोस्टमास्टर को संबोधित था।

एक ही नंबर पर दो आदेश: साल 1980 के दस्तावेजों में पाया गया कि एक ही तारीख और एक ही नंबर पर दो अलग-अलग आदेश जारी दिखाए गए थे, जो प्रशासनिक रूप से असंभव है।

रजिस्टर से गायब रिकॉर्ड: 27 जून 1996 का नियुक्ति स्वीकृति पत्र (Approval Letter) विभाग के डिस्पैच रजिस्टर (भेजे गए पत्रों के रिकॉर्ड) में दर्ज ही नहीं था।

नामों में हेरफेर: साल 1991-92 के स्कूल प्रबंधन रजिस्टर में दर्ज शिक्षकों के नाम, 1996 के वेतन बिलों में दर्ज नामों से पूरी तरह अलग थे।

16 साल की देरी: कानून का सीधा उल्लंघन

हाई कोर्ट ने नोट किया कि पदों के सृजन के 16 साल बाद ये नियुक्तियां की गईं। यह उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त जूनियर हाई स्कूल अधिनियम, 1978 की धारा 9(2) का सीधा उल्लंघन है। इस कानून के तहत, यदि पदों के सृजन के तीन महीने के भीतर नियुक्तियां नहीं की जाती हैं, तो दी गई मंजूरी को स्वतः ही वापस (Deemed Withdrawn) मान लिया जाता है।

शिक्षकों के तर्क खारिज: समय बीतने से अवैध वैध नहीं हो जाता

याचिकाकर्ता शिक्षकों के वकीलों ने दलील दी थी कि केवल डिस्पैच रजिस्टर में प्रविष्टि (Entry) न होने को नियुक्ति रद्द करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि शिक्षक पिछले लगभग 30 वर्षों से सेवा में हैं, इसलिए उनकी लंबी सेवा की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला भी दिया गया।

कानूनी सिद्धांत दोहराया

हाई कोर्ट ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दोहराया। कहा, न्याय और सहानुभूति (Equity) कभी भी कानून से ऊपर नहीं हो सकते। कोई भी अवैध नियुक्ति केवल इसलिए वैध नहीं हो जाती क्योंकि उसे किए हुए एक लंबा अरसा बीत चुका है। फर्जीवाड़े से नौकरी पाने वाले कर्मचारी औपचारिक अनुशासनात्मक जांच (Formal Disciplinary Inquiry) की मांग भी नहीं कर सकते।”

अदालत का अंतिम आदेश (The Verdict)

याचिकाएं खारिज: कोर्ट ने वेतन बहाली की मांग खारिज करने के साथ-साथ सेवानिवृत्त हो चुके दो शिक्षकों की पेंशन व अन्य सेवानिवृत्ति लाभों (Retirement Benefits) की मांग वाली याचिकाएं भी पूरी तरह खारिज कर दीं।

एकमात्र आंशिक राहत: अदालत ने केवल इतनी ढील दी कि यदि शिक्षकों ने अगस्त 2000 के बाद भी वास्तव में (Actually Worked) स्कूल में काम किया है, तो वे उस कार्य अवधि के वेतन के भुगतान के लिए सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) के समक्ष अपना पक्ष रख सकते हैं।

फैसले का मुख्य सार (Core Matrix)

विधिक मापदंडयाचिकाकर्ता का दावाहाई कोर्ट की व्यवस्था (2026)
अवैध नियुक्ति की स्थिति30 साल की लंबी सेवा के आधार पर इसे मानवीय आधार पर वैध माना जाए।यह ‘Void ab initio’ (शुरुआत से ही शून्य) है। समय बीतने से जालसाजी वैध नहीं होती।
प्रक्रियात्मक उल्लंघनडिस्पैच रजिस्टर में नाम न होना महज तकनीकी चूक है।यह 1978 के अधिनियम की धारा 9(2) (3 महीने की सीमा) और नियमों का जानबूझकर किया गया उल्लंघन है।
विभागीय जांच का अधिकारहटाने से पहले औपचारिक अनुशासनात्मक जांच की जाए।धोखाधड़ी साबित होने पर फर्जी दस्तावेजों के लाभार्थियों को जांच की मांग का कोई अधिकार नहीं।
रिटायरमेंट बेनिफिट्ससेवानिवृत्त हो चुके शिक्षकों को पेंशन व अन्य फंड मिले।याचिका खारिज; अवैध नियुक्ति के कारण कोई भी CONSEQUENTIAL (परिणामी) लाभ देय नहीं है।

निष्कर्ष (Takeaway)

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह निर्णय भ्रष्टाचार और फर्जी दस्तावेजों के सहारे सरकारी तंत्र में घुसने वालों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति को स्पष्ट करता है। कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि सरकारी खजाने (State Exchequer) से वेतन पाने का हक केवल उन्हीं को है जो वैध और पारदर्शी प्रक्रिया से आए हैं; धोखाधड़ी की बुनियाद पर खड़ी की गई नौकरी चाहे कितनी भी लंबी क्यों न हो जाए, कानूनन वह हमेशा अवैध ही रहेगी।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
haze
35 ° C
35 °
35 °
49 %
0kmh
40 %
Mon
37 °
Tue
44 °
Wed
44 °
Thu
45 °
Fri
45 °

Recent Comments