Tuesday, June 2, 2026
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Right to Life: इंसान की जान से ऊपर नहीं लालफीताशाही व फाइलों का नियम…सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया का क्यों पढ़ाया पाठ, पढ़िए केस

Right to Life: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार की मेडिकल रीइम्ब्रर्समेंट (चिकित्सा प्रतिपूर्ति) नीति को लेकर एक बेहद मानवीय और दूरगामी फैसला सुनाया है।

अदालत ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई

हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप मौदगिल ने 29 मई को दिए अपने आदेश में प्राचीन संस्कृत श्लोक का आह्वान करते हुए कहा कि “एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) का यह परम कर्तव्य है कि वह तकनीकी नियमों को मानवीय जीवन और अस्तित्व से ऊपर न रखे।”गैर-सूचीबद्ध (Non-Empanelled) अस्पतालों में आपातकालीन इलाज कराने पर कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के दावों को खारिज करने पर अदालत ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है।

अदालत द्वारा संस्कृत के श्लोक और राइट टू लाइफ का संदर्भ

संवैधानिक वादा: हाईकोर्ट ने अपने फैसले की शुरुआत भारत के प्राचीन नागरिक मूल्यों और संवैधानिक वादों को जोड़ते हुए की। कहा, एक कल्याणकारी राज्य का संवैधानिक वादा हमारे देश के प्राचीन सांस्कृतिक लोकाचार से शक्ति प्राप्त करता है, जो इस कालजयी श्लोक में समाहित है सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया (अर्थात सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें)। इस प्रार्थना का मूल सिद्धांत यह है कि समाज का कल्याण उसके लोगों के स्वास्थ्य और गरिमा से अलग नहीं किया जा सकता, और यही सुशासन (Governance) का आधार है।

तकनीकी खामी: अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21 – Right to Life) के तहत स्वास्थ्य और चिकित्सा देखभाल का अधिकार जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग है। विशेषकर उन बुजुर्ग पेंशनभोगियों के लिए जिन्होंने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष राज्य की सेवा में लगा दिए, उनके दावों को तकनीकी खामियों के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां: नीतिगत प्रक्रियाएं इंसानी जीवन से बड़ी नहीं

आपातकाल में पैनल नहीं देखा जाता: जस्टिस संदीप मौदगिल ने अस्पतालों की जमीनी हकीकतों (Lived Realities) को स्वीकार करते हुए निम्नलिखित टिप्पणियां कीं। सरकारी अस्पतालों में लंबी प्रतीक्षा अवधि, अत्यधिक भीड़, बिस्तरों (Beds) की कमी और गंभीर बीमारी की आपातकालीन स्थिति में कर्मचारियों या पेंशनभोगियों के पास सबसे नजदीकी उपलब्ध अस्पताल में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। वे यह देखने नहीं बैठ सकते कि अस्पताल पैनल में है या नहीं।

तकनीकी कड़वाहट बनाम संवैधानिक करुणा: ऐसी परिस्थितियों में, केवल गैर-सूचीबद्ध होने के आधार पर प्रतिपूर्ति (Reimbursement) को अस्वीकार करना मानवीय अस्तित्व से ऊपर नीतिगत प्रक्रियाओं को रखने जैसा होगा। स्वास्थ्य और जीवन रक्षा के मामलों में, राज्य का दृष्टिकोण शुष्क तकनीकीताओं (Arid Technicalities) से नहीं, बल्कि संवैधानिक करुणा (Constitutional Compassion) से प्रेरित होना चाहिए।

नीतियों का उद्देश्य: चिकित्सा प्रतिपूर्ति नीतियों का उद्देश्य केवल वित्तीय खर्च वापस करना नहीं है, बल्कि कर्मचारी को यह आश्वासन देना है कि बीमारी उसे आर्थिक बर्बादी, लाचारी या अपमान के दलदल में नहीं धकेलेगी।

कर्मचारियों और पेंशनभोगियों द्वारा उठाए गए मुख्य मुद्दे

  • इस संयुक्त याचिका (Batch of Petitions) में हरियाणा सरकार की मौजूदा नीति के कई नियमों को चुनौती दी गई थी।
  • क्या गैर-सूचीबद्ध अस्पतालों में कराए गए आपातकालीन इलाज के पैसे देने से मना किया जा सकता है?
  • क्या राज्य सरकार कुछ विशेष मामलों में उच्च खर्च होने के बावजूद रीइम्ब्रर्समेंट को केवल पीजीआई (PGI Rates) की दरों तक ही सीमित रख सकती है?
  • क्या आश्रितों (Dependants) के लिए तय की गई 3,500 रुपये प्रति माह की आय सीमा पूरी तरह से मनमानी और अवास्तविक (Unrealistic) नहीं है?
  • क्या चिकित्सा विज्ञान की प्रगति और बढ़ती स्वास्थ्य लागतों को देखते हुए पुराने ‘पैकेज रेट’ अब आउटडेटेड (अप्रासंगिक) नहीं हो चुके हैं?

हरियाणा सरकार का रुख: नीति की समीक्षा पर सहमति

सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता दीपक बाल्यान ने अदालत को आश्वस्त किया कि सरकार इन सभी शिकायतों और दावों की जांच करने के लिए तैयार हो गई है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि सरकार मौजूदा चिकित्सा प्रतिपूर्ति नीति के उन सभी क्लॉज (नियमों) पर सक्रिय रूप से पुनर्विचार और संशोधन (Active Reconsideration) कर रही है जिन्हें इस याचिका में चुनौती दी गई है, ताकि इसे आधुनिक चिकित्सा वास्तविकताओं के अनुकूल बनाया जा सके। इसके लिए हरियाणा सरकार ने एडिशनल डायरेक्टर (हेल्थ सर्विसेज) की अध्यक्षता में एक विशेष समिति (Committee) का भी गठन कर दिया है।

हाई कोर्ट का अंतिम निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते हुए पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने याचिकाओं को लंबित रखने के बजाय सरकार को कड़े निर्देश देकर निपटा दिया है। कोर्ट ने नवगठित समिति को निर्देश दिया है कि वह सभी याचिकाकर्ताओं के दावों की व्यक्तिगत रूप से, स्वतंत्र और सहानुभूतिपूर्वक (Sympathetically) जांच करे।
प्रत्येक मामले में चार सप्ताह (4 Weeks) के भीतर एक सकारण और उचित निर्णय (Well-reasoned decision) लिया जाए।

निष्कर्ष (Takeaway)

यह फैसला देश भर के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के स्वास्थ्य अधिकारों के हक में एक बड़ी नजीर है। कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि लालफीताशाही (Bureaucracy) और फाइलों के नियम किसी मरते हुए इंसान की जान बचाने के प्रयासों से बड़े नहीं हो सकते। यदि कोई आपात स्थिति है, तो इलाज सर्वोपरि है, अस्पताल का सरकारी पैनल में होना या न होना बाद की बात है।

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