MBBS Study: देश भर के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस (MBBS) इंटर्न्स, जूनियर रेजिडेंट्स और सीनियर रेजिडेंट्स को स्टाइपेंड (Stipend/मानदेय) न मिलने या कम मिलने के विवाद में एक नया मोड़ आया है।
एनएमसी का डेटा कोर्ट ने रिकॉर्ड पर लिया
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्न बी. वराले की पीठ इस मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने एनएमसी के इस डेटा को रिकॉर्ड पर लिया है। नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि पूरे देश में जांच के दौरान केवल 7 मेडिकल कॉलेज ऐसे पाए गए हैं जो अपने डॉक्टरों को स्टाइपेंड नहीं दे रहे थे, और उनके खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
NMC का गणित: 756 कॉलेजों का पूरा ब्योरा
सुनवाई के दौरान एनएमसी की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव शर्मा ने देश के मेडिकल कॉलेजों में स्टाइपेंड भुगतान की स्थिति से जुड़ा एक विस्तृत चार्ट और डेटा कोर्ट के सामने पेश किया।
अंडरग्रेजुएट (MBBS) मेडिकल कॉलेज: कुल कॉलेज: देश में कुल 756 यूजी मेडिकल कॉलेज हैं।
कोई विवाद नहीं: 573 कॉलेजों में स्टाइपेंड के भुगतान को लेकर कोई विवाद या शिकायत नहीं है; वहां नियमित भुगतान हो रहा है।
नए कॉलेज: 176 मेडिकल कॉलेज हाल ही में स्थापित हुए हैं। एनएमसी ने साफ किया कि इन कॉलेजों में अभी इंटर्नशिप के पात्र छात्र ही नहीं हैं, इसलिए वहां स्टाइपेंड भुगतान का सवाल ही पैदा नहीं होता।
डिफॉल्टर कॉलेज: देश भर में केवल 7 मेडिकल कॉलेज ही ऐसे मिले जो नियमों का उल्लंघन कर स्टाइपेंड नहीं दे रहे थे।
बंद कॉलेज: 1 मेडिकल कॉलेज फिलहाल बंद है और वहां कोई इंटर्न नहीं है।
पोस्टग्रेजुएट (PG – MD/MS) संस्थान: एनएमसी के मुताबिक, देश में 562 कॉलेज पोस्टग्रेजुएट कोर्स चला रहे हैं और वे सभी अपने रेजिडेंट डॉक्टरों को नियमानुसार स्टाइपेंड का भुगतान कर रहे हैं। 2 कॉलेजों में फिलहाल कोई इंटर्न/रेजिडेंट नहीं है।
‘कारण बताओ नोटिस’ जारी; सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्त किया नोडल काउंसिल
एनएमसी ने अदालत को आश्वस्त किया कि स्टाइपेंड न देने वाले उन 7 डिफॉल्टर मेडिकल कॉलेजों को कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice) जारी कर दिया गया है। इन नोटिसेज में उन पर भारी जुर्माना और पेनल्टी लगाने का प्रस्ताव है। कॉलेजों के जवाब आने के बाद नियामक (NMC) उनके खिलाफ आगे की सख्त कार्रवाई करेगा। चूंकि इस मामले में देश भर के कई राज्यों और डॉक्टरों के एसोसिएशन की याचिकाएं शामिल हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुव्यवस्थित करने के लिए अधिवक्ता चारु माथुर को नोडल काउंसिल (Nodal Counsel) नियुक्त किया है। कोर्ट ने सभी पक्षों के वकीलों को निर्देश दिया है कि वे अपने चार्ट, संक्षिप्त विवरण (Synopses) और दस्तावेज चारु माथुर को सौंपें, ताकि अदालत के सामने एक ‘कन्वेनिएंस कंपाइलेशन’ (एकत्रित संदर्भ फाइल) पेश की जा सके।
कानूनी व व्यावहारिक पृष्ठभूमि: कोर्ट की फटकार बनाम NMC का डेटा
यह मामला मेडिकल छात्रों के शोषण से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है। हालांकि एनएमसी ने कोर्ट में सिर्फ 7 कॉलेजों के डिफॉल्टर होने का दावा किया है, लेकिन इस मामले की पिछली सुनवाइयों का ट्रैक रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बयां करता है।
| सुप्रीम कोर्ट का पिछला सख्त रुख | NMC का वर्तमान बचाव (2026) |
| एनएमसी को फटकार: पिछली सुनवाइयों में सुप्रीम कोर्ट ने एनएमसी को कड़ी फटकार लगाई थी कि वह अपने खुद के सर्कुलर और नियमों को मेडिकल कॉलेजों से लागू करवाने में नाकाम रहा है। | एक्शन मोड का दावा: एनएमसी ने कोर्ट को दिखाया है कि वह अब सक्रिय है और नियमों का उल्लंघन करने वाले कॉलेजों पर जुर्माना लगाने की प्रक्रिया शुरू कर चुका है। |
| बंधुआ मजदूरी से तुलना: कोर्ट ने पहले टिप्पणी की थी कि जूनियर डॉक्टरों से दिन-रात काम लेना और उन्हें जायज स्टाइपेंड न देना एक तरह से ‘बंधुआ मजदूरी’ (Bonded Labor) जैसा है। | सीमित दायरा: एनएमसी के नए आंकड़ों का संदेश यह है कि समस्या उतनी व्यापक नहीं है जितनी दिखाई दे रही थी, और अधिकांश कॉलेज नियमों का पालन कर रहे हैं। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
नेशनल मेडिकल कमीशन का यह दावा कि देश के 756 कॉलेजों में से केवल 7 कॉलेज ही स्टाइपेंड नहीं दे रहे हैं, जमीन पर संघर्ष कर रहे कई रेजिडेंट डॉक्टरों के संगठनों (जैसे FORDA या FAIMA) के दावों से विपरीत हो सकता है, जो अक्सर स्टाइपेंड में भारी असमानता या महीनों की देरी की शिकायत करते हैं। अदालत ने फिलहाल एनएमसी के दावों को रिकॉर्ड पर ले लिया है, लेकिन 24 अगस्त 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि डॉक्टरों के संगठन एनएमसी के इस ‘ऑल इज वेल’ वाले आंकड़े को कोर्ट में किस तरह चुनौती देते हैं।

