Wednesday, October 28, 2026
HomeHigh CourtDeath in Harness: लापता होने के 7 साल बाद अनुकंपा नौकरी का...

Death in Harness: लापता होने के 7 साल बाद अनुकंपा नौकरी का दावा क्यों हुआ खारिज? तेलंगाना हाईकोर्ट ने साफ किया लापता और मृत में अंतर

Death in Harness: तेलंगाना हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) के नियमों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट कानूनी फैसला सुनाया है।

लापता लाइनमैन के बेटे की अपील को खारिज किया

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अपारेश कुमार सिंह और जस्टिस जी. एम. मोहिउद्दीन की डिवीजन बेंच ने तेलंगाना स्टेट नॉर्दर्न पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (TSNPDCL) के एक लापता लाइनमैन के बेटे की अपील को खारिज करते हुए यह फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 108 के तहत मिलने वाली कानूनी छूट का इस्तेमाल अनुकंपा योजना की स्पष्ट शर्तों को दरकिनार या बाईपास करने के लिए नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने साफ किया है कि यदि किसी विभाग या संस्थान की अनुकंपा योजना में ‘लापता कर्मचारियों’ के लिए अलग से श्रेणी (Category) और शर्तें तय की गई हैं, तो केवल 7 साल बीत जाने और साक्ष्य अधिनियम की धारा 108 के तहत ‘मौत की धारणा’ (Presumption of Death) बनने मात्र से उसे ‘ड्यूटी के दौरान मृत्यु’ (Death in Harness) का मामला नहीं माना जा सकता।

क्या था पूरा मामला? (4 साल की नौकरी बची थी और लाइनमैन लापता हो गया)

2012 में लापता हुए पिता: यह मामला लाइनमैन एस. सायन्ना के बेटे एस. संजीव से जुड़ा हुआ है। भैंसा डिवीजन में कार्यरत लाइनमैन सायन्ना 7 मार्च 2012 को अचानक लापता हो गए थे। पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई, लेकिन लंबी जांच के बाद भी उनका सुराग नहीं मिला और पुलिस ने ‘नॉट ट्रेसेबल’ (Untraceable Certificate) जारी कर दिया।

7 साल बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग: पिता के लापता होने के 7 साल बाद, उनके बेटे संजीव ने परिवार की खराब वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया।

कंपनी ने आवेदन किया खारिज: जुलाई 2020 में कंपनी ने उसका आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सायन्ना की जन्मतिथि 19 जून 1958 थी और वे 30 जून 2016 को रिटायर होने वाले थे। यानी जिस दिन वे लापता हुए, उनकी नौकरी के केवल 4 साल, 3 महीने और 23 दिन ही बचे थे।

योजना की शर्त: कंपनी की ‘लापता कर्मचारी अनुकंपा नीति’ के तहत, लापता होने की तारीख पर कर्मचारी की कम से कम 7 साल की सेवा बची होना अनिवार्य है। सिंगल जज ने भी इस फैसले को सही ठहराया, जिसके बाद संजीव ने डिवीजन बेंच में अपील की थी।

सहानुभूति के आधार पर नियमों को दोबारा नहीं लिख सकते: हाई कोर्ट

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि अनुकंपा नियुक्ति एक कल्याणकारी उपाय है, इसलिए इसका उदारतापूर्वक (Liberal) अर्थ निकाला जाना चाहिए और 7 साल बाद पिता को मृत (Death in Harness) मानकर नौकरी दी जानी चाहिए। हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कड़े कानूनी सिद्धांत तय किए:

अपवाद है अनुकंपा नियुक्ति: कोर्ट ने याद दिलाया कि अनुकंपा नियुक्ति कोई मौलिक अधिकार नहीं बल्कि एक रियायत (Concession) है। यह सार्वजनिक रोजगार में समानता के संवैधानिक नियम का एक ‘अपवाद’ है, इसलिए इसकी शर्तों की व्याख्या सख्ती से (Strictly Construed) होनी चाहिए। कोर्ट सहानुभूति या समता के आधार पर नियमों को शिथिल या दोबारा नहीं लिख सकता।

लापता और मृत में स्पष्ट अंतर: कोर्ट ने नोट किया कि TSNPDCL की योजना लापता कर्मचारियों को ‘मृत’ नहीं मानती। इसके बजाय, यह उन कर्मचारियों के लिए एक अलग श्रेणी बनाती है जो 7 साल से अधिक समय से लापता हैं। इस श्रेणी के लिए 7 साल का वेटिंग पीरियड और बची हुई नौकरी की सीमा (कम से कम 7 साल शेष होना) जैसी विशिष्ट शर्तें जोड़ी गई हैं।

कानून निर्माताओं की समझ: अदालत ने कहा कि योजना बनाने वाले इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे कि 7 साल बाद मौत की कानूनी धारणा बनती है, फिर भी उन्होंने जानबूझकर लापता लोगों के लिए अलग नियम और ‘अपवर्जन खंड’ (Exclusion Clause) रखा। अगर हर लापता व्यक्ति को ‘डेथ इन हार्नेस’ मान लिया जाएगा, तो लापता कर्मचारियों के लिए बनाया गया पूरा विशेष फ्रेमवर्क ही निरर्थक (Redundant) हो जाएगा।

तार्किक संकट (Practical Difficulty) को कोर्ट ने समझाया

डिवीजन बेंच ने एक बहुत ही व्यावहारिक कानूनी पहेली को भी सामने रखा। कहा, अगर हम मान लें कि लापता होने की तारीख ही मौत की तारीख है, तब भी याचिकाकर्ता का दावा खारिज हो जाएगा क्योंकि उस वक्त सिर्फ 4 साल की नौकरी बची थी (नियमन 7 साल चाहिए)। और अगर हम 7 साल पूरा होने के बाद की तारीख को काल्पनिक मौत की तारीख मानें, तो कर्मचारी उस तारीख से पहले ही अपनी सेवानिवृत्ति (Retirement) की उम्र पार कर चुका होगा। ऐसे में ‘ड्यूटी के दौरान मृत्यु’ का सिद्धांत लागू ही नहीं हो सकता।

विश्लेषण: अनुकंपा नियुक्ति और धारा 108 के कानूनी मायने

कानूनी पहलूकोर्ट का स्टैंड और इसका प्रभाव
धारा 108 साक्ष्य अधिनियमयह धारा कहती है कि यदि कोई व्यक्ति 7 वर्षों तक लापता है और उनके बारे में उन लोगों ने कुछ नहीं सुना जिन्होंने सामान्य रूप से सुना होता, तो कानूनन उसे मृत मान लिया जाता है।
मैकेनिकल इस्तेमाल पर रोककोर्ट ने साफ किया कि इस धारा को हर संविदात्मक या सेवा नियमों के संदर्भ में ‘मशीनी रूप से’ लागू नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब सेवा नियमावली में खुद का एक अलग नियम मौजूद हो।
अन्य बकायों का अधिकार सुरक्षितहालांकि हाई कोर्ट ने अनुकंपा नौकरी की अपील खारिज कर दी, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बेटा अपने पिता के टर्मिनल बेनिफिट्स, पेंशन, पीएफ या अन्य वित्तीय बकायों के लिए कानून के अनुसार दावा करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

तेलंगाना हाई कोर्ट का यह फैसला यह साफ करता है कि अदालतें भावुकता या केवल सहानुभूति के आधार पर प्रशासनिक नीतियों को नहीं बदल सकतीं। अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य संकट में आए परिवार को तुरंत राहत देना है। यदि कोई कर्मचारी अपनी सेवानिवृत्ति के बिल्कुल करीब आकर लापता होता है, और नीति इसकी इजाजत नहीं देती, तो अदालतें जबरन किसी के लिए नौकरी का रास्ता नहीं खोल सकतीं। नियमों का अक्षरशः पालन ही कानून का शासन है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
overcast clouds
24.5 ° C
24.5 °
24.5 °
68 %
2.1kmh
100 %
Tue
24 °
Wed
29 °
Thu
22 °
Fri
22 °
Sat
29 °

Recent Comments