POCSO ACT-III: दुष्कर्म और नाबालिगों के साथ यौन शोषण के मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्यों के कानूनी प्रभाव को लेकर त्रिपुरा हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है।
डीएनए टेस्ट का नहीं हुआ मिलान
हाईकोर्ट के जस्टिस टी. अमरनाथ गौड़ और जस्टिस एस. दत्ता पुरकायस्थ की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि डीएनए टेस्ट का मिलान न होना (Mismatch) आरोपी को केवल बच्चे के पितृत्व (Paternity) के दावे से बरी कर सकता है, लेकिन यह उसे बलात्कार (Rape) के मुख्य अपराध से स्वचालित रूप से दोषमुक्त नहीं करता। हाई कोर्ट ने साफ किया है कि डीएनए (DNA) टेस्ट की रिपोर्ट निगेटिव आने का यह मतलब बिल्कुल नहीं निकाला जा सकता कि आरोपी ने पीड़िता के साथ बलात्कार नहीं किया था।
असामान्य विसंगतियों’ के आधार पर छोटे भाई को किया बरी
अदालत ने इस टिप्पणी के साथ मुख्य आरोपी प्रशांत देबनाथ की दोषसिद्धि को बरकरार रखा और उसे आईपीसी तथा पॉक्सो एक्ट, 2012 की धारा 6 के तहत 20 साल के कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) की सजा सुनाई। हालांकि, कोर्ट ने सबूतों में ‘असामान्य विसंगतियों’ के आधार पर उसके छोटे भाई (सह-आरोपी) को बरी कर दिया।
क्या था पूरा मामला? (डरा-धमकाकर शोषण और मंदिर में शादी)
नाबालिग से बार-बार ज्यादती: अभियोजन पक्ष (Prosecution) के अनुसार, यह मामला उत्तर त्रिपुरा का है। फरवरी 2021 में एक नाबालिग लड़की (उम्र 17 वर्ष से कम) ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि करीब एक साल पहले जब वह अपने पड़ोसी (मुख्य आरोपी) के घर गई थी, तो उसने उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद आरोपी ने किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी देकर उसके साथ बार-बार बलात्कार किया।
गर्भवती होने पर गर्भपात की कोशिश: जब पीड़िता गर्भवती हो गई, तो आरोपी के पिता उसे अस्पताल ले गए, लेकिन डॉक्टरों ने गर्भपात (Abortion) करने से मना कर दिया।
मंदिर में शादी और ₹40,000 की पेशकश: इसके बाद दोनों परिवारों की मौजूदगी में मुख्य आरोपी ने मंदिर में पीड़िता से शादी तो कर ली, लेकिन उसे अपने घर नहीं ले गया। बाद में आरोपी के पिता ने पीड़िता के पिता को 40,000 रुपये दिए ताकि वह किसी तरह गर्भपात करा ले, लेकिन गर्भावस्था काफी आगे बढ़ चुकी थी और बाद में लड़की ने एक बेटे को जन्म दिया।
भाई पर ब्लैकमेलिंग का आरोप: पीड़िता ने आरोप लगाया था कि मुख्य आरोपी के छोटे भाई (पप्पू देबनाथ) ने भी उसे ब्लैकमेल किया और जंगल में ले जाकर उसका यौन उत्पीड़न किया।
पॉक्सो कोर्ट का फैसला: विशेष पॉक्सो अदालत ने दोनों भाइयों को दोषी मानते हुए 20-20 साल की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ वे हाई कोर्ट पहुंचे थे।
डीएनए मिसमैच के बावजूद मुख्य आरोपी क्यों हुआ दोषी?
हाई कोर्ट के सामने आरोपियों की मुख्य दलील यह थी कि बच्चे का डीएनए प्रोफाइल उनसे मैच नहीं हुआ है, इसलिए पूरी सजा ही अवैध है। लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए मुख्य आरोपी के खिलाफ निम्नलिखित पुख्ता सबूतों को आधार बनाया।
पीड़िता का अटूट बयान: अदालत ने पाया कि पीड़िता की गवाही पूरी तरह सुसंगत और विश्वसनीय थी, जो किसी भी बलात्कार के मामले में दोषसिद्धि का सबसे बड़ा आधार होती है।
आरोपी के परिवार का आचरण (Conduct): कोर्ट ने कहा कि आरोपी के पिता द्वारा पीड़िता के परिवार को गर्भपात के लिए 40,000 रुपये देना और दोनों की मंदिर में शादी करवाना स्वतंत्र गवाहों (PW-12) द्वारा साबित हुआ है। कोर्ट ने टिप्पणी की, “इसका सीधा मतलब है कि आरोपी के पिता को पता था कि उनके बेटे और पीड़िता के बीच संबंध थे, जिसके कारण वह गर्भवती हुई।”
सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं: चूंकि अपराध के समय पीड़िता की उम्र 17 साल से कम (नाबालिग) थी, इसलिए कानूनन उसकी सहमति का कोई वजूद नहीं था।
छोटे भाई को कोर्ट ने क्यों किया बरी?
अदालत ने सह-आरोपी और छोटे भाई पप्पू देबनाथ के मामले में अलग रुख अपनाया। हाई कोर्ट ने गवाहों के बयानों की गहन समीक्षा करने के बाद नोट किया कि यद्यपि पीड़िता ने छोटे भाई पर आरोप लगाए थे, लेकिन पीड़िता के माता-पिता और करीबी रिश्तेदारों ने अपनी गवाही के दौरान पप्पू की संलिप्तता पर पूरी तरह चुप्पी साधे रखी। कोर्ट ने कहा कि परिवार के सदस्यों द्वारा इस तरह की बात छिपाना अप्राकृतिक है, जिससे मामले में संदेह पैदा होता है। इसलिए उसे बरी कर दिया गया।
विश्लेषण: बलात्कार के मामलों में डीएनए (DNA) साक्ष्य का कानूनी महत्व
| कानूनी और वैज्ञानिक पहलू | कोर्ट की व्याख्या और इसका प्रभाव |
| डीएनए का उद्देश्य | कोर्ट ने कहा कि डीएनए टेस्ट का उद्देश्य अभियोजन पक्ष (Prosecution) को अपना केस साबित करने में ‘मदद’ करना है, न कि यह खुद में अंतिम फैसला है। |
| बलात्कार बनाम पितृत्व | यदि कोई पुरुष कंडोम का उपयोग करता है या किसी अन्य कारण से बच्चा उसका नहीं है, तो भी ‘जबरन शारीरिक संबंध’ बनाने का अपराध (बलात्कार) अपनी जगह कायम रहता है। डीएनए सिर्फ यह बताता है कि बच्चा किसका है, यह नहीं कि बलात्कार हुआ था या नहीं। |
| पॉक्सो एक्ट का कड़ा रुख | यह फैसला पॉक्सो मामलों में बच्चों के संरक्षण को मजबूत करता है, जहां वैज्ञानिक तकनीक की सीमाओं का फायदा उठाकर अपराधी बच नहीं सकते। |

