Friday, October 30, 2026
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Gandhi’s Book: यह जनहित याचिका नहीं, पब्लिसिटी स्टंट है..महात्मा गांधी की हत्या व आत्मकथा के गायब वॉल्यूम पर PIL के पीछे सच क्या है, पढ़ें केस

Gandhi’s Book: कर्नाटक हाई कोर्ट ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की साजिश और उनकी आत्मकथा के कथित रूप से गायब दूसरे हिस्से को लेकर दायर एक जनहित याचिका (PIL) को सुनने से साफ इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस विभू बाखरू और जस्टिस के. एस. हेमलखा की खंडपीठ ने इस याचिका को विशुद्ध रूप से ‘पब्लिसिटी स्टंट’ (प्रसिद्धि पाने का जरिया) करार देते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता पर 10 हजार रुपये का जुर्माना (Costs) भी ठोक दिया।

अदालत ने सख्त लहजे में अपने आदेश में कहा, मौजूदा याचिका को साबित करने के लिए रिकॉर्ड पर पर्याप्त सामग्री नहीं है। याचिकाकर्ता ने इससे पहले महात्मा गांधी की आत्मकथा के गायब वॉल्यूम की जांच के लिए एक याचिका दायर की थी, जिसे 28 अगस्त 2025 को ही खारिज कर दिया गया था। हमें लगता है कि यह याचिका जनहित में कोई राहत मांगने के बजाय केवल पब्लिसिटी बटोरने का एक जरिया है। हम इसे सुनने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। इसे 10 हजार रुपये के जुर्माने के साथ खारिज किया जाता है, जिसे 2 सप्ताह के भीतर कानूनी सेवा प्राधिकरण (Legal Aid) में जमा कराना होगा।”

क्या थीं याचिकाकर्ता की अजीबोगरीब मांगें?

यह याचिका ‘जागृत कर्नाटक, जागृत भारत’ नाम के संगठन और उसके अध्यक्ष के. एन. मंजूनाथ द्वारा पिछले साल दायर की गई थी। इस याचिका में इतिहास को लेकर कई अजीबो-गरीब दावे और मांगें की गई थीं।

17 साल बाद जांच आयोग क्यों?: याचिका में मांग की गई थी कि एक ‘संयुक्त संसदीय समिति’ (JPC) का गठन किया जाए जो इस बात की जांच करे कि केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी की 1948 में हुई हत्या की साजिश की जांच के लिए 17 साल बाद (1965 में) न्यायिक जांच आयोग (जीवन लाल कपूर आयोग) का गठन क्यों किया था?

आत्मकथा का कथित ‘गायब वॉल्यूम-2’: याचिकाकर्ता का दावा था कि महात्मा गांधी की प्रसिद्ध आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ (My Experiments with Truth) का एक दूसरा हिस्सा (वॉल्यूम-2) भी था, जिसे जानबूझकर दबाया गया। आरोप लगाया गया कि यह कथित वॉल्यूम 2008 में नेहरू मेमोरियल म्यूजियम से हटाए गए दस्तावेजों के बक्से में था, जिसे अब खोजा जाना चाहिए।

1947 के पत्र की जांच: याचिका में यह भी मांग की गई थी कि मई 1947 में गांधीजी द्वारा ब्रिटिश वायसराय को लिखे गए एक पत्र की जांच हो, जिसमें कथित तौर पर भारत के विभाजन को रोकने के लिए ‘सशस्त्र संघर्ष’ (Armed Conflict) पर विचार करने की बात कही गई थी।

गांधीजी के 1947 के पत्र का असली सच

याचिका में गांधीजी के जिस पत्र का हवाला देकर भ्रम फैलाने की कोशिश की गई थी, उसका ऐतिहासिक संदर्भ पूरी तरह अलग था। मई 1947 में महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया था कि वे भारत के विभाजन के मामले में हस्तक्षेप न करें। उन्होंने कहा था कि अगर विभाजन होना ही है, तो वह ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के भारत से पूरी तरह चले जाने के बाद होना चाहिए—फिर चाहे वह भारतीय पक्षों के बीच किसी समझौते से हो या फिर किसी संभावित सशस्त्र संघर्ष के जरिए। पत्र में अंग्रेजों को भारत छोड़ने की बात कही गई थी, न कि गांधीजी द्वारा सशस्त्र युद्ध भड़काने की।

विश्लेषण: पुरानी याचिका और राहुल गांधी-ओम बिरला को भेजे गए नोटिस

अदालत ने नोट किया कि यह याचिकाकर्ता आदतन ऐसी याचिकाएं दाखिल कर रहा है। पिछले साल (अगस्त 2025) खारिज हो चुकी याचिका में भी इसी तरह के दावे किए गए थे।

पिछली याचिका के मुख्य बिंदुयाचिकाकर्ता द्वारा की गई मांगें
इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा गयायाचिकाकर्ता का दावा था कि भारतीय इतिहास में बहुत बड़े ‘गैप’ (अंतराल) हैं और इतिहास को विकृत करने से देश अस्थिर हो रहा है।
नेहरू और कांग्रेस पर आरोपदावा किया गया कि गांधीजी की आत्मकथा का ‘भाग-२’ १९२७ से १९४७ के स्वतंत्रता संग्राम को कवर करता था, जिसे कांग्रेस और जवाहरलाल नेहरू ने कभी छपने ही नहीं दिया या उस पर बैन लगा दिया।
नेताओं से जवाब मांगने की जिदयाचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से मांग की थी कि कोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, विपक्ष के नेता राहुल गांधी, वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और शिक्षा मंत्रालयों को आदेश दे कि वे उसके द्वारा भेजे गए पत्रों (Representations) का जवाब दें।
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