Question of Law: देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान AIIMS में पोस्ट-ग्रेजुएट (MD/MS) पाठ्यक्रमों में संस्थानिक अधिमान के तहत दी जाने वाली सीटों की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 32 (Article 32) के तहत इस रिट याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस विषय से जुड़े कानूनी सवाल (Question of Law) को आगे की समीक्षा के लिए खुला (Left Open) रखा है।
क्या था पूरा विवाद? (मेधावी छात्रा बनाम AIIMS प्रशासन)
यह याचिका 23 वर्षीय एक मेडिकल छात्रा (डॉक्टर) द्वारा दायर की गई थी, जिसने अखिल भारतीय स्तर की INICET परीक्षा पास की थी।
याचिकाकर्ता की दलील: छात्रा ने दावा किया कि उसकी ऑल इंडिया रैंक (AIR) 287 थी और उसने 99.655 परसेंटाइल अंक हासिल किए थे। काउंसलिंग के दौरान उसने 17 संस्थानों में 6 विषयों (Disciplines) का विकल्प चुना था। लेकिन, पहले और दूसरे दौर की काउंसलिंग में उसे कोई सीट नहीं मिली।
भेदभाव का आरोप: छात्रा का आरोप था कि उससे बहुत कम रैंक वाले उम्मीदवारों को केवल इसलिए सीटें मिल गईं क्योंकि वे AIIMS के ही पूर्व छात्र (MBBS ग्रैजुएट) थे और उन्हें ‘संस्थानिक अधिमान’ का लाभ मिला। याचिका में आरोप लगाया गया कि AIIMS कई विषयों में 50% से अधिक और कुछ मामलों में तो 100% सीटें इस कोटे के तहत आवंटित कर रहा है, जो कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने ऐतिहासिक फैसलों AIIMS स्टूडेंट्स यूनियन बनाम AIIMS (2002) और सौरभ चौधरी बनाम भारत संघ (2003) के खिलाफ है। इन फैसलों में कोर्ट ने ‘संस्थानिक आरक्षण’ को रद्द कर दिया था, लेकिन ओपन कैटेगरी की अधिकतम 50% सीटों पर ‘संस्थानिक अधिमान’ (प्राथमिकता) देने की अनुमति दी थी।
संविधान के उल्लंघन का दावा: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इस व्यवस्था से कम अंक वाले डॉक्टरों को अच्छे विषय मिल जाते हैं, जो देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए ‘घातक’ है। उसने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 19(1)(g) (पेशा चुनने की आजादी), 21 (जीवन का अधिकार/बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं) और 41 का उल्लंघन बताया।
AIIMS का पलटवार: याचिकाकर्ता ने तथ्य छुपाए, अपनी गलती से गंवाई सीट
AIIMS प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में एक जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) दायर कर याचिकाकर्ता के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया और उस पर महत्वपूर्ण तथ्य छुपाने (Suppression of Facts) का आरोप लगाया।
रैंक और चॉइस की हकीकत: AIIMS ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता की वास्तविक रैंक 860 थी (न कि 287, जैसा दावा किया गया)। इसके अलावा, वह सीटें चुनने में बेहद चयनात्मक (Selective) थी, उसने कुल उपलब्ध 400 सीटों में से केवल 10 विशिष्ट सीटों का विकल्प चुना।
सीटों का गणित: जिन विषयों और संस्थानों का विकल्प उसने चुना था, वहां अनारक्षित (Unreserved) वर्ग की केवल 75 सीटें थीं और उनमें से भी 20 से कम सीटें संस्थानिक अधिमान के तहत दी गई थीं।
विश्लेषण: रोस्टर सिस्टम और संस्थानिक अधिमान के नियम
AIIMS ने अदालत के सामने स्पष्ट किया कि वह अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के ही एक हालिया फैसले स्टूडेंट एसोसिएशन AIIMS, भोपाल और अन्य बनाम AIIMS, नई दिल्ली’ के निर्देशों के तहत रोस्टर प्रणाली (Roster System) का पालन कर रहा है।
| AIIMS की आरक्षण नीति | सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश और वास्तविक स्थिति |
| 50% की अधिकतम सीमा | संस्थानिक अधिमान (OBC/SC/ST कोटे से अलग) किसी भी संस्थान की कुल अनारक्षित सीटों के 50% से अधिक नहीं हो सकता, और न ही यह उस संस्थान की कुल MBBS सीटों के 50% से अधिक हो सकता है। |
| वास्तविक आवंटन प्रतिशत | वर्तमान में विभिन्न AIIMS संस्थानों में कुल पीजी सीटों का केवल 18% से 24% हिस्सा ही इस अधिमान (Preference) के तहत आवंटित किया जा रहा है, जो तय सीमा के भीतर है। |
| विषय-वार कोई आरक्षण नहीं | कोर्ट के निर्देशानुसार, यह वरीयता विषय-वार (Subject-wise) लागू नहीं होती। इसलिए किसी एक विशेष विभाग (जैसे रेडियोलॉजी या कार्डियोलॉजी) में यह संख्या बदल सकती है, बशर्ते संस्थान की कुल अनारक्षित सीटों पर यह 50% से कम हो। |
| जातिगत और आर्थिक आरक्षण अलग | एससी (SC), एसटी (ST), ओबीसी (OBC), ईडब्ल्यूएस (EWS) और दिव्यांग (PWD) श्रेणियों के लिए विषय-वार मिलने वाले वैधानिक आरक्षण इस पूरी व्यवस्था से अलग और स्वतंत्र हैं। |

