Friday, July 31, 2026
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Jharkhand News: यौन हिंसा मामला…जांच के लिए 2 महीने की समय-सीमा, डीजीपी करेंगे मॉनिटरिंग और पीड़ितों के लिए 19 बड़े निर्देश, पढ़ लीजिए

Jharkhand News: झारखंड हाई कोर्ट ने झारखंड में होनेवाले यौन हिंसा और बलात्कार के मामलों में प्रशासनिक और कानूनी तंत्र को पूरी तरह बदलने के लिए एक ऐतिहासिक और बेहद व्यापक फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने वर्ष 2024 की एक जनहित याचिका (PIL No. 2253 of 2024) का निपटारा करते हुए 19 विशिष्ट और कड़े निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने राज्य सरकार, पुलिस महानिदेशक (DGP), निचली अदालतों और महिला एवं बाल विकास विभाग को सख्त लहजे में कहा है कि अब कागजी दावों से काम नहीं चलेगा, जमीन पर बदलाव दिखाना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि: जनहित याचिका से स्वतः संज्ञान तक

यह मामला शुरुआत में सुश्री पद्मा बड़ाईक द्वारा बलात्कार पीड़ितों के पुनर्वास, मुआवजे और कानूनी सहायता से जुड़े 9 प्रमुख मुद्दों को लेकर दायर किया गया था। बाद में सितंबर 2025 में हाई कोर्ट की एक समन्वय पीठ ने इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए इसका स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लिया और इसे एक व्यापक ‘कोर्ट-संचालित जनहित अभियान’ में बदल दिया। अदालत की सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता सुमीत गडोदिया को ‘एमिकस क्यूरी’ (अदालत का मित्र) नियुक्त किया गया था।

हाई कोर्ट के 19 प्रमुख निर्देश और उनके डिजिटल मायने

‘ज़ीरो एफआईआर’ (Zero FIR) पर कड़ा रुख: टालमटोल पर नपेंगे अधिकारी

कानूनी स्थिति: सुप्रीम कोर्ट के ‘ललिता कुमारी’ और ‘सतविंदर कौर’ मामलों के स्थापित सिद्धांतों तथा नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 173 के बावजूद पुलिस क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) का बहाना बनाकर केस दर्ज करने में देरी करती है।

अदालत का आदेश: डीजीपी को निर्देश दिया गया है कि वे सभी थानों को ‘ज़ीरो एफआईआर’ दर्ज करने का अनिवार्य आदेश जारी करें। यदि कोई अधिकारी मना करता है, तो उस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 199 के तहत आपराधिक मुकदमा और विभागीय कार्रवाई होगी। इसकी व्यक्तिगत जवाबदेही जिले के एसपी (SP) की होगी।

वन-स्टॉप सेंटर्स (OSC) की बदहाली: जमशेदपुर-दुमका की रेटिंग ‘खराब’

अदालत ने राज्य के सभी 24 जिलों के वन-स्टॉप सेंटर्स की रिपोर्ट सार्वजनिक की। जमशेदपुर, दुमका, हजारीबाग, पाकुर और सरायकेला-खरसावां की स्थिति बेहद दयनीय पाई गई। उदाहरण के लिए, जमशेदपुर का सेंटर तीसरी मंजिल पर है जहां लिफ्ट नहीं है, कोई रसोइया नहीं है और सुरक्षा के अभाव में कोई पीड़िता वहां नहीं रह रही है।

अदालत का आदेश: महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव को इन कमियों को तुरंत दूर करने का निर्देश दिया गया है। इसके निरीक्षण के लिए एक ‘महिला-प्रधान समिति’ (Women-headed Committee) बनाई जाएगी जो सालाना परफॉर्मेंस रिपोर्ट देगी। राँची के ‘नारी निकेतन’ को वयस्क पीड़ितों के लिए बिना किसी समय-सीमा के दीर्घकालिक आश्रय गृह के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।

मुआवजा नीति: 30 दिनों के भीतर भुगतान अनिवार्य

अदालत का आदेश: ट्रायल कोर्ट (विशेष रूप से पोक्सो और सेशन्स कोर्ट) को निर्देश दिया गया है कि एफआईआर दर्ज होते ही वे पीड़िता की तात्कालिक जरूरतों को देखें और अंतरिम मुआवजा (Interim Compensation) जारी करें।

केस के अंत में (चाहे सजा हो, बरी हो या आरोपी फरार हो), कोर्ट को अंतिम फैसले के साथ ही मुआवजा तय करना होगा। इसके लिए पीड़िता को अलग से आवेदन देने की जरूरत नहीं होगी। आदेश के 30 दिनों के भीतर गृह विभाग और JHALSA को हर हाल में भुगतान सुनिश्चित करना होगा।

बलात्कार से जन्मे बच्चों को कक्षा 12वीं तक मुफ्त शिक्षा

संविधान के अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) के दायरे को बढ़ाते हुए हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि बलात्कार के कारण जन्मे बच्चों को कक्षा 12वीं तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दी जाएगी। इसके लिए हर जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त होगा। यदि ऐसे बच्चे आगे चलकर IIT, NIT, AIIMS या IIM जैसे देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में चुने जाते हैं, तो राज्य सरकार उन्हें पूरी स्कॉलरशिप (Waiver/Scholarship) प्रदान करेगी।

टू-फिंगर टेस्ट (Two-Finger Test) पर पूर्ण प्रतिबंध

सुप्रीम कोर्ट के कड़े आदेशों के बावजूद इस अमानवीय टेस्ट के चलन पर नाराजगी जताते हुए हाई कोर्ट ने राज्य के सभी सरकारी और निजी अस्पतालों को सर्कुलर जारी करने का निर्देश दिया है। यदि कोई डॉक्टर यह टेस्ट करता पाया गया, तो इसे ‘पेशेवर कदाचार’ (Professional Misconduct) मानकर उसका लाइसेंस और नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।

पुलिस आचरण और 2 महीने में जांच पूरी करने की समय-सीमा

अदालत का आदेश: BNSS की धारा 193 के तहत बलात्कार के मामलों की प्रारंभिक जांच 15 दिनों में और अंतिम जांच (Chargesheet) 2 महीने के भीतर पूरी करनी होगी। पीड़िता का बयान केवल महिला पुलिस अधिकारी ही दर्ज करेगी। पीड़िता को 24 घंटे के भीतर कानूनी सहायता (मुफ्त वकील) और पोक्सो एक्ट के तहत सुरक्षा दी जाएगी। मुकदमे के दौरान गवाहों की उपस्थिति के समय बिना ठोस लिखित कारण के तारीख (Adjournment) नहीं दी जाएगी।

विश्लेषण: पुनर्वास और सुरक्षा के नए उपाय

सुधारात्मक कदमहाई कोर्ट की रूपरेखा और गाइडलाइंस
हेल्पलाइन का एकीकरणराज्य सरकार को महिलाओं के लिए समर्पित हेल्पलाइन नंबर 181 को प्राथमिक आपातकालीन नंबर बनाने पर विचार करने को कहा गया है, जो बैक-एंड से मुख्य आपातकालीन नंबर 112 से सीधे जुड़ा होगा।
सामाजिक पुनर्वास (Social Rehabilitation)समाज द्वारा बहिष्कृत किए जाने के डर से यदि पीड़िता या उसका परिवार अपना निवास स्थान बदलना चाहता है, तो सरकार को उनकी इच्छा के स्थान पर उन्हें बसाने और रोजगार/कौशल विकास में मदद करनी होगी।
विशेष टास्क फोर्स (STF)डीजीपी एक विशेष टास्क फोर्स का गठन करेंगे जो गवाहों को समय पर कोर्ट में पेश करना और जांच की प्रगति की हर तिमाही (Quarterly) मॉनिटरिंग सुनिश्चित करेगी।
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