Wednesday, November 4, 2026
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Law Researcher: लॉ ग्रेजुएट को तुरंत दें एडवोकेट सर्टिफिकेट, लेकिन प्रैक्टिस पर रहेगा ‘स्टे’…झारखंड स्टेट बार काउंसिल को क्यों दिया निर्देश, पढ़िए

Law Researcher: झारखंड हाई कोर्ट ने स्टेट बार काउंसिल की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताते हुए एक कानून स्नातक (Law Graduate) के पक्ष में बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

याचिकाकर्ता ऋचा प्रिया की रिट याचिका को स्वीकार किया

हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता ऋचा प्रिया की रिट याचिका को स्वीकार करते हुए झारखंड स्टेट बार काउंसिल को निर्देश दिया कि वे ऋचा को उनके बैच के अन्य छात्रों की तरह 15 अक्टूबर 2024 की प्रभावी तारीख से नामांकन प्रमाणपत्र जारी करें। हालांकि, चूंकि वे वर्तमान में हाई कोर्ट में लॉ रिसर्चर के रूप में कार्यरत हैं, इसलिए वकालत करने का उनका लाइसेंस सेवा अवधि तक निलंबित (Suspended) रहेगा। अदालत ने आदेश दिया है कि यदि किसी उम्मीदवार ने वकालत के नामांकन (Enrolment) की सभी कानूनी शर्तें पूरी कर ली हैं, तो उसके बाद हाई कोर्ट में ‘लॉ रिसर्चर’ (Law Researcher) के पद पर शामिल होने मात्र से उसका एडवोकेट सर्टिफिकेट नहीं रोका जा सकता।

क्या था पूरा विवाद? (नामांकन की मंजूरी के बाद मिली हाई कोर्ट की नौकरी)

समय पर किया आवेदन: एमिटी यूनिवर्सिटी, झारखंड से बीए एलएलबी (ऑनर्स) करने वाली ऋचा प्रिया ने वकालत की प्रैक्टिस के लिए एक लंबा सफर तय किया। ऋचा ने 30 अगस्त 2024 को झारखंड स्टेट बार काउंसिल में नामांकन के लिए आवेदन किया। बार काउंसिल की स्क्रूटनी कमेटी ने 11 सितंबर 2024 को उनके आवेदन की जांच कर उसे हरी झंडी (क्लियर) दे दी।

शर्तें हुईं पूरी: नियमों के अनुसार, स्क्रूटनी के बाद 14 दिनों का अनिवार्य वेटिंग पीरियड होता है, जो 26 सितंबर 2024 को समाप्त हो गया। इस तारीख तक ऋचा ने नामांकन की हर कानूनी अर्हता पूरी कर ली थी।

इस बीच मिली नौकरी: इसी दौरान, झारखंड हाई कोर्ट ने लॉ रिसर्चर/रिसर्च एसोसिएट के लिए विज्ञापन निकाला। ऋचा चुनी गईं और उन्हें 27 सितंबर 2024 को नियुक्ति पत्र मिला। उन्होंने 3 अक्टूबर 2024 को हाई कोर्ट में जॉइन कर लिया।

काउंसिल ने रोका सर्टिफिकेट: जब 15 अक्टूबर 2024 को बार काउंसिल ने उस बैच के सभी सफल वकीलों को सर्टिफिकेट बांटे, तो ऋचा का नाम सूची से हटा दिया गया। उन्हें मौखिक रूप से कहा गया कि चूंकि वे हाई कोर्ट में नौकरी कर रही हैं, इसलिए उन्हें सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा। उनके मूल दस्तावेज (Original Certificates) भी काउंसिल ने अपने पास ही रख लिए, जिससे वे अन्य परीक्षाओं में शामिल नहीं हो पा रही थीं। आखिरकार तंग आकर ऋचा ने खुद कोर्ट में उपस्थित होकर (In Person) अपनी लड़ाई लड़ी।

हाई कोर्ट का सटीक आकलन: ‘तारीखों का क्रम’ बना फैसले का आधार

जस्टिस आनंद सेन ने मामले का निपटारा करने के लिए तारीखों के क्रम (Timeline) का बारीकी से विश्लेषण किया और बार काउंसिल के मौखिक तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया।

30 अगस्त 2024 ──> ऋचा प्रिया ने बार काउंसिल में नामांकन के लिए आवेदन किया।
11 सितंबर 2024 ──> स्क्रूटनी कमेटी ने आवेदन को पूरी तरह सही पाकर मंजूरी दी।
26 सितंबर 2024 ──> 14 दिनों की कानूनी अवधि समाप्त (सर्टिफिकेट का अधिकार पक्का हुआ)।
27 सितंबर 2024 ──> हाई कोर्ट की तरफ से ‘लॉ रिसर्चर’ का जॉइनिंग लेटर जारी हुआ।
03 अक्टूबर 2024 ──> ऋचा ने हाई कोर्ट में लॉ रिसर्चर के पद पर कार्यभार संभाला।

अदालत ने स्पष्ट किया कि 26 सितंबर 2024 तक ऋचा के पास कोई नौकरी नहीं थी और बार काउंसिल का यह दायित्व उसी दिन पक्का (Crystallised) हो गया था कि वह उन्हें सर्टिफिकेट जारी करे। उसके बाद मिली नौकरी के आधार पर बार काउंसिल अपने पुराने दायित्व से मुकर नहीं सकती।

अदालत का संतुलित समाधान: नामांकन वैध, पर प्रैक्टिस पर रोक

प्रभावी नामांकन: हाई कोर्ट ने कानूनी मर्यादा और नियमों के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाया। बार काउंसिल ऋचा प्रिया को तुरंत नामांकन नंबर और प्रमाण पत्र आवंटित करे, जो उनके बैच के अन्य साथियों की तरह 15 अक्टूबर 2024 से ही प्रभावी माना जाएगा ताकि उनकी सीनियरिटी (Seniority) प्रभावित न हो।

लाइसेंस का निलंबन (Suspension of Licence): बार काउंसिल के नियमों के मुताबिक कोई भी पंजीकृत वकील लाभ के पद या पूर्णकालिक नौकरी पर नहीं रह सकता। इसलिए, कोर्ट ने व्यवस्था दी कि 3 अक्टूबर 2024 (जॉइनिंग की तारीख) से लेकर जब तक ऋचा हाई कोर्ट में लॉ रिसर्चर रहेंगी, उनका वकालत का लाइसेंस सस्पेंड (स्थगित) रहेगा। नौकरी छोड़ने के बाद वे इसे दोबारा एक्टिव करा सकेंगी।

बार काउंसिल की कार्यप्रणाली पर कोर्ट सख्त: ‘महीने में दो बार करें बैठकें’

ऋचा प्रिया को एक साल से अधिक समय तक बिना किसी लिखित कारण के लटकाए रखने पर हाई कोर्ट ने बार काउंसिल की सुस्त कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता व्यक्त की। भविष्य में अन्य युवा वकीलों को ऐसी प्रताड़ना न झेलनी पड़े, इसके लिए जस्टिस आनंद सेन ने एक बड़ा दिशा-निर्देश जारी किया:

नया निर्देश: झारखंड स्टेट बार काउंसिल को अब से हर महीने कम से कम दो बार (Twice a month) स्क्रूटनी कमेटी और एनरोलमेंट कमेटी की बैठकें अनिवार्य रूप से आयोजित करनी होंगी, ताकि कानून के स्नातक छात्रों को अपना सर्टिफिकेट पाने के लिए महीनों या सालों तक इंतजार न करना पड़े।

विश्लेषण: लॉ ग्रेजुएट्स के लिए इस फैसले के मायने

विवादित बिंदुहाई कोर्ट का सुधारात्मक दृष्टिकोण
सीनियरिटी की रक्षायदि कोर्ट ऋचा के नामांकन को आज से वैध करता, तो वे अपने बैच से दो साल जूनियर हो जातीं। बैकडेट (15 अक्टूबर 2024) से सर्टिफिकेट दिलाकर कोर्ट ने उनके करियर के दो साल बचा लिए।
पारदर्शिता का अभावबार काउंसिल ने लिखित में कोई कारण नहीं दिया था। कोर्ट ने साफ किया कि प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक संस्थाएं केवल मौखिक बातों पर किसी का हक नहीं छीन सकतीं।
प्रैक्टिस बनाम रिसर्चयह साफ हो गया कि लॉ रिसर्चर या लॉ क्लर्क बनने के लिए एडवोकेट एक्ट के तहत नामांकन कराया जा सकता है, बशर्ते जॉइनिंग के बाद लाइसेंस को सस्पेंशन में डाल दिया जाए।
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