Bihar News: बिहार की न्यायपालिका और निचली अदालतों की कार्यप्रणाली को लेकर पटना हाई कोर्ट ने एक बेहद गंभीर और अभूतपूर्व फैसला सुनाया है।
भागलपुर के ट्रायल कोर्ट जज के आचरण की कड़े शब्दों में निंदा
हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए एक निचली अदालत (Trial Court) के जज के आचरण की कड़े शब्दों में निंदा (Censure) की है। इस ट्रायल जज पर एक व्यक्ति को हत्या के मामले में आरोपी के रूप में समन (Summons) जारी करने को लेकर गंभीर आरोप लगे थे। हाई कोर्ट ने पाया कि जज ने कानूनी स्थापित प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर, अखबारों में छपी सुनी-सुनाई बातों (Newspaper Hearsay) और साक्ष्य के रूप में पूरी तरह अमान्य दस्तावेजों के आधार पर उस व्यक्ति को हत्या का आरोपी बना दिया था। हाई कोर्ट ने इस कृत्य को पूर्ण रूप से गैर-कानूनी (Complete Illegality) और दुर्भावना से प्रेरित (Acted by Malafide) करार दिया है।
पटना हाई कोर्ट ने भागलपुर की निचली अदालत (Trial Court) द्वारा हत्या के एक मामले में धारा 319 (CrPC) के तहत एक व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में समन जारी करने के आदेश को पूरी तरह खारिज (Quash) कर दिया है।
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को रिश्वत लेन-देने की बात बताई
हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप कुमार की एकल पीठ ने ऐतिहासिक फैसले में माना कि यह पूरा मामला शुरू से लेकर अंत तक घोर दुर्भावना (Malafide), भ्रष्टाचार और कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग से ग्रस्त था। हाई कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को लाखों रुपये की रिश्वत वसूली की बात बताई। साथ ही आरोप लगाया कि केवल एक गवाह की अखबार पर आधारित सुनी-सुनाई बात’ (Newspaper Hearsay) को आधार बनाकर उसे मर्डर केस का आरोपी बना दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि (हत्याकांड और खाकी की साजिश)
यह मामला 3 जून 2012 को दर्ज कोतवाली थाना (भागलपुर) कांड संख्या 305/2012 से जुड़ा है, जो आईपीसी की धारा 302/34 और आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज हुआ था।
घटना: 2 जून 2012 को विश्वनाथ कुमार गुप्ता की चाय पीकर लौटते समय दो अज्ञात शूटरों ने पेट में गोली मारकर हत्या कर दी थी। मृतक के भाई मनोज कुमार गुप्ता ने प्राथमिक दर्ज कराई थी।
रंजिश की कहानी: याचिकाकर्ता का दावा था कि हत्या व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता (Business Rivalry) के कारण हुई थी। लेकिन तत्कालीन सीनियर एसपी (SSP) भागलपुर, के.एस. अनुपम (जो याचिकाकर्ता के रिश्तेदार थे और उनका याचिकाकर्ता से संपत्ति विवाद चल रहा था), ने बदला लेने के लिए याचिकाकर्ता को फंसाने की साजिश रची।
जबरन कबूलनामा और NHRC की कार्रवाई: पुलिस ने दो शूटरों (सद्दाम और रुस्तम) को पकड़ा और कोर्ट की छुट्टी के दिन एक मजिस्ट्रेट के घर ले जाकर धारा 164 CrPC के तहत जबरन कबूलनामा कराया, जिसमें याचिकाकर्ता का नाम घसीटा गया। बाद में रुस्तम ने शिकायत दर्ज कराई कि उससे मारपीट कर बयान लिया गया था।
थाना प्रभारी को सजा: याचिकाकर्ता की शिकायत पर बिहार के डीजीपी ने जांच तत्कालीन डीआईजी (सीआईडी) डॉ. कमल किशोर सिंह को सौंपी, जिन्होंने याचिकाकर्ता को बेगुनाह पाया और पुलिस ने ‘फाइनल फॉर्म’ (क्लीन चिट) दाखिल की। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने दोषी पुलिस अफसर पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया और विभागीय जांच में उसे ‘तीन ब्लैक मार्क’ की बड़ी सजा मिली।
याचिकाकर्ता का दावा: लाखों की रिश्वत का हुआ खेल
लाखों की उगाही: याचिकाकर्ता का आरोप था कि उन्हें संदेश भेजा गया कि यदि पैसे नहीं दिए, तो वे धारा 319 CrPC के तहत उसे इस मर्डर केस में घसीट लेंगे। डर के मारे याचिकाकर्ता ने किश्तों में पैसे दिए।
स्टिंग ऑपरेशन: याचिकाकर्ता ने वीडियो और ऑडियो स्टिंग रिकॉर्ड कर लिया, जिसमें ₹4.5 लाख में से केवल ₹2 लाख खुद तक पहुंचने की बात कबूली, जबकि ‘एडवांस’ लेने की बात स्वीकार की। बाद में जब याचिकाकर्ता ने एक अन्य मांग (₹35 लाख) को पूरा करने से मना कर दिया, तो गवाहों के बयानों में छेड़छाड़ शुरू कर दी।
हाई कोर्ट के इंस्पेक्टिंग जज से शिकायत: तंग आकर याचिकाकर्ता ने 19 अगस्त 2019 को भागलपुर के ‘इंस्पेक्टिंग हाई कोर्ट जज’ से मुलाकात की और पेन ड्राइव में सभी वीडियो साक्ष्य सौंप दिए।
अखबार की खबर पर समन: हाई कोर्ट का कानूनी चाबुक
22 अगस्त 2019 को याचिकाकर्ता को धारा 319 के तहत समन जारी कर दिया था। जब पटना हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के पूरे रिकॉर्ड (Depositions) को खंगाला, तो वे हैरान रह गए।
11 में से 10 गवाह शांत: मर्डर केस के कुल 11 गवाहों में से 10 गवाहों ने याचिकाकर्ता के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा था।
11 वें गवाह का झूठ: केवल 11 वीं गवाह (मृतक की मां) ने कोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता ने ही उसके बेटे के हत्यारों को पैसे दिए थे।
अदालत की फटकार: हाई कोर्ट ने नोट किया कि निचली अदालत के जज ने गवाही के पैरा-5 को पूरी तरह अनदेखा कर दिया, जहां उस महिला ने खुद स्वीकार किया था कि उसे याचिकाकर्ता के संलिप्त होने की यह जानकारी अखबार (Newspaper) में छपी रिपोर्ट से मिली थी।
यह रही अदालत की टिप्पणी
जस्टिस संदीप कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित कानूनों का हवाला देते हुए कहा, सुप्रीम कोर्ट ने धारा 319 CrPC के तहत किसी को समन करने के लिए संतुष्टि का स्तर (Level of Satisfaction) बहुत ऊंचा रखा है। यह आरोप तय करने (Framing of Charge) के स्तर से कहीं अधिक होना चाहिए, यानी ऐसा पुख्ता सबूत जो खंडन न होने पर सजा (Conviction) में बदल सके। एक अखबार की रिपोर्ट के आधार पर सुनी-सुनाई बात (Hearsay) कभी भी किसी को मर्डर केस का आरोपी बनाने का आधार नहीं हो सकती। यह चार्ज फ्रेम करने के लिए भी नाकाफी है।”
‘कोर्ट पर कीचड़ उछालना बंद करें’: सूचक (Informant) के वकील को सख्त चेतावनी
सुनवाई के दौरान मृतक के परिवार (सूचक/Opposite Party No. 2) के वकील ने याचिकाकर्ता के हाई प्रोफाइल होने का दावा करते हुए पटना हाई कोर्ट पर ही उंगली उठाने की कोशिश की। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता इतना रसूखदार है कि उसकी याचिका फाइल होते ही उसी दिन सुन ली गई और उसने पुलिस से लेकर हाई कोर्ट तक सबको प्रभावित कर जज को सजा दिलवा दी। इस पर पटना हाई कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, सूचक के वकील का यह आचरण अदालती अवमानना (Bordering on Contempt) के दायरे में आता है। अदालत पर इस तरह के दुर्भावनापूर्ण इरादे थोपना अत्यंत निंदनीय है। कई बार मामलों की गंभीरता को देखते हुए उन्हें उसी दिन मेंशन करके सुना जाता है, इसका मतलब कोर्ट का प्रभावित होना नहीं है। जहां तक भ्रष्ट न्यायिक अधिकारी की अनुशासनात्मक कार्यवाही के रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने की बात है, कोर्ट ऐसी गंदी चादर को सार्वजनिक रूप से धोना (Washing the dirty linen in public) ठीक नहीं समझती।
विश्लेषण: धारा 319 CrPC (अतिरिक्त अभियुक्त को समन) का सिद्धांत
इस फैसले के माध्यम से पटना हाई कोर्ट ने निचली अदालतों द्वारा धारा 319 के असाधारण अधिकारों के दुरुपयोग की सीमाओं को स्पष्ट किया है।
| कानूनी बिंदु | सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय की व्यवस्था |
| असाधारण शक्ति (Extraordinary Power) | धारा 319 के तहत कोर्ट ट्रायल के दौरान किसी भी ऐसे व्यक्ति को आरोपी बना सकता है जिसका नाम एफआईआर या चार्जशीट में न हो, लेकिन इसका उपयोग बेहद संयम और पुख्ता सबूतों के आधार पर ही होना चाहिए। |
| सबूत का पैमाना (Standard of Evidence) | इसके लिए केवल ‘प्रथम दृष्टया संदेह’ (Prima Facie Suspicion) काफी नहीं है। रिकॉर्ड पर ऐसा ठोस साक्ष्य होना चाहिए जो यह दर्शाए कि इस व्यक्ति को सजा होना लगभग तय है। |
| सुनी-सुनाई बात (Hearsay Evidence) | अखबार की खबरें या अफवाहें भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत स्वीकार्य नहीं हैं। गवाह का चश्मदीद होना या दस्तावेजी सबूत होना अनिवार्य है। |
हाई कोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष और जज पर तीखी टिप्पणी
मामले की फाइलों को देखने के बाद पटना हाई कोर्ट के जज हैरान रह गए कि कैसे एक न्यायिक अधिकारी ने कानून की बुनियादी समझ को ही नजरअंदाज कर दिया। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में मुख्य रूप से 3 बातें रेखांकित कीं।
अखबारों की रिपोर्ट कोई कानूनी सबूत नहीं: हाई कोर्ट ने कड़े लहजे में कहा कि अखबारों में छपी खबरें या समाज में चल रही सुनी-सुनाई बातें (Hearsay) भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत अदालत में पूरी तरह से अमान्य (Inadmissible Evidence) होती हैं। कोई भी जज केवल समाचार पत्रों की रिपोर्ट पढ़कर किसी नागरिक को हत्या का आरोपी नहीं बना सकता।
दुर्भावनापूर्ण और गैर-कानूनी आचरण (Malafide Intention): अदालत ने माना कि ट्रायल जज का यह कदम अनजाने में हुई कोई कानूनी भूल नहीं थी, बल्कि यह “दुर्भावना (Malafide)” से प्रेरित था। रिश्वत मांगने के आरोपों के बीच बिना किसी कानूनी आधार के समन जारी करना यह साफ करता है कि न्याय के सिद्धांतों की बलि चढ़ाई गई थी।
न्यायिक शुचिता पर सवाल: हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा कि किसी भी व्यक्ति को समन जारी करते समय कानूनी मानकों और प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए ताकि न्याय की आत्मा सुरक्षित रहे। इस तरह के फैसलों से बिहार में निचली अदालतों के मुकदमों की विश्वसनीयता और न्यायिक आचरण पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
विश्लेषण: क्या कहती है कानूनी व्यवस्था?
यह फैसला निचली अदालतों के उन जजों के लिए एक बड़ा सबक है जो कानून के बजाय व्यक्तिगत धारणाओं या अन्य वजहों से प्रभावित होकर आदेश पारित करते हैं।
| कानूनी और न्यायिक पहलू | हाई कोर्ट की व्याख्या और इसके दूरगामी प्रभाव |
| सुनी-सुनाई बातों का नियम (Hearsay Rule) | कानूनन ‘सुनी-सुनाई बातें’ (Hearsay) कमजोर साक्ष्य मानी जाती हैं, जब तक कि उनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि न हो। मर्डर केस जैसे संवेदनशील मामले में इसे आधार बनाना न्याय का गला घोंटने जैसा है। |
| उच्च न्यायालय की निगरानी (Supervisory Power) | संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाई कोर्ट को अपनी अधीनस्थ अदालतों (Subordinate Courts) पर प्रशासनिक और न्यायिक नियंत्रण का अधिकार है। इस शक्ति का उपयोग कर हाई कोर्ट ने भ्रष्ट या लापरवाह आचरण पर कड़ा प्रहार किया है। |
| जांच की संभावना | हाई कोर्ट द्वारा लिखित रूप में ‘निंदा’ (Censure) किए जाने के बाद, संबंधित जज के खिलाफ विभागीय सतर्कता जांच (Departmental Vigilance Inquiry) और अनुशासनात्मक कार्रवाई का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाता है। |

